मुनेश त्यागी
आज हमारा पूरा समाज और पूरा देश दोनों ही गंभीर संकटों के दौर से गुजर रहे हैं। अधिकांश सच्चे और अच्छे साहित्यकार और लेखक गंभीर दौर का सामना कर रहे हैं। आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों पर साम्प्रदायिक और जन विरोधी हमले हो रहे हैं। सबसे ज्यादा संकट साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में आया हुआ है। तमाम जनवादी और संवैधानिक अधिकारों पर हमले हो रहे हैं। लेखकों, साहित्यकारों और पत्रकारों की लिखने की आजादी पर हमले हो रहे हैं और उन पर पहरे बैठा दिए गए हैं। अधिकांश जनवादी और प्रगतिशील लेखक और साहित्यकार गंभीर खतरों से जूझ रहे हैं।
साम्प्रदायिक सरकारों द्वारा संविधान में दी गई बोलने और लिखने की आजादी पर जोरदार और मनमाने हमले किये जा रहे हैं और इन आजादियों को लगभग छीन लिया गया है। अधिकांश लेखकों और साहित्यकारों में डर बैठा दिया गया है। साझी संस्कृति और गंगा जमुनी तहजीब पर बेरोक टोक, मनमाने और साजिशन हमले हो रहे हैं। सरकार के अधिकांश विभागों ने धर्मनिरपेक्षता की नीति को त्याग दिया है और राज्य की तमाम गतिविधियां धर्मांधता, अंधविश्वासों, विवेकहीनता और पाखंडों की गतिविधियों से भरी पड़ी हैं।
आजकल हम देख रहे हैं कि अखबारों और मीडिया के बड़े हिस्से में धर्मांधता, अंधविश्वासों और तर्कहीनता की बाढ़ आ गई है। यहां पर ज्ञान विज्ञान और विवेक की संस्कृति और सोच समझ पर सबसे बड़े हमले हो रहे हैं। आज के अखबारों को पढ़कर लगता है कि हम किसी अजीब दुनिया में जी रहे हैं। अधिकांश मीडिया टीवी और अखबार जैसे सरकार के मुखौटे बन गए हैं और सच्ची और हकीकत की खबरों को तो जैसे इनसे नदारद ही कर दिया गया है। सच बात तो यह है कि आज के अखबारों को पढ़कर लगता है कि जैसे हम अपना कीमती समय बर्बाद कर रहे हैं और सच्ची खबरें पाने और पढ़ने को पूरी तरह से तरस गए हैं।
मीडिया के अधिकांश माध्यमों जैसे अखबार और टीवी ने तो जैसे विरोधियों और विपक्षियों को गायब भी कर दिया है। देश दुनिया के वामपंथियों को तो मीडिया, टीवी और अखबारों से लगभग गायब कर दिया गया है। जनवादी, समाजवादी उपलब्धियों, आंदोलनों और गतिविधियों को तो जान पूछ कर छुपाया और मिटाया जा रहा है। अधिकांश संचार माध्यमों से विपक्ष की उपलब्धियां को नदारद कर दिया गया है। ज्यादातर पत्रकार तो जैसे अपने अखबार मालिकों के गुलाम बना दिए गए हैं। उनसे आजादी, निष्पक्षता और सच्चाई की कलम छीन ली गई है और अधिकांश संपादकों को मैनेजर बना दिया गया है। अब वे “भारत का चौथा स्तंभ” नहीं, बल्कि मलिकान के नौकर बनकर रह गए हैं। उनको गूंगे, बहरे और अंधा बना दिया गया है।
इसी के साथ-साथ हम देख रहे हैं कि आज मुसलमान समुदाय पर सब तरह के हमले हो रहे हैं और उन्हें घुसपैठिया बताया जा रहा है, रोटी ,बेटी जमीन और जंगल छीनने वाला बताया जा रहा है और तमाम तरह की नफरत का शिकार बनाया जा रहा है। चुनावों के दौरान भी भारत का चुनाव आयोग, उनके नफरती भाषणों पर कोई रोक नहीं लग रहा है। सरकारी क्षेत्र की कंपनियां बंद की जा रही हैं और निजी कंपनियों को बढ़ावा दिया जा रहा है और आरक्षण को खत्म कर कर दिया गया है। गरीबों से शिक्षा, रोजगार और आरक्षण छीनने का अभियान जारी है। अब तो यह विश्वास ही नहीं होता कि एससी, एसटी, ओबीसी और गरीबों का बड़ा भाग अपने बच्चों को पढ़ा भी सकता है क्या? रोजगार, नौकरी और आरक्षण की तो बात ही छोड़ दीजिए। पाठ्य पुस्तकों में सांप्रदायिक हिंदुत्ववादी घुसपैठ जारी है, सच्चाई और हकीकत को पाठ्य पुस्तकों से गायब किया जा रहा है और इसी के साथ-साथ नौकरियों में खासतौर पर शिक्षण संस्थानों में अधिकांश पदों पर आरएसएस से जुड़े लोगों की नियुक्तियां हो रही हैं। कोई भी सरकारी विभाग इस सांप्रदायिक घुसपैठ से बचा नहीं है। इस बारे में अखबारों में खबरें ही नहीं छप रही हैं और जनता को सच्चाई से अवगत भी नहीं कराया जा रहा है।
