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डर, ऐ देश मेरे, तूं डर ………..
लेखक :- स्वराजबीर
अनुवाद :- कृष्ण कायत, मंडी डबवाली ।
डर , डर मेरे दिल , डर
डर , इतना डर, कि डर
ही बन जाए तेरा घर
डर में ही है तेरा बचाव
छुपा, अपने आप को छुपा
छुपा अपने आप को
जिस्म में, मकान में
कारपोरेट की दुकान में
अपने आप को छुपा
चुप के तूफान में
डर से भी डर
जीते हुए ही मर
डर, ऐ दिल मेरे, डर
कि डर से ही
उभरता है, सर°
डर, ऐ दिल मेरे, डर
डर, ऐ देश मेरे, डर ।
(°सिर)
डर और हौसले /
\हिम्मत को कई बार विरोधी भावनाएं माना जाता है; डर को मनुष्य की नकारात्मक मानसिक स्थिति के साथ जोड़ा जाता है और हौसले को सकारात्मक स्थिति के साथ । पर, मनुष्य की मानसिक स्थिति इतनी सीधी और स्पष्ट नहीं होती है । वह डरता है स्थितियों से, बर्ताव से, घटनाओं से, हालातों से, डराने वाले व्यक्तियों से, भीड़ों से, सेनाओं से, पुलिस और कानून से, युद्धों से , लड़ाईयों से, अपनों और परायों के लालच से , भविष्य की अनिश्चितता से, अपने समयों के माहौल से , अतीत में मिले अनुभवों व यादों कारण । बीते समय में मिले जख्मों के कारण । डर मनुष्य के मानसिक संसार का हिस्सा है । ड़रने के बाद ही मनुष्य सोचता है कि उसने डर को काबू कैसे करना है , कैसे हिम्मत करनी है और हौसला रखना है । उसेअपने डरने पर शर्म आती है । वह यह फैसला भी कर सकता है कि वह डरा रहे या पाल सार्त्र के शब्द उधार मांग कर कहा जा सकता है कि, “वह दीवार में छेद करके उसमें छुप जाएगा ।” या उसे यह प्रतीत होता है कि वह लुक-छिप कर नहीं जी सकता, उसे हालातों का सामना करना ही पड़ेगा ।
ऊपर वाली कविता उस समय लिखी जा रही है जिस समय देश में डर, भय और खौफ का साम्राज्य सिरजा जा रहा है; जब धार्मिक कट्टरता में ग्रस्त भीड़ें एक दूसरे पर हमला कर रही हैं; पत्थरबाजी करती हैं और दुकानों-मकानों को आग लगाती हैं, अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों को भीड़ हिंसा का शिकार बनाती हैं; धार्मिक स्थानों पर हमले किए जाते हैं; घरों-दुकानों पर अदालती कार्यवाही के बिना बुललडोजर चलाए जाते हैं; सत्ताधारी भीड़ हिंसा करने वालों का सामाजिक तौर पर मान-सम्मान करते हैं । घृणा और नफरत फैलाने वाले भाषण दिए जाते हैं; ऐसे भाषण देने वालों की जय-जयकार होती है; उन्हें नायक माना जाता है ।
बुलडोजर लोगों को डराने के प्रतीक बन गए हैं ; अभी-अभी संपन्न उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में योगी आदित्यनाथ की चुनाव रैलियों में बुलडोजर लाकर खड़े किए गए । क्या बताने के लिए ? कि योगी इन्हें इस्तेमाल करने वाला ताकतवर राजनीतिज्ञ है । इस तरह बुलडोजर कानून के अनुसार काम करने वाले यंत्र नहीं; ताकत और सत्ता के प्रतीक हैं ; लोगों में भय और दहशत फैलाने के औजार हैं; दुकानों और मकानों पर चलाए जा रहे इन बुलडोजरों ने कानून और संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रिया को लताड़ा व कुचला है; इन्हें देश को सामूहिक मानसिक दोफाड़ की तरफ धकेलने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है । इस्तेमाल करने वाले टीवी चैनलों और अखबारों में अपने आप को सही ठहरा रहे हैं और उन्हें सही माना जा रहा है; इसीलिए इस समय यह कहना पड़ रहा है, “डर! ऐ देश मेरे, डर !”
