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कैसे करेंगे साम्प्रदायिक राजनीति का मुकाबला?

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संदीप पांडेय

देश की आजादी और बंटवारे के समय साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ गया था क्योंकि बंटवारा ही साम्प्रदायिक आधार पर हो रहा था। किंतु महात्मा गांधी के बलिदान के बात भारत में तो कुछ दशकों के लिए माहौल शांत हो गया था। दंगों की घटनाएं हो जाया करती थीं किंतु कुछ अवसरों को छोड़कर, जैसे शाह बानो के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटने के बदले में बाबरी मस्जिद का ताला खोलना, राजनीति का आधार साम्प्रदायिक नहीं था। हिंदुत्व की राजनीति के राम मंदिर आंदोलन से देश का माहौल एक बार फिर बिगड़ना शुरू हुआ जिसकी परिणति भाजपा के सत्ता में आने से हुई। भाजपा के दूसरे प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की तो प्रधान मंत्री पद के लिए दावेदारी में उनकी गुजरात 2002 की साम्प्रदायिक हिंसा में संदिग्ध भूमिका का भी योगदान रहा। उसके बाद तो तेजी से घटनाक्रम बदला। एक के बाद एक चार ऐसे बुद्धिजीवियों – नरेन्द्र दाभोलकर, गोविंद पंसारे, एम.एम. कलबुर्गी व गौरी लंकेश की दिन दहाड़े हत्या कर दी जाती है जो हिंदुत्व की विचारधारा के विरोधी रहे। कई ऐसे, खासकर मुस्लिम, लोगों की हत्या कर दी गई जिनपर शक था कि उन्होंने गौमांस खाया, गौकशी के धंधे में शामिल थे अथवा सिर्फ मुसलमान होना ही उनका जुर्म था। कई पत्रकारों व प्रोफेसरों को, जो हिन्दुत्व की विचारधारा के आलोचक रहे उन्हें या तो अपने संस्थान छोड़ने पड़े अथवा उन्हें निकाला गया। विश्वविद्यालय परिसरों पर हिन्दुत्व के अलावा अन्य विचाराधाओं के कार्यक्रम बाधित किए जाने लगे या उन्हें अनुमति मिलनी बंद हो गई। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के आदेश को मुसलमानों ने यह सोच कर चुपचाप स्वीकार कर लिया था कि अब इसके अलावा ऐसे कोई मामले नहीं उठाए जाएंगे। लेकिन देखते ही देखते मथुरा व काशाी के अलावा नई जगहों पर भी मस्जिद या दरगाहों के नीचे मंदिर के सबूत खोेजे जाने लगे। इसमें सम्भल में पुलिस के गोलीचालन में कुछ मुसलमानों की जानें भी चली गईं। असम में पहले राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की कवायद यह सोच कर की गई कि बड़ी संख्या में मुसलमान अपनी नागरिकता सिद्ध नहीं कर पाएंगे। किंतु जब 19 लाख छूट गए लोगों में ज्यादातर हिंदू निकले तो सरकार एक नागरिकता संशोधन अधिनियम लेकर आई जिसमें साफ-साफ कहा गया कि यदि पड़़ोसी देशों से कोई मुसलमान आएगा तो उसे नागरिकता दिए जाने की प्रकिया सहज नहीं होगी। देश में शायद यह पहली बार हो रहा था कि कोई कानून धर्म के आधार पर भेदभाव कर रहा था जो संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ था। मुस्लिम नेता आजम खान को किसी न किसी ऐसे आरोप में जेल में रखा जा रहा है जो यदि दूसरों पर भी लागू होने लगे तो पहले से ही अपनी क्षमता से ज्यादा बंदियों वाली जेलों में जगह कम पड़ जाएगी। आपराधिक पृष्ठभूमि के अतीक अहमद की तो प्रयागराज में पुलिस संरक्षण में हत्या कर दी गई और मुख्तार अंसारी भी जेल में मर गए लेकिन बृज भूषण शरण सिंह आज भी कुश्ती संघ चला रहे हैं और अजय मिश्र टेनी के बेटे किसानों की हत्या करने के बाद भी जमानत पर हैं। जम्मू-कश्मीर में तो तब हद हो गई जब कटरा स्थित मां वैष्णो देवी उत्कृष्ट चिकित्सीय संस्थान सिर्फ इसलिए बंद करा दिया गया क्योंकि अखिल भारतीय परीक्षा नीट से चयनित दाखिला लेने वाले 50 छात्रों में से 42 मुसलमान थे। 

