मी लार्ड !
क्या हुआ उस मुकदमें का
जो चलाया जा रहा था
एक विदूषक के खिलाफ
अदालत की अवमानना के लिए ?
क्या रख दिया गया है उसे
ठण्डे बस्ते में…..!
इस सोच के साथ
कि यदि फिर कभी खतरा हुआ
तो निकाल लाया जायेगा…..!
क्या अब न्यायालय यह सोचता है
कि सर पर लटकी हुई
तलवार का भय
सजा से ज्यादा कारगर है ?
क्या न्यायालय भी अब
अवसर वादी हो गया है ?
नहीं….. नहीं….
मी लार्ड !
मुझे कदाचित ऐसा नहीं कहना चाहिए था
न्यायालय को
अवसरवादी कहना भी तो
उसकी अवमानना ही है….!
सुप्रसिद्ध कवि व लेखक- रामकिशोर मेहता ,अहमदाबाद, गुजरात, संपर्क - 919408230881, ईमेल - ramkishoremehta9@gmail.com
संकलन -निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद,




