सुसंस्कृति परिहार
गांधी जयंती पर भारत जोड़ो यात्रा ने कर्नाटक में एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया उसमें गांधी जी के पसंदीदा भजनों का गायन हुआ उन्हें ख़ूब ख़ूब याद किया गया।भजनों के दौरान राहुल गांधी ने जिस तन्मयता से सुना वे उसमें आकंठ डूब गए यह एक सुंदर दृश्य था। राहुल गांधी के जख्म़ी पैरों में सफेद पट्टियां दिखाई दे रही थीं।अर्धश्वेत दाढ़ी और सिर पर सफेद गांधी टोपी। यह वहां उपस्थित तमाम लोगों ने भी पहन रखी थी।अब तो महिलाएं भी बेझिझक टोपियां पहन रही हैं यहां भी यही हाल था।याद आते हैं पंडित जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री और मोरारजी देसाई जैसे प्रधानमंत्री जिन्होंने इस टोपी को सिर के ताज की तरह हमेशा सिर पर धारण किया । राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद,उप प्रधानमंत्री गुलज़ारी लाल नंदा, कांग्रेस अध्यक्ष जगजीवन राम ,राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी , राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा भी आजीवन गांधी टोपी पहनते रहे।
लोग अक्सर एक सवाल हमेशा करते हैं कि जिसे महात्मा गांधी ने आमतौर पर कभी नहीं पहना वह गांधी टोपी कैसे हो गई। निश्चित तौर पर यह एक उम्दा सवाल है।जिसके जवाब के मूल में यह तथ्य छुपा हुआ है कि गांधी जी जब अफ्रीका जेल में गए तो उन्होंने देखा जेल में रहने वाले सभी काले लोगों को एक विशेष तरह की टोपी पहनाई जाती है।यह उन्हें नागवार गुजरा लेकिन एक पहचान का भाव उनके मन में विकसित हुआ।वे जब भारत आए तो कच्छी पगड़ी पहने हुए थे पर उनका ध्यान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए एक टोपी की पहचान बनाने पर केन्द्रित रहा। जो आगे चलकर गांधी टोपी कहलाई।
इस टोपी के उदय काल की एक कहानी यह भी है कि 1919 में गांधी जी उ प्र के रामपुर की यात्रा पर थे, उन्हें बताया गया कि नवाबों के दरबार में एक परंपरा है कि मेहमानों को उनसे मिलते समय अपना सिर ढंकना पड़ता है। रामपुर के इतिहास पर कई किताबें लिखने वाले रामपुर के इतिहासकार 74 वर्षीय नफीस सिद्दीकी ने कहा कि इसने बापू को एक परेशानी में डाल दिया क्योंकि उन्होंने कोई कपड़ा या टोपी साथ नहीं रखी थी।उपयुक्त टोपी खरीदने की तलाश शुरू हुई थी। सिद्दीकी ने कहा, “लेकिन जिन लोगों को यह काम दिया गया था, वे उनके लिए उपयुक्त टोपी नहीं ढूंढ पाए क्योंकि उनमें से कोई भी टोपी उनके लिए उपयुक्त नहीं थी।”
उन्होंने आगे कहा: ‘यह तब था जब खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अली भाइयों – मोहम्मद अली और शौकत अली की मां अबदी बेगम ने गांधी के लिए एक टोपी बुनने का फैसला किया। “और वह टोपी गांधी टोपी के रूप में प्रसिद्ध हो गई,” उन्होंने कहा।गांधी टोपी – नुकीले सिरों और चौड़ी पट्टी के साथ – बाद में अहिंसा और आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में उभरी, उन्होंने कहा।“कई तस्वीरों में, विशेष रूप से 1919 और 1921 के बीच, गांधी को इस टोपी को पहने देखा जा सकता है जो बाद में कांग्रेस पोशाक बन गई।इस टोपी का आगे कपड़ा बदला।