देश को डरना पड़ेगा क्योंकि हवा में मध्य प्रदेश के गृहमंत्री के बोल गूंज रहे हैं, “जिस घर से पत्थर आए हैं, उस घर को ही पत्थरों का ढेर बनाएंगे ।” एक केंद्रीय मंत्री के बोल गूंज रहे हैं, “देश के गद्दारों को, गोली मारो ……… को ।” सभी जानते हैं कि वे लोग कौन हैं जिन्हें ‘गद्दार’ कहा जा रहा है, जिनके घरों को पत्थर का ढेर बनाने की बातें की जा रही हैं । देश को इस मानसिकता से डरना पड़ेगा; अपने आप को इस मानसिकता से छुपाना और बचाना पड़ेगा ।
भय के इस साम्राज्य के सृजन के दौर में ही मानवता के एक ऐसे रहबर का जन्मदिन मनाया गया जिसने मनुष्यता को भय मुक्त होने का संदेश दिया था ; उन्होंने मानव होने को इस तरह परिभाषित किया है, “भय काहू कउ देत नही नही भय मानत आन ।” ये पंजाब की धरती पर जन्में गुरु तेग बहादुर जी थे जिन्होंने कठिन समय में यह संकल्प पेश किया था कि मनुष्य कैसा हो; उन्होंने बताया कि मनुष्य को ना तो किसी को डराना चाहिए और ना ही किसी से डरना चाहिए ।इस पंक्ति में स्पष्ट है कि गुरु जी इस संकल्प में मनुष्य होने की पहली शर्त यह रखते हैं कि किसी को भय देना या डराना नहीं और फिर संदेश देते हैं कि किसी का भय नहीं मानना ।
गुरु साहिब के जन्मदिन से कुछ दिन पहले ही रामनवमी और हनुमान जयंती के त्यौहार थे । इन त्यौहारों के अवसर पर गुजरात, मध्य प्रदेश, झारखंड और दिल्ली में निकाले गए जुलूसों के समय हिंसा हुई और देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक भाईचारे के लोगों की जायदादों व धार्मिक स्थानों को निशाना बनाया गया । मध्य-प्रदेश के खरगोन कस्बे में घरों व दुकानों को बुलडोजरों से ढ़हाया गया । 16-17 अप्रैल की रात को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में भी एक धार्मिक स्थान को निशाना बनाया गया और तनाव बढ़ा । गुजरात के कस्बे खंभात (जिला आनंद) में रामनवमी के जुलूस में हुई हिंसा के बाद बुलडोजर चलाए गए हैं । दिल्ली में हनुमान जयंती के अवसर पर 16-17 अप्रैल की रात को जहांगीरपुरी इलाके में हिंसा हुई । 20 अप्रैल को बुलडोजर इस इलाके में भी पहुंचे और सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोकने के आदेश देने के बाद भी बुलडोजर चलते रहे । सीपीएम नेता वृंदा करात सुप्रीम कोर्ट के कार्रवाई रोकने के निर्देश लेकर जहांगीरपुरी पहुंची और बुलडोजरों को रुकवाया । इससे पहले भी लोगों और अधिकारियों को 10:45 बजे सुनाए गए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों बारे पता था । पर, जानबूझकर सर्वोच्च अदालत के आदेशों की उल्लंघना की गई । यह सर्वोच्च अदालत की मान-हानि है; देश के कानून और संविधान का अपमान है ।
बुलडोजरों को चलाने का आदेश देने वाले व्यक्ति जानते हैं कि उनका मकसद क्या है; उनका मकसद है लोगों को डराना । डराना एक कला है । सत्ताधारियों के पास लोगों को डराने के कई ढंग-तरीके होते हैं । नाजी जर्मनी में सरकारी तंत्र के मनों में नस्ली जहर भर कर उन्हें यहूदियों, जिप्सियों (रोमा लोगों) और कम्युनिस्टों पर कहर ढ़हाने के आदेश दिए गए थे । सोवियत यूनियन में स्टालिन के राज में पुलिस या खुफिया विभाग के लोग नागरिकों, जिनमें नामी कम्युनिस्ट नेता भी शामिल थे, के घरों के दरवाजों पर आधी रात दस्तक देते और वे लोग साइबेरिया, जेलखानों व मृत्यु-घरों में पहुंचा दिए जाते । भारत में औपनिवेशिक सरकार ने लोगों की अपील या दलील सुनने की बजाए रौलट एक्ट जैसे कानून बनाए । इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई । 1984 में दिल्ली और अन्य शहरों में सिखों का कत्लेआम किया गया । 2019 में जम्मू कश्मीर का राज्य दर्जा समाप्त कर दिया गया । अनेकों उदाहरणें हैं । सबका मकसद था लोगों को डराना और खौफ का साम्राज्य स्थापित करना । जहांगीरपुरी में बुलडोजर कार्रवाई के बाद न सिर्फ भाजपा नेताओं ने इस कार्यवाही को सही ठहराया है बल्कि दिल्ली के भाजपा अध्यक्ष आदेश गुप्ता ने कहा है कि उसने म्युनिसिपल कारपोरेशन के चेयरमैनों को पत्र लिखकर दंगा करने वालों की दुकानों व मकानों को तोड़ने के लिए कहा था ।
