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भ्रम एवं विभ्रम : आयुर्वेदिक चिकित्सा दृष्टिकोण

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डॉ. विकास मानव

आयुर्वेदीय साहित्य में भ्रम और विभ्रम अनेक स्थलों पर समान अर्थों में प्रयुक्त मिलते है। किन्तु ये दोनों दो भिन्न भिन्न विकृतियों है भ्रम एक शारीरिक या मनोदैहिक व्याधि है जबकि विभ्रम विशुद्ध रूप से मानसिक व्याधि है। भ्रम से आधुनिक 'Vertigo' का तथा विभ्रम से 'Delusion' का ग्रहण होता है।

भ्रम (Vertigo) :
रजः पित्तानिलाद् भ्रमः
मानस दोष रज एवं शारीरिक दोष पित्त एवं वायु के कारण भ्रम रोग की उत्पत्ति होती है। ये दोष सम्मिलित रूप से एवं पृथक् पृथक् भी भ्रम उत्पन्न कर सकते हैं। मेरा नाड़ी परीक्षा के प्रसंग में अनेक बार का अनुभव है कि जिन रोगियों में वात-पित्त की नाड़ी एक साथ प्रव्यक्त होकर चलती है उनमें भ्रम लक्षण अवश्य मिलता है।
भ्रम रोग में गोल-गोल घूमना प्रमुख लक्षण है। यह घूमना शिर का भी हो सकता है और आस-पास की चीजों का भी हो सकता है।
चक्रवद् भ्रमतो गात्रं भूमौ पतति सर्वदा।
भ्रमरोग इति ज्ञेयो रजः पित्तानिलात्मकः।।
इसके कारण रोगी कभी जमीन पर गिर भी सकता है। वस्तुतः यह विकृति की अवस्था पर निर्भर करता है भ्रम में रोगी की संज्ञा मात्र क्षणभर के लिए बाधित होती है किन्तु विकृति की अधिकता से जब संज्ञा अधिक बाधित होने लगती है तो रोगी भूमि पर गिरता है और फिर स्वयं ही उठ भी जाता है। यह क्रिया बार-बार हो सकती है जो ‘सर्वदा’ शब्द से अभिप्रेत है।

भ्रम रोग स्पष्टतः दो प्रकार का हो सकता है- १. स्वतन्त्र तथा २. परतन्त्र। रज, पित्त, वायु की विकृति से होने वाला भ्रम स्वतन्त्र प्रकार का है, जबकि अन्य व्याधियाँ जैसे उच्च रक्तचाप, पाण्डु, मधुमेह, कर्णरोग, हृद्रोग, ग्रीवा रोग आदि के कारण होने वाला भ्रम रोग परतन्त्र श्रेणी का है।
इनका व्यच्छेदक निदान बहुत आवश्यक है क्योंकि जब तक मूल व्याधि का उपचार नहीं किया जाता परतन्त्र प्रकार का भ्रम ठीक नहीं होता है।

चिकित्सा :
भ्रम रोग की चिकित्सा करते समय उसके मूल कारणों पर ध्यान देना आवश्यक है। भ्रम लक्षण के साथ आये हुए रोगियों में प्रायः मेघ्य औषधियाँ दी जाती हैं जो उचित नहीं है। निम्न रक्तचाप, पाण्डु, शोष आदि व्याधियुक्त रुग्णों में मात्र मेध्य द्रव्यों का प्रयोग हानिप्रद भी हो सकता है।
उत्तम चिकित्सा क्रम यह है कि दिन में पित्त एवं वातशामक औषधि दी जाये और रात्रि में सोने से पहले मेध्य औषधियों का प्रयोग किया जाये। परतन्त्र स्वरूप के भ्रम रोग में मूल व्याधि की चिकित्सा के साथ-साथ भ्रम नाशक औषधियों का प्रयोग भी करना चाहिए।

उपयोगी प्रमुख औषधियाँ :
एकल औषधि : ब्राह्मी, शंखपुष्पी, जटामांसी, गिलोय (सत्त्व), अश्वगन्धा, बला, मधुयष्टि, शतावरी, आमलकी, धान्यक, दाडिम।
चूर्ण : अश्वगन्धादि, शतावरीकल्प, यष्ट्यादि चूर्ण, सारस्वत चूर्ण, अविपत्तिकर, त्रिफला।
वटी : प्रभाकर, चन्द्रप्रभा, ब्राह्मी, मेघ्या, संशमनी।
भस्म : मुक्तापिष्टि, मुक्ताभस्म, मुक्तापञ्चामृत, प्रवालपञ्चामृत, स्वर्णमाक्षिक, रजत आदि।
रसौषधियाँ : योगेन्द्ररस, स्मृतिसागर, वातकुलान्तक, कृष्णचतुर्मुख, बृहद् वातचिन्तामणि, सूतशेखर, कामदुघा।
आसव/अरिष्ट : द्राक्षासव, अश्वगन्धारिष्ट, सारस्वतारिष्ट, बलारिष्ट, अमृतारिष्ट।
तैल/घृत : ब्राह्मी घृत, कल्याण घृत, मधुयष्टि तैल, ज्योतिष्मती तैल, हिमसागर तैल, ब्राह्मी तैल।