आजकल यह भी बड़े पैमाने पर देखने में आ रहा है कि एनजीओ के लोग तरह तरह के मुखौटे लगाकर लेखकों और साहित्यकारों के संगठनों और गतिविधियों में घुसपैठ कर रहे हैं और वे तरह-तरह से समस्त प्रगतिशील, जनवादी, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और सामाजिक न्याय में विश्वास करने वाली विचारधाराओं, संगठनों, लेखकों, कवियों और उनके सक्रिय कार्यकर्ताओं पर जानबूझकर झूठे और बेबुनियादी हमले कर रहे हैं और वे सांप्रदायिक सोच और जनविरोधी, पूंजीवादी निजाम के संगठनों और लोगों की हिफाजत और मदद कर रहे हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ भी यह तथ्य साबित कर गए हैं कि भारत की न्यायपालिका भी धर्मांता और अंधविश्वासों के जाल में फंस गई है और अब वह भगवान से पूछ पूछ कर फैसले लिखने लगी है। अब तो लगने लगा है कि जैसे न्यायाधीश अपने भगवानों अल्लाह खुदा और जीसस क्राइस्ट से पूछ कर ही फैसला लिखा करेंगे। अब न्याय करने के लिए तथ्यों, कागजात, सबूतों और रुलिंग्स की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी।
यहीं पर सबसे बड़ा सवाल उठता है कि ऐसे में साहित्यकार, लेखक, कवि और पत्रकार क्या करें? इस गंभीर आक्रमण के दौर में यह जरूरी हो गया है कि तमाम जनवादी और प्रगतिशील लेखक संगठन और ज्यादा संवेदनशील, प्रतिबद्ध और जुझारू बनें, अपनी निष्क्रियता और संवेदनहीनता को तिलांजलि दें, अपने लेखन, सूचना और प्रकाशनों के वैकल्पिक माध्यम तैयार करें, जनमुक्ति के कार्यक्रमों को लेकर जनता के बीच में जाएं और वहां उसका प्रचार प्रसार करें और उन पर जोरदार तरीके से लिखें। जनवाद, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद पर लेक्चर और स्टडी सर्किल और विचार गोष्ठियां आयोजित की जाएं और जनता को जागरूक किया जाए। फेसबुक और व्हाट्सएप का जोरदार तरीके से और ज्यादा इस्तेमाल करें।
इसी के साथ साथ साझी संस्कृति की बहुमूल्य और महान विरासत को जनता के बीच लिया ले जाया जाए और उन पर विस्तार से चर्चा और लेखन किया जाए। भारत के संविधान में विश्वास रखने वाले, जनवादी ,धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील लेखकों को जोरदार तरीके से एकजुट और सक्रिय किया जाए और उन्हें एकजुट और सक्रिय बनाने के लिए तमाम तौर तरीके अपनाए जाएं। किसानों, मजदूरों, महिलाओं और नौजवानों की समस्याओं पर विस्तार से तर्कसंगत तरीके से लिखा जाए। देश दुनिया की बेहतरीन रचनाओं का पठन-पाठन और इन पर चर्चा की जाए। जिन रचनाकारों में उदासीनता, निष्क्रियता, डर, संशय और संदेह पैदा हो गए हैं, उनसे लगातार बातचीत की जाए और उन्हें संगठित और सक्रिय बनाने के लिए सभी जनवादी और सांस्कृतिक तौर तरीके अपनाए जाएं।
यहीं पर यह भी जरूरी हो गया है कि तमाम संविधान समर्थक, जनवादी, प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी साहित्यकारों एवं देश और दुनिया के सभी क्रांतिकारियों और समाज सुधारकों पर विस्तृत चर्चाएं और कार्यक्रम आयोजित किए जाएं और उनसे सीखा जाए। इसी के साथ साथ यह भी जरूरी हो गया है कि सब तरह की जनविरोधी गतिविधियों और तमाम सांप्रदायिक नीतियों और गतिविधियों पर गंभीर चर्चाएं और विश्लेषण हो और इससे सबक लेकर संघर्ष के मैदान में असरदार तरीके से आगे बढ़ा जाए। तभी जाकर भारत के साहित्यकार एक बेहतर भारत बनाने में और बेहतर साहित्य रचने में अपनी कारगर भूमिका निभा पायेंगे।