इन घटनाओं से भाजपा को हिन्दू मतों के धु्रवीकरण में मदद मिलती है इसलिए ऐसी घटनाओं पर कोई रोक नहीं है। उल्टे पुलिस और न्यायालय हिन्दुत्ववादी शक्तियों के पक्ष में ही खड़े नजर आते हैं। इसलिए इन घटनाओं पर रोक भी नहीं लग रही। इस ध्रवीकरण की सबसे खराब स्थिति मणिपुर में नजर आती है जहां मैतेई और कुकी समुदायों के जिले बंट गए हैं और वे एक दूसरे के जिले में नहीं जा सकते। हाल ही में जब एक मैतेई पति अपनी कुकी पत्नी से मिलने चूराचांदपुर गया तो उसकी हत्या हो गई। मैतेई और कुकी के बीच हिंसा को भड़के तीन वर्ष होने जा रहे हैं लेकिन अभी भी मैतेई और कुकी एक जगह एकत्रित नहीं हो सकते। यही गुजरात माॅडल है जिससे भाजपा को राजनीतिक फायदा मिलता है।

पूरा देश इस राजनीतिक ध्रुवीकरण को सहमा हुआ देख रहा है। कैसे नफरत और हिंसा की भावनाओं पर लगाम लगाई जाए किसी को समझ नहीं आ रहा। लेकिन कुछ ऐसे लोग अभी भी हैं जो अपने स्तर से इस साम्प्रदायिक राजनीति का माकूल जवाब दे रहे हैं।

जम्मू में जब जम्मू विकास प्राधिकरण ने पत्रकार अरफाज़ डैंग का 3 कैनाल पर बना घर तोड़ा तो तुरंत पड़ोसी कुलदीप शर्मा ने अपनी 5 कैनाल की जमीन अरफाज़ के परिवार को देने का ऐलान किया। कुलदीप शर्मा ने यह भी कहा कि यदि सरकार उसकी अपनी जमीन पर बने घर को भी तोड़ेगी तो वह अरफाज़ को 10 कैनाल जमीन देगा। कुलदीप शर्मा की पहल से खुश होकर पुलवामा और पम्पोर के दो व्यापारियों ने कुलदीप शर्मा को जमीनें देने का ऐलान किया। इस तरह से साम्प्रदायिक राजनीति के इरादे का जनता ने मिलकर ऐसा जवाब दिया कि उस राजनीति की मंशा पूरी नहीं हुई।

असम के मुख्यमंत्री ने ऐसा बयान दिया जिसमें उन्होंने अपने पद की गरिमा का भी ध्यान नहीं रखा। हेमंत बिस्वा शर्मा ने हिन्दुओं से कहा कि यदि कोई बंगाली बोलने वाला मुस्लिम, यानी जिसके बंगलादेशी होने की अशंका है, रिक्शेवाला 5 रुपए मांगे तो उसे 4 रुपए दें। इस पर एक मुस्लिम सज्जन ने मुसलमनों को सम्बोधित करते हुए सोशल मीडिया पर डाला कि यदि कोई हिन्दू रिकशेवाला 10 रुपए मांगे तो उसे 11 रुपए दें। हेमंत बिस्वा शर्मा को तो इस जवाब पर शर्म आनी चाहिए लेकिन शायद उनके लिए हिन्दू मतों का धु्रवीकरण ऐसी एक प्राथमिकता है कि वे इस पर ध्यान भी नहीं देंगे। इसके बाद उन्होंने एक और घिनौना कृत्य करते हुए एक विडियों में खुद को मुसलमानों को बंदूक के निशाने पर लेते हुए दिखाया। 

देवभूमि उत्तराखण्ड में कोटद्वार में दीपक कुमार ने वाकई में एक देव तुल्य कृत्य किया जब एक 71 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार को उसकी दुकान के नाम को लेकर परेशान करने आए हिन्दुत्ववादी कार्यकर्ताओं को ऐसा करने से रोका एवं मजबूती से मुस्लिम दुकानदार के साथ खड़े रहे। इसकी वजह से उनके जिम में लोगों ने आना बंद कर दिया किंतु दीपक, जो अब मोहम्मद दीपक के नाम से मशहूर हो गए हैं, को पूरे देश में जगह जगह से समर्थन मिला। उन्हें आर्थिक मदद भी मिली जिससे उनको हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई हो सके।

यदि संघ परिवार के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का जवाब देना है तो और लोगों को कुलदीप शर्मा व दीपक कुमार बनना होगा या उस मुसलमान जैसा बनना पड़ेगा जिसने सोशल मीडिया पर हेमंत बिस्वा शर्मा के जवाब में अपना वक्तव्य डाला। हिन्दुत्व की राजनीति की हवा ऐसा करके ही निकाली जा सकती है। धीरे धीरे जनता गलत को छोड़कर सही के साथ जरूर खड़ी होगी।

लेखकः संदीप पाण्डेय

सम्पर्कः 0522 2355978, 3564437

e-mail: ashaashram@yahoo.com

लेखक परिचयः संदीप पाण्डेय सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) के प्रधान महासचिव हैं।

Ramswaroop Mantri

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