ब्रिटिश लाइब्रेरी में मौजूद ये पेंटिंग देखिए…

इस पेंटिंग में अगस्त 1765 का एक दृश्य है। युवा मुगल सम्राट शाह आलम ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल रॉबर्ट क्लाइव के साथ एक समझौते पर दस्तखत कर रहे हैं। इसके बाद बंगाल, बिहार और ओडिशा के रेवेन्यू पर मुगलों की जगह ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार हो गया।
यही वो पल था जब कंपनी ने कपड़ों, मसालों के कारोबार से आगे कुछ ऐसा करना शुरू किया जो पहले कभी नहीं हुआ था। अगले कुछ सालों में कंपनी के 250 क्लर्कों ने 20 हजार भारतीय सैनिकों के साथ मिलकर पूरे बंगाल का शासन अपने हाथों में ले लिया। अगले 50 साल में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना 2.50 लाख से ज्यादा हो गई और इसने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को अपना उपनिवेश बना लिया।
नारायण सिंह नाम के एक मुगल अधिकारी ने 1765 में शाह आलम के साथ हुए समझौते के बाद कहा था, ‘अब क्या इज्जत रह गई है। जब हमें ऐसे अंग्रेज कारोबारियों के आदेश को मानना पड़ेगा, जिन्हें अब तक ठीक से अपना पिछवाड़ा धुलना भी नहीं आया।’
अक्सर हम कहते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने भारत को गुलाम बनाया, लेकिन सच्चाई ये है कि कुछ घुमंतू व्यापारियों की एक प्राइवेट कंपनी ने भारत को गुलाम बनाया था। ‘आजादी का मोल’ सीरीज के चौथे और आखिरी पार्ट में इसी ईस्ट इंडिया कंपनी की कहानी…
रेंगते ब्रिटेन में पैदा हुई एक प्राइवेट कंपनी
1600 ईस्वी के उस सिनैरियो पर गौर कीजिए। भारत में मुगल बादशाह अकबर का शासन था। दुनिया के कुल उत्पादन का 25% अकेले यहीं तैयार होता था। देश आर्थिक रूप से इतना समृद्ध था कि दूर-दराज की दुनिया से लोग भारत देखने आते थे।
ठीक इसी वक्त ब्रिटेन में महारानी एलिजाबेथ प्रथम का शासन था। देश गृहयुद्ध से उबर रहा था। अर्थव्यवस्था खेती पर निर्भर थी। दुनिया के कुल उत्पादन का महज 3% यहां होता था। ब्रिटेन के घुमंतू व्यापारी अवसर की तलाश में दूर देशों की यात्राएं करते रहते थे।
ऐसे ही एक व्यापारी राल्फ फिच ने भारत की यात्रा की। उनसे मिली जानकारी के आधार पर सर जेम्स लैंकेस्टर ने ब्रिटेन के 200 रसूखदार व्यापारियों को एकजुट किया और 31 दिसंबर 1600 को एक नई कंपनी की नींव डाली। जिसका नाम पड़ा- ईस्ट इंडिया कंपनी। इस कंपनी को ब्रिटेन की महारानी से पूर्वी एशिया में व्यापार का एकाधिकार मिल गया।

ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना करने वाले ब्रिटिश घुमंतू व्यवसायी जेम्स लैंकेस्टर की तस्वीर। (सोर्सः विकीमीडिया कॉमन्स)
इधर भारत में 1605 ईस्वी में मुगल बादशाह अकबर का निधन हो गया। जिसके बाद उनके बेटे जहांगीर ने सत्ता संभाल ली। 1608 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी के कैप्टन विलियम हॉकिंस ने पहली बार भारत के सूरत बंदरगाह पर कदम रखा।
मुगल बादशाहों से ईस्ट इंडिया कंपनी का सामना
विलियम हॉकिंस ने जल्द ही समझ लिया कि मुगलों की विशाल सेना से लड़कर कुछ हासिल नहीं होगा। वो 1609 में मुगल राजधानी आगरा पहुंचा और व्यापार की अनुमति मांगी।
गुजरात में पुर्तगाली पहले से ही मुगल बादशाह के अंडर में कारोबार कर रहे थे। पुर्तगालियों के विरोध के कारण ईस्ट इंडिया कंपनी को शुरुआत में व्यापार करने की अनुमति नहीं मिली। जिसके बाद कंपनी ने थॉमस रो को भारत भेजा।
कंपनी ने 1615 में थॉमस रो को अपने राजदूत के रूप में 600 पौंड सालाना की तनख्वाह पर रखकर कारोबार बढ़ाने का जिम्मा सौंपा था। थॉमस रो ने जहांगीर को कीमती तोहफों और अपनी बातचीत से प्रभावित कर लिया। इसके बाद कंपनी का कारोबार और भारत में ब्रिटिश फौज लाने का रास्ता साफ हुआ।
शुरुआत में कंपनी चांदी के बदले भारत से चाय, मसाले, रेशम, कपास, गुड़ का शीरा, कपड़ा और खनिज ले जाती थी। उसे विदेशों में बेचकर बड़ा मुनाफा कमाती थी। खासतौर पर ढाका के मलमल की ब्रिटेन में बड़ी मांग थी। करीब 5 दशक तक ऐसा चलता रहा।

