पुष्पा गुप्ता
वो ज़माना याद आता है जब समाज में शादी के मौके पर ‘सेहरा’ पढ़ा जाता था. कोई करीबी रिश्तेदार इसे प्रेजेंट करता था. आमतौर पर सबसे करीबी रिश्तेदार बहन-बहनोई ही होते थे. सेहरा लिखने वालों की भी एक ख़ास ज़मात थी. एक से एक बढ़िया सेहरे उनकी रिकॉर्ड फाईलों में सजे होते थे.
आपको जो पसंद हो उसे ही लिख दूं. बस नाते-रिश्तेदारों और दोस्तों के नाम लिख दें, जो ज़मीन पर हैं वो ख़ुशी से नाचेंगे और जो ऊपर हैं वो स्वर्ग से फूल बरसायेंगे.
भाई ख़ुशी से नाच रहा है तो बहनें किकली खेल रही हैं. बुआ-फूफा फूले नहीं समा रहे हैं और ताऊ-ताई मीठे ढोढे अड़ोसी-पड़ोसियों को खिला रहे हैं. चचरे-फुफेरे और ममेरे-मौसेरे भाई-बहन तो पिछले कई दिन से नाच रहे हैं, थक ही नहीं रहे हैं.
कुल मिला कर कोई रिश्तेदार-दोस्त ऐसा नहीं बचता था जो इस मांगलिक अवसर पर खुश न हो. यही सब बड़े प्यार से पिरोया होता था सेहरे में. अपना नाम प्रमुखता में छपा देख बरसों से रूठे एक-आध रिश्तेदार बैर भुला देते थे. और कुछ मुंह फुला लेते कि मेरा नाम बाद में क्यों आया?
उन्हें बड़ी मुश्किल से समझाया जाता था कि हमने तो लिख कर दिया था, भूतनी का सेहरा लिखने वाला ही गड़बड़ कर गया.
सेहरा लिखने अपनी सामने वाली पार्टी की हैसियत देख कर फीस के लिए मुंह खोलता था. एक सेहरा गुलाबी रंग के रेशमी कपड़े पर छाप कर फ्रेम होता था. लड़की वाले भी अपना सेहरा रेशमी कपड़े पर छपवाते और दहेज़ का हिस्सा बनाते. आम जनता जनार्दन के हिस्से में सेहरा पतले गुलाबी कागज़ पर छपा होता था.
पिछले कई सालों से सेहरा दिखाई नहीं दे रहा है. बहुत दुखद है कि ख़त्म हो गयी है एक स्वस्थ रस्म. दीवार पर टंगा सेहरा मर्द को बरसों तक याद दिलाता था : घोड़ी चढ़ कर मैं आया था, तुझे बड़े अरमानों से लेने…!