वर्तमान सरकार भीड़ हिंसा से लेकर यूएपीए का गैरकानूनी प्रयोग करने, पैगासस जैसे सॉफ्टवेयर द्वारा चिंतकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं व राजनीतिज्ञों के फोनों पर निगरानी रखने और लोगों के घरों-दुकानों को बुलडोजरों से ढ़हाने जैसे ढंग-तरीके इस्तेमाल कर रही है । जाकिर हुसैन कॉलेज दिल्ली, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, जामिया मिलिया इस्लामिया और अन्य शैक्षणिक संस्थाओं के विद्यार्थियों से मार-पीट करके उन्हें ‘सबक’ सिखाए गए हैं । लक्ष्य वही है: आप डरो; हमारे (भाव सत्ताधारियों) से डरो । डराने के साथ-साथ लोगों के मनों में धर्म के आधार पर नफरत भरी जा रही है । क्या बहुसंख्यक भाईचारे को इस बर्ताव से फायदा हो रहा है ? इस प्रश्न का जवाब है ‘नहीं’, उनके पुत्रों के मनों में नफरत का जहर भर कर उन्हें अमानवीयता की तरफ धकेला जा रहा है; बहुसंख्यक भाईचारे को भी इस बर्ताव से डरने की जरूरत है ।
शुक्रवार गुरु तेग बहादुर जी का प्रकाश पर्व मनाया गया । सिख गुरु एक तरफ ब्राह्मणी कर्मकांड, वहमों-भ्रमों, मूर्ति पूजा, जात-पात व वर्ण-आश्रम के विरुद्ध लड़े, दूसरी तरफ धार्मिक कट्टरता व जोर-जुल्म के विरुद्ध । गुरु नानक – गुरु गोविंद सिंह सामाजिक-राजनीतिक क्रांति को इस व्यापक सामाजिक-राजनीतिक-ऐतिहासिक संदर्भ में ही देखा जा सकता है । वे किसी धर्म के विरुद्ध नहीं थे; उनका संदेश सामूहिकता (सांझेदारी) का संदेश था । गुरु तेग बहादुर जी की वाणी में बेचैनी, वेदना और वैराग्य के विषय जगह-जगह पर उभरे हैं ।उन्होंने अपनी वाणी में मनुष्य-होनी संबंधी महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं और फिर आप ही उत्तर दिए हैं । उनकी वाणी आत्म-संवाद की वाणी है । वे प्रश्न करते हैं “बल छूटे बंधन परे कछु ना होत उपाय ।” और फिर उत्तर देते हैं “बल होया बंधन छूटे सब कछु होत उपाय ।” इन वचनों ने पंजाब के लोगों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जोर-जुल्म के विरुद्ध लड़ने की हिम्मत दी है; ये वचन पंजाब की लोक-आत्मा की आवाज बन गए हैं । गुरु साहेब सिर्फ निजी तौर से बलशील होने पर जोर नहीं दे रहे ; उनके सामने पंजाब और समूह लोकाई थी; वे आने वाले संघर्ष को देखते हुए जोर-जुल्म के विरुद्ध लड़ने के लिए सामाजिक बल पैदा करने पर जोर दे रहे थे । सामूहिक सामाजिक बल ही राज वर्ग को ललकार सकता है । यही सामूहिक सामाजिक बल खालसा के सृजन का आधार बना ।
भय के साम्राज्य का सामना करने के लिए समाज के सभी हिस्सों व वर्गों को शक्तिशाली होना पड़ेगा । शक्तिशाली होने के लिए संगठित होना और व्यापक एकता कायम करना आवश्यक है । 2020-21 के किसान आंदोलन ने हमें यही सिखाया था; सारे पंजाब और देश के अन्य राज्यों के लोग इकट्ठे होकर शक्तिशाली हुए; उन्होंने भय को उजागर करती सड़कों पर गाड़ी गई कीलों, जल बौछारों, पुलिस व सुरक्षा बलों के दस्तों और अन्य राजसी प्रतीकों को अर्थ हीन कर दिया था । उस आंदोलन से पहले नागरिकता शोध कानून के विरुद्ध चले शाहीन बाग के आंदोलन में औरतों ने शक्तिशाली होने का प्रदर्शन किया था । आवश्यकता है समाज के हर वर्ग और संप्रदाय में लोकतांत्रिक नेतृत्व करने वाले नेता सामने आएं और संकीर्णता को छोड़कर व्यापक जन-एकता कायम की जाए । अपने समाजों, संप्रदायों, व वर्गों में फैली हुई संकीर्णता, संप्रदायिकता व स्त्री-विरोधी भावनाओं के साथ लड़ने की भी जरूरत है ।
राज करने वाले लोगों को डराते आए हैं; इस समय डराने का मकसद डर पैदा करने के साथ-साथ उन्हें सांप्रदायिक आधार पर बांटना है; हमें इस मंसूबे से डरना और इस प्रक्रिया के जटिल अर्थों को समझना चाहिए । डर, सहम और दहशत पैदा करने के साथ-साथ सांप्रदायिकता के रंगों को लोगों के मनों में और गहरा कर रहा है ।
डर अकेलेपन में पलता और पनपता है । अकेला व्यक्ति और डरता व अपने आप में सिकुड़ता है । हमें डर है कि भय के इस महा-चक्रवात ( तूफान ) का सामना करने के लिए एक दूसरे का हाथ पकड़ना पड़ेगा । डर पर काबू पाना व संगठित होना पड़ेगा ।
(शुरुआती कविता की पहली पंक्ति एलन पैटन के नॉवेल ‘रो, मेरे प्यारे देश (Cry, the Beloved Country) से ली गई है ।)
लेखक :- स्वराजबीर
अनुवाद :- कृष्ण कायत , मंडी डबवाली ।