ईस्ट इंडिया कंपनी पानी वाली जहाजों के जरिए एक देश से दूसरे देश में कारोबार करती थी। (सोर्सः रॉयल म्यूजियम ग्रीनविच)
भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिद्वंद्वी पुर्तगाली और फ्रांसीसी थी। इनसे मुकाबले करने के लिए 1670 में ब्रिटिश सम्राट चार्ल्स द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को विदेश में जंग लड़ने और उपनिवेश बनाने का अधिकार दे दिया। ये एक अहम फैसला साबित हुआ।
कंपनी ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को हराकर कई क्षेत्रों में कब्जा जमाना शुरू किया। 1686 में तो ब्रिटेन से सेना बुलाकर वो मुगलों से भी भिड़ गए। हालांकि इसमें कंपनी की बुरी तरह हार हुई।
औरंगजेब ने ईस्ट इंडिया कंपनी के तमाम फैक्ट्री आउटलेट्स की घेराबंदी करवा दी। ब्रिटिश सरकार ने अपने अधिकारियों को भेजकर औरंगजेब से माफी मांगी। इसके बाद वापस उन्हें व्यापार की इजाजत मिल सकी।
1707 में औरंगजेब के निधन के बाद सभी नवाब अपनी-अपनी ताकत दिखाने लगे। ईस्ट इंडिया कंपनी एक नवाब के खिलाफ दूसरे की मदद करने लगी और अपनी ताकत बढ़ाती रही।
प्लासी की लड़ाई और ईस्ट इंडिया कंपनी की धमक
बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिक बढ़ाने से खफा थे। 23 जून 1757, प्लासी में राबर्ट क्लाइव की अगुआई में ईस्ट इंडिया कंपनी और सिराजुद्दौला के बीच जंग हुई। ईस्ट इंडिया कंपनी ने नवाब की सेना के सेनापति मीर जाफ़र को अपने साथ मिला लिया था, जिसे नवाब बनने की चाहत थी।

करीब 50 हजार सैनिक, 500 हाथी और 50 तोपों से लैस सिराजुद्दौला की सेना, ईस्ट इंडिया कंपनी के 3,000 सैनिकों से हार गई। प्लासी की लड़ाई के बाद रॉबर्ट क्लाइव और मीर जाफर। (सोर्सः विकिमीडिया कॉमन्स)
मीर जाफर को बंगाल की गद्दी मिली, लेकिन उसकी आर्थिक कमान अंग्रेजों के हाथ में थी। मीर जाफर ने कंपनी से पीछा छुड़ाने के लिए डच सेना की मदद ली, लेकिन हार गए।
इसके बाद बंगाल प्रांत के टैक्स कलेक्शन की कमान ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में आ गई। तब बंगाल में आज का पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा शामिल थे। इसकी राजधानी मुर्शिदाबाद थी। जिसकी चकाचौंध लंदन से कहीं ज्यादा थी।
इस जीत ने कंपनी के बिजनेस मॉडल को बदल दिया। अब तक जो कंपनी मुनाफे के लिए व्यापार करती थी, उसका पूरा फोकस टैक्स कलेक्शन पर हो गया। 1784 में ब्रिटिश संसद ने ‘इंडिया एक्ट’ पारित कर दिया, जिसके बाद भारत की धरती पर ब्रिटिश साम्राज्य का शासन हो गया।
1857 के संग्राम तक खूब फली-फूली ईस्ट इंडिया कंपनी
कंपनी को जल्द ही लगने लगा कि कठपुतली नवाब काम नहीं आएंगे। सत्ता अपने हाथ में होनी चाहिए। तब 1765 में मीर जाफर की मौत के बाद कंपनी ने रियासत अपने हाथ में ली। मुगल सम्राट ने कंपनी को बंगाल का दीवान बना दिया यानी “कंपनी बहादुर” अस्तित्व में आया।

