अग्नि आलोक
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कृषक का तिनका

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कीलें गाड़ी थी ज़मीन में
कांटेदार तार सजाए
तंबू लंगर सब हटवाए
पानी बिजली बंद करवाए

आतंकी और खालिस्तानी
समाचारों से सब बुलवाए
नित नए षडयंत्र रचे थे
धन्नासेठ के हुक्म बजाए

हल बख्खर है जिनका अस्त्र
वो कृषक नहीं बलदाऊ है
सर्वविश्व में है बलशाली
जिसकी भूमि उपजाऊ है

हथकंडे हर राजनीत के
तुमने थे अपनाए
पगडी बांध बैठा वो भोला
जो अन्न उपजाए

जो है भरता पेट तुम्हारा
करता न अभिमान
तुम उसको कहते आतंकी
करा उसका अपमान

खालिस्तानी देशद्रोही सब
उसको गया कहा
धैर्य सब्र की मूरत बन
हर लांछन उसने सहा

अत्याचारी जमींदार बन
पहियों तले कुचला
हर कुचक्र अपनाया तुमने
हरदम उसे छला

भूल गए तुम है किसान वो
भारत मां का है प्राण वो
पत्थर में हैं फूल उगाए
कर्मवीर ऐसा महान वो

कृषक का तिनका सहता आंधी
बडे वृक्ष से है बलशाली
हाथ कृषक के हैं ब्रम्हास्त्र ये
कर्म से जिनके भरती थाली

अब उसने तुमको दिखलाया
घुटनों पर तुमको बिठलाया
दिल्ली पर तुम तख्तनशीं जो
देश की धूलि तुम्हें चटाया

इस धूलि का स्वाद न भूलो
बलराम का हल यह याद रहे
कृषक की मेहनत, जान, पसीना
और उसका बल यह याद रहे

डॉ पीयूष जोशी

Ramswaroop Mantri

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