भीलूड़ा (राज) 15 अक्टूबर। भोजन ही औषधी है, केमिकल चेंज के कारण ऋतु के अनुसार भोजन नहीं करने पर पोइजन बन जाता है तुम्हारा शरीर वह है जो तुम खाते हो ‘एज यू थिंक सो बिकम’- जैसा आप सोचते हैं वैसा आप बन जाते हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर कैमिकल न्यूनोन डीएनए. आरएनए. से बना है। भोजन भी केमिकल है। दूध दही मट्ठा घी की ही पर्याय हैं। दूध में दही डालने पर फट जाता है। आयुर्वेद में पथ्य भोजन ही औषधि है। केमिकल चेंज के कारण ऋतु के अनुसार भोजन नहीं करने पर पोइजन बन जाता है। खट्टा दही नहीं खाना चाहिए। हम जिव्हा-लालसा नहीं छोड़ पाने के कारण अस्वस्थ रहते हैं। फल ककड़ी आदि कच्चा खाना चाहिए। कुछ सब्जियां बनाकर उबालकर खाईं जाती हैं। अनाज मोटा खाना चाहिए। शरीर विज्ञान के अनुसार मनुष्य की संरचना अन्य जीवों से अलग है। हर मनुष्य की रात-दिन की, सुबह -शाम की अलग अलग प्रकृति होती है। भोजन का एक ग्रास 32 बार नहीं चबाने पर अनेक रोग हो जाते हैं तथा छोटी आंत, बड़ी आंत को अधिक मेहनत करनी पड़ती है। मनुष्य की संरचना शाकाहारी भोजन के अनुसार ही बनी है। शरीर में केमिकल के योग्य भोजन व पानी चाहिए। घी बुद्धि वर्धक होता है। शरीर पुद्गल की उत्कृष्टतम संरचना है। भोजन के प्रारंभ में घृत मिश्रित मिष्ठान्न खाएं। जब शरीर की उष्णता बढ़ती है तो उस समय केमिकल स्राव होता है। पेट में एसिड होता है जो मीठे भोजन को जल्दी पचा लेता है।
विजयलक्ष्मी जैन व अभिषेक जैन लुहाडिया ने डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’ को जानकारी देते हुए बताया कि उक्त प्रवचन वैज्ञानिक आचार्य कनकनंदी मुनिराज ने भीलूड़ा में अपने प्रवचनों में देते हुए आगे कहा कि हमें भोजन में प्रारंभ में पानी नहीं पीना चाहिए, भोजन के अंत में भी कम ही पानी पीना चाहिए। पानी को धीरे धीरे पीना चाहिए। जिव्हा में अनेक प्रकार के केमिकल होते हैं जो भोजन को पचाते हैं। भोजन जिव्हा से पचना प्रारंभ होता है, छोटी आंत, बड़ी आंत आदि से होता हुआ लघुशंका, दीर्घशंका तक भोजन पचता है। गरम भोजन के बाद ठंडा पानी नहीं पीना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति का शरीर अलग-अलग होने से अलग-अलग प्रकार के भोजन की आवश्यकता रहती है। जिस प्रकार रॉकेट, कार, गाड़ी सब में अलग-अलग ईंधन की आवश्यकता होती है। आचार्यश्री ने कहा कि तुम्हें शांति और खुशी चाहिए तो प्रकृति की गोद में आओ। उक्त प्रवचन अन्तराष्ट्रीय वेबीनार के रूप में भी प्रसारित हो रहे थे।
आचार्य श्री की शिष्या डॉ. रीता जैन मुंबई ने अपना अनुभव बताते हुए कहा कि केमिकल पोइज़निंग से अधिक रोग होते हैं। दूध ऑक्सीटोसीन इंजेक्शन लगाने के कारण हारमोंस हमारी बॉडी में जाते हैं जिससे अनेक रोग होते हैं। शुद्ध गाय का दूध व घी खाना चाहिए, नहीं तो नहीं लेना चाहिए। जूस आदि में मिली हुई वाइट शुगर वाइट पोइजन होती है। मीठा खाने के लिए देसी गुड़, लाल गुड़ खाना चाहिए। सीजनल फूड ही सुपाच्य रहता है।
अलसी के बीज, बादाम, अखरोट, काजू का प्रयोग करना चाहिए। प्रोटीन में मूंग की दाल, तुवर की दाल लेनी चाहिए। जैविक खेती से बने चावल-दाल प्रयोग करना चाहिए। ठंडी में ज्वार, बाजरा आदि अधिक प्रयोग करना चाहिए। नारियल तेल, तिल्ली का तेल अधिक प्रयोग करना चाहिए। लौकी व ककड़ी स्वास्थ्य के लिए अच्छी रहती है, एसिड कम करती है। टमाटर भिन्न भिन्न कलर की सब्जियां तथा फ्रूट्स खाने चाहिए। उन्होंने आचार्यश्री के लिए कहा आचार्यश्री तो मास्टर ऑफ ऑल हैं। उन्हें हर विषय का ज्ञान है।
– -डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौर 9826091247





