रेत में लहराती है
समुद्र की अथाह संभावना
सूखे भोजपत्र पर क्या लिखूं
मौसम के नाम
अंधेरे की छाती से निकलेगी लाल सुबह
धरा का धरा रह जाएगा
समस्त कयासों का भाष्य
थोथी दलीलों से भरी पड़ी होगी
आमुख कथा
मेरे अप्रतिम को डाल सकते हो
हाशिये पर आज
दरवाजे पर चढ़ा कर सांकल
मैं निकल पड़ूंगा
उन्मुक्त वक्त के साथ
बहुत उपजाऊ है जमीन
मत छीनो मुझसे मेरी हरियाली
मुक्त कर दो
बंधक सपनों का अतीत
परलोक वास की सुखमय अभिलाषा में
कब तक रहूं आत्मलीन
नींव के नीचे दबा है
मेरा आराध्य
स्थापित स्थापत्य के शीर्ष पर
सुवासित हो जाता है
मलमूत्र
मत बेचो
कालाबाजारियों, तेजड़ियों की
पुरस्कार मंडी में
मुझे मालूम है
कहाँ से फूटती है तुम्हारी
विषम आलोचना की धारा
मेरी सोच में है
षड् ॠतुओं की चिंतन शैली
मैं समझ सकता हूं
मानसून का फलसफा
राम प्रसाद यादव
