तेजपाल सिंह ‘तेज
आदमी उड़ान में रहे तो खूब है,
ताजगी थकान में रहे तो खूब है।
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मैंने खुद ही को बचाया था मगर,
उसने जाना कि मददगार हूँ मैं।
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कैसे गुजरी है उम्र मत पूछो,
बहुत बेचे हैं सुखाकर आँसू।
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गाँव जब-जब भी शहर आता है,
मेरा बचपन भी साथ लाता है।
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जब से गए हो पुर-असर तबियत नहीं खिली,
अबकी हवा के रास्ते मुस्कान लिख भेजो।
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कब तक चलेगी जीस्त नंगे पाँव,
मौत को सज़दा न कर फ़ानी न बन।
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कैसा पागल हूँ कि मुर्दों को जुबां देता हूँ,
राख के ढेर को जलने की दुआ देता हूँ।
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शूल पत्थर आग बन पानी न बन,
वक्त की आवाज सुन ज्ञानी न बन।
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जख़्मों से निकले खून का रंग तो बदल गया,
लेकिन सियासी दौर के खंजर नही बदले।
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मानवता के दाम गिरे, है मजहब का बाजार गरम,
इक पाले में अल्लाह-ताला, इक पाले में ईश्वर है।
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लगता है कि भूले यहाँ सब लोग हँसने का शऊर,
कि आँसुओं की तर्ज पर हँसते हैं लोग आज।
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दिया था उसने जो मुझे,
वो मेरा ही तो रुमाल था।
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ये घर है मिरा कि मयार ख्वाबों का,
सभी कुछ तो है इसमें फ़क़त मेरे सिवा।
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पड़ गया कमजोर यूँ अपना जुनूं
रोके कभी हंसके ही सिमट जाता है।
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कैसा पागल हूँ मुर्दो को सदा देता हूँ,
राख के ढेर को जलने की दुआ देता हूँ।
<तेजपाल सिंह ‘तेज’ का जन्म अगस्त 1949
में बुलन्दशहर (उ.प्र.) के अला बास बातरी में हुआ।
अब तक इनकी गद्य-पद्य की लगभग तीन दर्जन
किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें से पाँच ग़ज़ल
संग्रह भी शामिल हैं। आपको हिन्दी अकादमी,
दिल्ली द्वारा “बाल साहित्य” और “साहित्यकार”
सम्मान से नवाजा जा चुका है। आपको बागी तेवर के
कवि के रूप में जाना जाता है।

