प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रियंका गांधी वाड्रा की एक अच्छी पहल ।
एस पी मित्तल, अजमेर
31 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के पांच जिलों के 21 विधानसभा क्षेत्रों के भाजपा कार्यकर्ताओं को वर्चुअल तकनीक से संबोधित किया। यानी पीएम मोदी दिल्ली में अपने सरकारी आवास पर थे तो भाजपा के कार्यकर्ता अपने अपने विधानसभा क्षेत्रों में न्यूज चैनलों अथवा एलईडी स्क्रीन पर अपने नेता का भाषण सुन रहे थे। भाजपा कार्यकर्ताओं ने मंडल और वार्ड स्तर पर एकत्रित होकर मोदी का भाषण सुना लिया। ऐसा ही वर्चुअल संवाद दो दिन पहले कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव श्रीमती प्रियंका गांधी ने भी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के साथ किया था। सब जानते हैं कि चुनाव के दौरान जो राजनीतिक रैलियां होती है उन पर करोड़ों रुपया खर्च होता है। वार्ड, मंडल, ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर जो नेता कार्यकर्ताओं की रैलियों में ले जाते हैं उन्हें पता है कि कितना खर्च होता है। कार्यकर्ता के खाने पीने से लेकर परिवहन तक की व्यवस्था की जाती है। कई बार तो कार्यकर्ताओं के नाम पर दिहाड़ी मजदूरों को बसों में भरकर ले जाया जाता है। यानी मजदूर को दिन भर का निर्धारित पारिश्रमिक भी देना पड़ता है। ऐसा किसी एक राजनीतिक दल में नहीं बल्कि सभी दलों में होता है। चूंकि बड़ी राजनीतिक रैलियों का खर्च संबंधित राजनीतिक दल के जिम्मे होता है, इसलिए यह पता ही नहीं चलता कि कौन सा प्रत्याशी कितनी राशि खर्च कर रहा है। इसके विपरीत यदि कार्यकर्ता अपने नेता का भाषण घर बैठे सुनले तो सारे खर्चों से बचा जा सकता हे। जब कभी राजनीति में भ्रष्टाचार की बात होती है तो उसका एक कारण चुनावी खर्च भी होता है। चुनाव आयोग भले ही सांसद और विधायक के चुनाव में खर्च की सीमा निर्धारित करता हो, लेकिन सब जानते हैं कि इन चुनावों में करोड़ों रुपया खर्च होता है। चुनाव में खर्च हुए पैसों का सांसद और विधायक बनने के बाद वसूला भी जाता है। यदि चुनाव में पैसा कम खर्च होगा तो राजनीति में स्वच्छता भी आएगी। इसलिए पीएम मोदी और प्रियंका गांधी ने वर्चुअल तकनीक से कार्यकर्ताओं को संबोधित करने की जो पहल की है उसका स्वागत किया जाना चाहिए। अब जब छोटे छोटे बच्चे स्कूल की पढ़ाई मोबाइल और लैपटॉप पर कर रहे है तो फिर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी अपने नेता का भाषण टीवी स्क्रीन पर सुन सकते हैं। चुनावी रैलियां में जितनी भीड़ जुटाई जा सकती है उससे कहीं ज्यादा वर्चुअल तकनीक से नेता का संदेश पहुंचाया जा सकता है। लोगों को जब दूसरे स्थान पर जाकर भाषण नहीं सुनना पड़ेगा, तब लोग अधिक संख्या में एकत्रित होकर अपने वार्ड के किसी सार्वजनिक स्थल पर नेता का भाषण सुन सकते है। वर्चुअल तकनीक के संबोधन से न केवल धन की बचत होगी, बल्कि समय भी ज्यादा नहीं लगेगा। लोग निर्धारित समय पर एकत्रित होकर भाषण सुन सकते हैं। रैली की भीड़ में तो कार्यकर्ताओं की संख्या का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन जब वार्ड स्तर पर बड़ी स्क्रीन के सामने कार्यकर्ताओं को बैठाया जाएगा तो संबंधित राजनीतिक दल को वार्ड स्तर पर अपने संगठन की स्थिति का अंदाजा भी लग जाएगा। राजनीतिक दलों को चाहिए कि चुनावी रैलियां वर्चुअल तकनीक से करे और वार्ड स्तर पर कार्यकर्ताओं को एकत्रित होने दें। मीडिया की भी यह जिम्मेदारी है कि जो पहल मोदी और प्रियंका गांधी ने की है उसका ज्यादा से ज्यादा प्रचार प्रसार करें।