इस बावत गांधी ने काका कालेलकर के साथ एक बातचीत में बताया कि उन्होंने गांधी टोपी कैसे बनाई ? गांधी ने कहा कि उन्होंने भी विभिन्न हिस्सों से संबंधित कई टोपियों को देखा और एक ऐसी टोपी डिजाइन करना चाहते थे जो गर्म मौसम में सिर को ढके और जेब में स्टोर करना आसान हो। उन्होंने पाया कि कश्मीरी टोपी जो वे डिजाइन करना चाहते थे, उसके करीब आ रही थी लेकिन इसमें ऊन का इस्तेमाल किया गया था। गांधी लिखते हैं कि उन्होंने इसके बजाय सूती कपड़े का इस्तेमाल किया और सफेद रंग को चुना क्योंकि सफेद कपड़ों को अधिक नियमित रूप से धोना चाहिए और उन्हें धोना आसान होता है। गांधी टोपी एक सफेद साइडकैप है , जो आगे और पीछे की ओर नुकीली और चौड़ी पट्टी वाली होती है। इसे खादी से बनाया जाता है । इसका नाम भारतीय नेता महात्मा गांधी के नाम पर रखा गया है , जिन्होंने इसे बनाया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सबसे पहले इसके उपयोग को लोकप्रिय बनाया ।
गांधी टोपी भारत में 1919-1921 के दौरान पहले असहयोग आंदोलन के दौरान उभरी। जब यह गांधी द्वारा लोकप्रिय कांग्रेस पोशाक बन गई। 1921 में, ब्रिटिश सरकार ने गांधी टोपी के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया। तब गांधी इसे पहनते थे।
यह अंग्रेजों के टोप की जगह हिंदुस्तानी टोपी गांधी टोपी बनी जो आगे चलकर कांग्रेस की पहचान भी बनी लेकिन आज वह सिर्फ गांधी आश्रमों और कांग्रेस सेवादल में दिखाई देती है।मानना पड़ेगा कि महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक के ग्रामीण अंचलों के लोगों को जो आज भी गांधी टोपी को सिर पर धारण करते हैं। दक्षिण भारत में ही आज भी सबसे अधिक खादी का सामान मसलन तिरंगा झंडा,कुर्ता पायजामा, जैकेट और गांधी टोपियां बनती हैं। आजकल भारत जोड़ो पदयात्रा के अधिकांश भारत यात्री गांधी टोपी लगाए हुए चल रहे हैं।
गांधी टोपी वास्तव भारत की शीतोष्ण जलवायु के भी अनुरुप है चूंकि वह खादी से निर्मित होती है इसलिए गर्मी के मौसम में ठंडक और शीत में सिर को गर्म रखती है।उसका श्वेत रंग भी भव्य लगता है उसकी रोजाना सफाई करना भी ज़रूरी होता जो ताज़गी देता है। इस टोपी के बरक्स संघ ने काली टोपी 1925 में सृजित की जो भारतीय मौसम के ठीक विपरीत है। आजकल सभी दल कांग्रेस की गांधी टोपी की तरह कहीं भगवा,लाल,हरी,पीली,नीली टोपियां लगा रहे हैं।संरक्षण रहे कि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गांधी टोपी विवाद भी चला। धन्य है गांधी टोपी जिसने भारत में रंग-बिरंगी टोपियों का भी अच्छा बाजार बनाया।
बहरहाल आज भी गांधी टोपी का क्रेज़ बना हुआ है गांधी के सिद्धांतों के विपरीत काम करने वाले अन्ना हजारे , जैसे सैंकड़ों लोग भी गांधी टोपी ही पहनते हैं। मुलायम सिंह भी गांधी टोपी प्रेमी हैं। लेखक विष्णु प्रभाकर की टोपी भी चर्चित रही। ये गांधी जी के करिश्माई व्यक्तित्व का परिचायक है।जिसने खुद टोपी या कहें ताज नहीं पहना किंतु उन्होंने सबको टोपियां पहना दी।





