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मानवीय सरोकार …अपने लिए जिए तो क्या जिए ?

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पुष्पा गुप्ता (महमूदाबाद)

मृत्यु के कुछ समय तक तो व्यक्ति को लगता ही नहीं कि वह मर गया है। वह उसी तरह देखता है, सुनता है, वह अपने आस-पास अपने सगे सम्बन्धियों को देखता है, उनकी बातचीत को भी सुनता- समझता है। कमरे में प्रत्येक वस्तु को देखता है। आश्चर्य करता है कि क्यों लोग उसके लिए रो रहे हैं ?
धीरे-धीरे उसकी समझ में आने लगता है और उसे आभास होने लगता है कि कुछ असामान्य घटा है। जैसे ही वह पाता है कि कमरे की वस्तुएं उसके लिए अब बाधा नहीं बन पा रहीं हैं और उनके आर-पार वह देख सकता है और जा भी सकता है। वह छत के पार भी जा सकता है और वहां से भी भीतर की वस्तुओं को देख सकता है।
उसको यह भी अनुभव होता है कि वह पहले से अधिक हल्का हो गया है और लगता है कि वह क्षण भर में जहाँ चाहे वहां पहुँच सकता है।
स्वर्ग-नर्क की धारणाएं व्यर्थ, भ्रामक और मनगढ़ंत हैं। मृत्यु के बाद हमारे कर्म, हमारे विचार ही हमारे साथ रहते हैं और हम उन्हीं के अनुसार सभी प्रकार के दुःख-सुख का अनुभव करते हैं। कोई अन्य शक्ति या, कोई अन्य कारक हमें दुःख-सुख नहीं देता है। हमने जो कुछ किया है, जो कुछ कहा है और जो कुछ सोचा है–वही हमारे लिए आगे के लिए दुःख-सुख का कारक बनता है ।
सच तो यह है कि धरती पर अपने जीवन काल ही में मनुष्य अपनी उस शैया का निर्माण कर लेता है जिस पर उसे अंत में लेटना है।

*सूक्ष्म लोक में शिक्षण :*

सूक्ष्म लोक में मनुष्य की विद्या, बुद्धि, विचार और अवधारणाएं पृथ्वी लोक की ही तरह होती हैं बल्कि पढने-लिखने, सोचने- समझने की शक्ति और अधिक बढ़ जाती है। यदि वह पढना चाहे तो सूक्ष्म लोक में वह आसानी से पढ़-समझ सकता है बल्कि जो जिस योग्य है उसे वहां बहुत कुछ पढ़ाया-सिखाया जाता है।
यही कारण है कि लोग जन्म से ही भिन-भिन्न संस्कार, भिन्न-भिन्न रुचियों को ले कर जन्म लेते हैं। कोई जन्म लेने के कुछ समय बाद ही सन्यासी बनने लगता है तो कोई डकैत। कोई गणित में गति रखता है तो कोई साहित्य में। कोई कला में पारंगत होता है तो कोई वेदान्त में।
यह सब यूँ ही नहीं होता। इसके पीछे सूक्ष्म लोक के शिक्षण और संस्कार होते हैं जो पूर्वजन्म के शिक्षण संस्कार और अभिरुचियों को आधार बना कर गढ़े जाते हैं।
हम जो कुछ बोते हैं–वही काटते हैं और कर्म से किसी भी प्रकार से मुक्ति नहीं। हम पृथ्वी के किसी कोने में जा छिपें, कर्म हमारा पीछा नहीं छोड़ेगा। जीवन ही कर्म है। जन्म कर्म का आरम्भ है और मृत्यु कर्म का अंत। जीवन में कर्म को रोकना असंभव है। जीने की प्रत्येक क्रिया कर्म है। श्वास भी लेना कर्म है।
उठना, बैठना, सोचना, विचारना भी कर्म है। जीना कर्म की ही प्रक्रिया है। जो लोग यह सोचते हैं की वे जीते जी कर्म का त्याग कर दें तो वे केवल असंभव बातें सोच रहे हैं। यह संभव नहीं हो सकता है।
गृहस्थ एक प्रकार से कर्म करता है और सन्यासी दूसरे प्रकार से कर्म करता है। गृहस्थ आसक्त भाव से कर्म करता है और सन्यासी अनासक्त भाव से कर्म करता है। दोनों ही कर्म करते हैं। लेकिन दोनों के कर्मों में भेद है। आसक्त भाव से कर्म करने वाले को कर्मफल मिलता है जबकि अनासक्त भाव से कर्म करने वाले को कर्म फल नहीं मिलता है।
उसको कर्मफल मिलने का एक मात्र कारण है –उसकी कर्मफल के प्रति आसक्ति।
हम जैसे जी रहे हैं, वैसे ही जीते रहें, वैसे ही करते रहें। कर्म को बदलने की आवश्यकता नहीं। आवश्यकता है केवल कर्ता को बदलने की। वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि हम क्या कर रहे और क्या नही ?
वास्तविक प्रश्न यह है कि भीतर हम क्या हैं ? यदि भीतर हम गलत हैं तो हम जो भी करेंगे, वह गलत ही होगा, दोषपूर्ण होगा। यदि हम भीतर सही हैं तो हम जो भी करेंगे ,वह निर्दोष होगा, उसका फल भी सही होगा।
वास्तविक कर्म उसी समय शुरू होता है जिस दिन कर्म दूसरे के लिए होता है। अपने लिए ही जीना पर्याप्त नहीं है। जो केवल अपने लिए जीता है, उसका जीवन एक बोझ है। लेकिन जब व्यक्ति अपने लिए सब प्राप्त कर चुकता है, सब जान चुका होता है फिर भी जीता है, तो उसके लिए पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण समाप्त हो जाता है।
वह बिना भार के, बिना बोझ के जीता है। इस साधारण जीवन में वे ही क्षण आनंद के हैं जब हम थोड़ी देर के लिए दूसरे के लिए जीते हैं। माँ जब अपने बेटे के लिए जी लेती है तो आनंद से भर जाती है। पिता जब बेटे के लिए, मित्र जब मित्र के लिए जीता है तो वह आनंद में डूब जाता है।
क्षणभर भी यदि हम दूसरे के लिए जी लेते हैं तो ही हमारे जीवन में आनंद ही आनंद रहता है।
🍃चेतना विकास मिशन :

Ramswaroop Mantri

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