रामकिशोर मेहता
जुम्मन मानता है
फतवे को
क्योकि फतवा
जुम्मन की मजबूरी है।
जुम्मन गरीब है।
वह गरीब इसलिए है
क्योंकि वह डराता है
खुदा से।
अलबत्ता खुदा कभी नहीं आता
जुम्मन को डराने के लिए।
उसे डराते हैं शेख जी
जो खुद नहीं डरते
खुदा से।
इसलिए
न कभी कोई माँगता है
न कभी दिया जाता है
न लागू होता है
कोई फतवा
शेख जी के खिलाफ
शेख जी ऊपर होते हैं
फतवों से
फतवा देने वालों से
यहाँ तक कि खुदा से भी
जिसके नाम पर
दिए जाते हैं फतवे।





