1950 के दशक में क्यूबा एक अजीब विरोधाभास से भरा हुआ देश था।*जिसमें एक तरफ तो शहरों में नाच-गाना, मौज मस्ती , शराब, कैसीनो और अमेरिकी टूरिस्टों की भीड़ थी…*तो दूसरी ओर गांवों में भूख, गरीबी और खामोशी थी…।
देश की जमीनें और चीनी फैक्ट्रियां विदेशी कंपनियों के कब्जे में थीं और इन सबके ऊपर बैठा था *फुलजेंसियो बतिस्ता — एक तानाशाह जो अमेरिका के इशारे पर चलता था…।*वो तानाशाह जनता को बोलने नहीं देता था।
प्रेस पर रोक थी। मजदूरों को शोषण सहना पड़ता था। किसान अपनी ही ज़मीन पर नौकर बन चुके थे।

*अमेरिका खुश था, क्योंकि उसकी कंपनियों का मुनाफा सुरक्षित था।*
लेकिन *आम क्यूबाई जनता को लग रहा था कि यह आज़ादी नहीं, सिर्फ गुलामी का नया नाम है।*
इसी दौर में दो नौजवान सामने आए।
*एक था फिदेल कास्त्रो — पढ़ा-लिखा, वकील, तेज भाषण देने वाला…।*
*दूसरा था चे ग्वेरा — अर्जेंटीना से आया हुआ एक डॉक्टर, जिसने लैटिन अमेरिका की गरीबी को अपनी आंखों से देखा था….।*
दोनों को लगता था
कि
अब क्रांति के बिना कोई रास्ता नहीं बचा। उन्होंने सशस्त्र क्रांति का फैसला किया।
*उन्होंने पहले सशस्त्र हमला किया, हार गए, जेल गए, फिर देश से बाहर निकाले गए…*
लेकिन
उन्होंने हार नहीं मानी। मेक्सिको में फिर से संगठित हुए। फिर एक नाव पर सवार होकर 82 लोग क्यूबा लौटे। *वो नाव थी Granma —* आज भी क्यूबा में उसे सम्मान से याद किया जाता है।
जंगलों में छिपकर उन्होंने गुरिल्ला लड़ाई शुरू की। धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे। किसान, छात्र, मजदूर — *सबने उनकी आवाज को अपनाया नो प्रोफिट ओनली पीयुप्ल।*
*बतिस्ता की सेना अमेरिका से हथियार लेती थी, लेकिन उसका मनोबल टूट चुका था…।*
जनता का भरोसा अब क्रांतिकारियों में था। तीन साल की लड़ाई के बाद, 1 जनवरी 1959 को तानाशाह बतिस्ता देश छोड़कर भाग गया।
*हवाना की सड़कों पर लोग नाच रहे थे और फिदेल कास्त्रो क्यूबा के राष्ट्रपति बन गए।*
क्रांति कामयाब हो गई थी, लेकिन
असली लड़ाई तो अब शुरू हुई थी। अमेरिका को ये क्रांति बिल्कुल नहीं भायी…। उसे डर था कि बाकी लैटिन अमेरिका में भी ऐसे नेता खड़े होंगे ।
*जो “नो प्रॉफिट, ओनली पीपल” की बात करेंगे..।* इसलिए
*उन्होंने क्यूबा को चारों तरफ से अलग करना शुरू किया। ट्रेड बंद किया, हमले कराए, यहां तक कि फिदेल और चे को मारने की कोशिशें भी की..।*
लेकिन क्यूबा झुका नहीं।
फिदेल ने देश की अर्थव्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य में मजबूत किया…।
*चे ग्वेरा ने क्रांति को बाकी देशों तक पहुंचाने की कोशिश की..।*
पहले वो कांगो गया, फिर बोलीविया गया । वहां उसे नक्सली, अलगाववादी या आतंकवादी बताकर मार दिया गया…।
मरते समय भी उसने अपने कातिल से कहा —
*“तुम सिर्फ एक इंसान को मार सकते हो, सोच को नहीं।”*
*क्यूबा की क्रांति के उदाहरण ने ये साबित किया…*
कि
*सिर्फ दो लोग भी अगर ईमानदारी और जुनून से भरे हों, तो बड़े बड़े साम्राज्यों की नींव हिला सकते हैं…।*
*चे ग्वेरा आज भी दुनिया में एक चेहरा नहीं, एक प्रतीक है —*
*उस आवाज़ का जो अन्याय के खिलाफ उठती है…।*
*अधिकांश सत्ताएं ये चाहती कि आने वाली पीढ़ियां उन लोगों को ही याद रखें जो सत्ताओं में रहे…*
लेकिन
*जब दो जुनूनी नौजवान भी पूरी व्यवस्था को उल्टा कर देते हैं तो आम जनता उन्हें हमेशा याद करती है…।*
*इस क्रांति के बाद शैतानी शक्तियों ने अपने षड्यंत्रों को बदला और इसे हर व्यक्ति की जीवनशैली और विचारों को नियंत्रित करने का खेल शुरू किया….।*
*जिसमें ये सफल भी हुए…आज फिदेल कास्त्रो या चे ग्वेरा की तरह की क्रांति करना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव बना दिया गया है….!*
*अब जो क्रांति होगी वो सशस्त्र क्रांति नहीं होगी बल्कि वैचारिक क्रांति होगी ।*
*लोग अंदर से जागृत होंगे…अपनी सहमति और ऊर्जा को नियंत्रित करेंगे…उस ऊर्जा का सदुपयोग करते हुए जो व्यवस्था बनेगी, वो अनंत काल तक चलेगी…. वर्तमान व्यवस्था उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है…।*
इसी के साथ
*जो लोग अपनी सहमति और ऊर्जा को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं होंगे, सशस्त्र क्रांति का प्रयास करेंगे वो नक्सली , अलगाववादी या आतंकवादी बताकर मार दिए जाएंगे। तटस्थ रहने वाले लोग इसी रक्तचूसक परजीवी व्यवस्था में अनंत काल के लिए ट्रेप हो जाएंगे ।*
इसलिए
*आपने कौन सा रास्ता चुनना है…ये आपकी स्वतंत्र इच्छा पर निर्भर करता है ।*