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अघोषित आपातकाल की अनुभूति

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तेजपाल सिंह ‘तेज’

                प्रस्तुत पाठ वास्तव में एक लंबे वैचारिक–राजनीतिक वक्तव्य का सार है, जिसमें बीते एक दशक के भारत की सत्ता-प्रकृति, सामाजिक मनोविज्ञान और संस्थागत क्षरण की तीखी आलोचना निहित है     भारत का संविधान 1975 के आपातकाल को एक ऐतिहासिक अपवाद मानता है, जिसे अनुच्छेद 352 के अंतर्गत घोषित किया गया था। किंतु इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भारतीय लोकतंत्र जिस दिशा में बढ़ा है, उसने एक ऐसे वातावरण को जन्म दिया है जहाँ आपातकाल घोषित नहीं है, पर उसके लक्षण सर्वत्र विद्यमान प्रतीत होते हैं। असहमति का दमन, भय का प्रसार, संस्थाओं की निष्क्रियता और नागरिक स्वतंत्रताओं का क्षरण—ये सभी संकेत एक ऐसे राज्य की ओर इशारा करते हैं जो संवैधानिक लोकतंत्र के मूल भाव से दूर जाता दिखाई देता है।

 सत्ता का केंद्रीकरण और असहमति का अपराधीकरण:

            2014 के बाद से भारत में सत्ता का अभूतपूर्व केंद्रीकरण देखने को मिला है। कार्यपालिका न केवल विधायिका पर प्रभाव डालती दिखती है, बल्कि न्यायपालिका और मीडिया जैसे स्तंभ भी इस दबाव से अछूते नहीं रहे। असहमति को राष्ट्र विरोधी, शहरी नक्सलवाद या विदेशी षड्यंत्र के रूप में परिभाषित किया जाने लगा है। इसका परिणाम यह हुआ कि छात्र, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी कठोर कानूनों के तहत वर्षों तक बिना सुनवाई के जेलों में बंद हैं।   उमर खालिद का मामला इसका प्रतीक बन चुका है। जिस भाषण में न तो हिंसा का आह्वान था और न ही किसी प्रकार की साजिश का प्रत्यक्ष प्रमाण, उसे राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा घोषित कर दिया गया। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि अब अपराध का निर्धारण कृत्य से नहीं, बल्कि विचार से होने लगा है।

 

न्यायपालिका और संस्थागत मौन:                                                                                                                                              लोकतंत्र की रक्षा में न्यायपालिका की भूमिका निर्णायक होती है, किंतु वर्तमान परिदृश्य में अदालतों की चुप्पी और विलंब न्याय से अधिक भय पैदा कर रहा है। 84 वर्षीय आदिवासी पादरी स्टेन स्वामी का कारावास और हिरासत में निधन इस प्रश्न को जन्म देता है कि क्या मानवीय संवेदना भी अब कानून के दायरे से बाहर हो चुकी है। ज़मानत को नियम और जेल को अपवाद मानने की संवैधानिक अवधारणा उलट दी गई है। उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में मामलों का वर्षों तक लंबित रहना, अभियोजन की अनुपस्थिति और निचली अदालतों का डर—ये सब मिलकर यह संकेत देते हैं कि न्याय अब केवल विधिक प्रक्रिया नहीं रहा, बल्कि सत्ता-संतुलन का उपकरण बनता जा रहा है।

पुलिस राज और ‘मॉडल’ की राजनीति:

            उत्तर प्रदेश में तथाकथित ‘ऑपरेशन लंगड़ा’ और फर्जी मुठभेड़ों को जिस तरह राजनीतिक प्रशंसा और पदोन्नति से जोड़ा गया है, वह कानून के राज की अवधारणा को सीधे चुनौती देता है। पुलिस का काम अपराधी को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना होता है, न कि स्वयं न्यायाधीश और जल्लाद बन जाना।     यह मॉडल अब अन्य राज्यों में भी अनुकरणीय बताया जा रहा है। जब गैरकानूनी हिंसा को “साहस” और “कठोर शासन” के रूप में महिमामंडित किया जाता है, तब समाज धीरे-धीरे न्याय के बजाय बदले की मानसिकता में ढलने लगता है।

 

सांप्रदायिकता का सामान्यीकरण और अल्पसंख्यकों की असुरक्षा:

            भीड़ हिंसा, लिंचिंग और धार्मिक पहचान के आधार पर अपमान अब अपवाद नहीं रहे। मुसलमानों को सार्वजनिक स्थलों, रेलगाड़ियों और मोहल्लों में संदेह की दृष्टि से देखा जाना एक सामान्य अनुभव बन चुका है। किसी के भोजन, पहनावे या नाम के आधार पर हिंसा होना इस बात का संकेत है कि राज्य नागरिकों को समान सुरक्षा देने में विफल हो रहा है। इतिहास गवाह है कि जब किसी समुदाय की तुलना कीड़े-मकोड़ों या पशुओं से की जाने लगती है, तब वह केवल भाषा नहीं रहती, बल्कि भविष्य की हिंसा की भूमिका बन जाती है। नाज़ी जर्मनी में यहूदियों के साथ जो हुआ, वह अचानक नहीं हुआ था—वह एक लंबी वैचारिक तैयारी का परिणाम था।

 

मीडिया का पतन और सूचना का एकाधिकार:

            स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र की आंख और कान होता है, किंतु आज अधिकांश टेलीविजन चैनल सत्ता के प्रचार तंत्र में परिवर्तित हो चुके हैं। वास्तविक मुद्दे—गरीबी, असमानता, शिक्षा, स्वास्थ्य—गायब हैं और उनकी जगह सांप्रदायिक बहसों ने ले ली है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट जो भारत के लोकतांत्रिक क्षरण और बढ़ती असमानता की ओर संकेत करती हैं, उन्हें या तो विदेशी साज़िश कहकर खारिज कर दिया जाता है या पूरी तरह अनदेखा कर दिया जाता है। सूचना का यह केंद्रीकरण समाज को तर्कशील नागरिक से भावनात्मक भीड़ में बदल रहा है।

आर्थिक असमानता और ध्यान-भटकाव की राजनीति:

            विकास के दावों के बीच वास्तविकता यह है कि संपत्ति और आय की असमानता ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच चुकी है। कुछ मुट्ठी भर लोगों के पास अपार संपदा केंद्रित हो रही है, जबकि करोड़ों लोग राज्य की राशन योजनाओं पर निर्भर हैं। किंतु इन प्रश्नों पर बहस न हो, इसके लिए धर्म और राष्ट्रवाद को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है। जब जनता को रोज़ी-रोटी के सवालों से हटाकर पहचान की लड़ाइयों में उलझा दिया जाता है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे खोखला हो जाता है।

 

विपक्ष का दमन और लोकतांत्रिक संतुलन का टूटना:

            लोकतंत्र में विपक्ष केवल सरकार का विरोध नहीं करता, बल्कि सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करता है। किंतु जब विपक्ष के नेता को संसद से बाहर किया जाता है, उसका आवास छीना जाता है और उसे अपमानित किया जाता है, तब यह संकेत मिलता है कि सत्ता आलोचना से भयभीत है। राहुल गांधी के साथ हुई घटनाएँ इसी प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं।

संभावित भविष्य : भय या पुनर्जागरण:

            यदि यह प्रवृत्तियाँ इसी तरह जारी रहीं, तो भारत एक ऐसे राज्य में परिवर्तित हो सकता है जहाँ चुनाव तो होंगे, पर स्वतंत्रता सीमित होगी; अदालतें होंगी, पर न्याय दुर्लभ होगा; मीडिया होगा, पर सच अनुपस्थित रहेगा। यह स्थिति एक स्थायी, अघोषित आपातकाल जैसी होगी—जो धीरे-धीरे सामान्य जीवन का हिस्सा बन जाएगी। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जब दमन चरम पर पहुँचता है, तब समाज के भीतर प्रतिरोध की चेतना भी जन्म लेती है। सवाल यह नहीं है कि स्थिति कितनी भयावह है, बल्कि यह है कि नागरिक अपने संविधान, अपनी स्वतंत्रता और अपने विवेक की रक्षा के लिए कितने सजग और संगठित होते हैं।

             उपसंहार : आपके प्रस्तुत पाठ का मूल भाव यही है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि संस्थाओं की स्वतंत्रता, नागरिकों की सुरक्षा और असहमति के सम्मान से जीवित रहता है। आज भारत जिस चौराहे पर खड़ा है, वहाँ से दो ही रास्ते निकलते हैं—एक भय, चुप्पी और हिंसा की ओर, और दूसरा संवैधानिक चेतना, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण की ओर। इतिहास अंततः यही पूछेगा कि इस दौर में हमने डर को चुना या विवेक को।

            

Ramswaroop Mantri

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