1803 में लंदन स्थित ईस्ट इंडिया कंपनी का ऑफिस। ये तस्वीर ‘Old and New London’ किताब के पेज नंबर 787 से ली गई है।
अंग्रेजों के सामने दो बड़ी चुनौतियां तब भी थीं। दक्षिण में टीपू सुल्तान और विंध्य के दक्षिण में मराठा। टीपू ने फ्रेंच व्यापारियों से दोस्ती कर ली थी। सेना को आधुनिक बना लिया था। वहीं, मराठा दिल्ली के जरिए देश पर शासन करना चाहते थे।
कंपनी ने टीपू और उनके पिता हैदर अली से चार युद्ध लड़े, लेकिन 1799 में टीपू श्रीरंगपट्टनम की जंग में मारे गए। इसी तरह, पानीपत की तीसरी लड़ाई में हार के बाद मराठा साम्राज्य टुकड़ों में बंट गया। 1819 में अंग्रेजों ने पेशवा को पुणे से लाकर कानपुर के पास बिठूर में बिठा दिया।
इस बीच, पंजाब बड़ी चुनौती बना रहा। महाराजा रणजीत सिंह जब तक रहे, तब तक उन्होंने अंग्रेजों की दाल नहीं गलने दी, लेकिन 1839 में उनकी मौत के बाद हालात बदल गए। दो लड़ाइयां और हुईं और दस साल बाद पंजाब पर अंग्रेज काबिज हो गए।
1848 में लॉर्ड डलहौजी विलय नीति लेकर आए। जिस शासक का कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होता था, उस रियासत को कंपनी अपने कब्जे में ले लेती। इस आधार पर सतारा, संबलपुर, उदयपुर, नागपुर और झांसी पर अंग्रेजों ने कब्जा जमाया। इसने 1857 की क्रांति के बीज बोए।
सीताराम पांडे ने “फ्रॉम सिपॉय टू सूबेदार” संस्मरण में लिखा है कि यह सबको लग रहा था कि अंग्रेज भारतीय धर्मों का सम्मान नहीं करते। नाराजगी तो थी, लेकिन जब यह खबर आई कि नई बंदूकों के कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी का लेप है तो कंपनी में सिपाही भड़क गए।
1857 में मेरठ में सिपाही विद्रोह के चलते मंगल पांडे को फांसी पर चढ़ाया गया। वहां से उठी चिनगारी ने झांसी, अवध, दिल्ली, बिहार में क्रांति को हवा दी। रानी लक्ष्मीबाई, बहादुर शाह जफर, नाना साहेब आदि ने मिलकर एक साथ बगावत कर दी।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीकात्मक चित्र (सोर्सः विकीमीडिया कॉमन्स)
आखिरकार खत्म हो गई ईस्ट इंडिया कंपनी
19वीं सदी की शुरुआत में ही ईस्ट इंडिया कंपनी की मोनोपॉली पर ब्रिटेन में ही तमाम सवाल उठ रहे थे। ब्रिटिश संसद ने 1813 में अन्य कंपनियों को भी भारत में व्यापार करने के रास्ते खोल दिए।
1833 में ब्रिटिश कंपनी से व्यापार का अधिकार छीन लिया गया और उसे एक सरकारी कॉर्पोरेशन में बदल दिया गया। 1857 की क्रांति को ईस्ट इंडिया कॉर्पोरेशन की नाकामी माना गया। ब्रिटेन की महारानी ने इस कंपनी के सभी अधिकारों को खत्म कर दिया और वो भारत पर सीधा शासन करने लगीं।
कंपनी की करीब 2.50 लाख की सेना का ब्रिटिश सेना में विलय कर दिया गया। आखिरकार भारत को करीब 1 सदी तक गुलाम बनाकर रखने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी को 1874 में भंग कर दिया गया।





