इंदौर
पीथमपुर बायपास रोड पर दिलीप नगर स्थित मां बगलामुखी सिद्धपीठ शंकराचार्य मठ के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने शुक्रवार को चातुर्मास के विधान के बारे में बताया कि सनातन धर्म पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है। यह भारतीय जीवन शैली पर आधारित है और इसका सीधा संबंध व्यक्ति के स्वास्थ्य से है।
महाराजश्री ने बताया चातुर्मास में जठराग्नि मंद हो जाने के कारण पाचन क्रिया कमजोर हो जाती है और बादल होने के कारण इन दिनों संक्रामक तत्व जन्म ले लेते हैं। इससे पानी प्रदूषित हो जाता है, जिसके कारण अस्वस्थ होने की आशंका बनी रहती है। इस समय संन्यासी किसी एक स्थान पर चार माह के लिए ठहर जाते हैं। इस दौरान वे उपवास, भजन, पूजन, प्रवचन आदि करते हैं और लोगों को भागवत, श्रीराम कथा और वेदांत द्वारा ज्ञान देते हैं।
इस वर्ष चातुर्मास पांच महीने का
डॉ. गिरीशानंदजी ने बताया इस वर्ष चातुर्मास पांच महीने का है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि चातुर्मास में भगवान विष्णु शयन (योग निद्रा) करते हैं और देव प्रबोधिनी एकादशी को उठ जाते हैं। इन दिनों भगवान शिव ही संसार का शासन काल संभालते हैं। शिव ज्ञान के देवता हैं और गुरुजन शिव रूप, इसीलिए वे भक्तों को ज्ञान दिया करते हैं।
बेलपत्र के स्पर्श से मिलता है विटामिन-डी
सावन में भगवान शिव को बेलपत्र अर्पण किए जाते हैं, क्योंकि बेलपत्र के स्पर्श से विटामिन-डी की पूर्ति होती है। इन दिनों सूर्य बादल में छुपा होने के कारण शरीर में विटामिन-डी की कमी हो जाती है जो बेलपत्र से पूरी हो जाती है। चातुर्मास में हरी सब्जियां दूध, दही, घी, लहसुन-प्याज वर्जित होता है, क्योंकि इन्हें खाने से स्वास्थ्य बिगड़ता है।
सनातनी नियमों का पालन फायदेमंद
महाराजश्री ने बताया यदि व्यक्ति सनातनी नियमों का पालन करता है तो वह स्वस्थ रहता है। वह जीवन संग्राम से जूझने के लिए तैयार रहता है। इसके कारण उसका देश, परिवार और समाज सुखी-समृद्ध होता है।