विभ्रम (Delusion / Hallucination) :
पावनादीनां विभ्रमो बलवान् भवेत्।
तं पानविभ्रममुशन्त्यखिलेन धीराः।
धीविभ्रमः सत्त्वपरिप्लवश्च …….।
इन उद्धारणों में विभ्रम शब्द भिन्न-भिन्न अर्थो में प्रयुक्त है। आधुनिक विद्वानों ने विभ्रम शब्द से विशिष्ट मानसिक विकृतियों मिथ्या आभास व मिथ्यावधारणा आदि का ग्रहण किया है।
वस्तुतः अयथार्थ ज्ञान अथवा एक वस्तु या भाव में एक ही समय में अनेक अवधारणाएँ रखना विभ्रम का प्रमुख लक्षण है। ये है कि वो है; ऐसा है कि वैसा है; आदि ऊहापोह की स्थिति बनी रहना विभ्रम सूचक है। यह विभ्रम जब किसी वस्तु को आधार बनाकर होते हैं तो उसे साधार विभ्रम (Delusion) कहते है और जब काल्पनिक विषय को लेकर होते हैं तो निराधार विभ्रम (Hallucination) कहते हैं। जो पदार्थ जैसा है वैसा प्रतीत न होकर अन्यथा प्रतीत हो उसे प्राचीन वाङ्मय में विपर्यय और प्रचलित भाषा में भ्रम कहा जाता है।
सम्प्राप्ति या आश्रय की दृष्टि से विभ्रम तीनों स्तरों पर अर्थात् ज्ञानेन्द्रिय, मन या बुद्धि किसी भी स्तर पर हो सकता है और यह क्रमशः अधिक कष्टसाध्य होता है।

ज्ञानेन्द्रियों द्वारा विभ्रम अनेक कारणों से होता है, जैसे ज्ञान के सहयोगी साधनों की कमी जैसे कम उजालो में दृष्टि-विभ्रम या दीवार बाधा आदि के कारण शब्द का विभ्रम आदि। इन्द्रिय स्थानों की विकृति या स्थानिक रोग के कारण भी विभ्रम होता है।
जैसे तिमिर रोग में दृष्टि-विभ्रम, जीर्ण प्रतिश्याय में गन्ध- विभ्रम या कर्णनाद में श्रवण- विभ्रम आदि । परन्तु इन्हें मानस रोग नहीं मानना चाहिए। इनमें मानसोपचार की अपेक्षा स्थानिक उपचार की आवश्यकता होती है। किन्तु कभी-कभी मानसिक कारणों से भी इन्द्रिय-विभ्रम होता है, तब मानसोपचार अपेक्षित होता है।
मानसिक स्तर पर विभ्रम रजो दुष्टि के कारण होता है। यह साधार एवं निराधार दोनों स्वरूप का हो सकता है। साधार विभ्रम में वस्तु या घटना सामने रहती है और उसके विषय में ऊहापोह या मिथ्या प्रतीति होती है। निराधार विभ्रम विशुद्ध रूप से मन की उपज होता है।
यह मिथ्या धारणा, भय, संस्कार-दोष, हीनसत्त्वता आदि के कारण होता है और अपेक्षाकृत अधिक कष्टसाध्य होता है। ऐसे रोगी विभ्रम के परिणामस्वरूप चिन्ता, शोक, उद्वेग, उन्माद जैसे अन्य मानस रोगों से शीघ्र आक्रान्त हो जाते हैं।
बौद्धिक स्तर पर भी विभ्रम हो सकता है। रज एवं तम दोषों की विकृति के कारण बुद्धि-विभ्रम होता है। स्मृतिदोष, धृतिहीनता, द्विधाबुद्धि प्रवृत्ति आदि बौद्धिक विभ्रम के हेतु है। अतत्त्वाभिनिवेश में भी विभ्रम होता है किन्तु वह स्थायी स्वरूप का होता है। जबकि बुद्धि-विभ्रम अस्थायी अथवा ऊहापोहात्मक बना रहता है, रोगी कभी सत्य की प्रतीति करता है तो कभी असत्य की प्रतीति करता है।
इन रुग्णों में असत्य के प्रति अधिक दुराग्रह रहता है और दूसरे के द्वारा सत्य प्रतिपादन के प्रयास को ये नकार देते है, इसलिए इनकी व्यावहारिक चिकित्सा बहुत कठिन होती है।

चिकित्सा :
विभ्रम के लिए मेध्य रसायन अत्युत्तम है। शिरोऽभ्यंग, शिरोपिचु या शिरोधारा के साथ-साथ ध्यान का अभ्यास बहुत लाभकारी सिद्ध होता है।
एकल औषधि : ब्राह्मी, शंखपुष्पी, बला, गिलोय, शतावरी, आमलकी, वचा, एला, जटामांसी, मधुयष्टी, बादाम, कूष्माण्ड, दाडिम।
चूर्ण : सारस्वत, मांस्यादि, अश्वगंधादि यवान्यादि चूर्ण।
वटी : ब्राह्मी, मेध्या।
पेटेण्ट : ब्रेनटेब, मेमोरिन कैप., ग्रेनोमेड टेब, ब्राह्मोवीटा (ग्रेन्यूल्स), दिमागिन अवलेह, मेण्ट्रेट टेब, विवीटा टेब।
भस्म : मुक्ता, मुक्तापिष्टि, प्रवाल, स्वर्णमाक्षिक आदि।
रसौषधि : स्मृतिसागर, योगेन्द्र, बृहद्वातचिन्तामणि, चिन्तामणिचतुर्मुख।

Ramswaroop Mantri

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