सन 1972 में इंदिरा जी की लोकप्रियता चरम पर थी । बांग्ला देश युद्ध में विजय, पाकिस्तान का घुटनों पर आना, विदेशों में लोकप्रियता , देश वासियो का उच्च मनोबल, और देश में शांति और ख़ुशहाली ।
कांग्रेस के उस समय अध्यक्ष श्री देवकांत बरुआ हुआ करते थे। इंदिरा जी की चापलूसी या उन्हें खुश करने के लिये उन्होंने ‘ इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा ‘ का स्लोगन कहीं उछाल दिया था जो सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था। बरुआ जी के इस बयान की चौतरफ़ा आलोचना शुरू हो गई कि व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो जाये पर देश से महान कदापि नहीं हो सकता। देश के सम्मान पर इस बयान को आघात बताया जाने लगा। इंदिरा जी को भी यह बयान बेहद नागवार गुजरा और श्री देवकांत बरुआ के सफ़ाई देने के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष पद से उनकी कुछ समय बाद न केवल छुट्टी कर दी गई बल्कि उनका राजनैतिक जीवन भी अंधेरों में कहीं खो गया था।
वह समय भारतीय लोकतंत्र का स्वर्ण युग था। विपक्षी दलों के साथ साथ सत्तारूढ़ दल के सदस्य भी सरकार को कटघरे में खड़ा करने में नहीं हिचकते थे।अख़बार भी जन समस्याओं और सरकार की नीतियों की बखिया उधेड़ने में जरा भी संकोच नहीं करते थे। उस समय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं हुआ करता था और सूचना के स्रोत मात्र अख़बार हुआ करते थे।

आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही सब कुछ है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सही या ग़लत जो भी दर्शकों को परोसे, उसे दर्शकों को सहन करना पड़ता है। सोशल मीडिया की अपनी एक अलग ही दुनिया है जो पल में रस्सी को सॉप या सॉप को रस्सी बनाने की कूवत रखती है। चुनिंदा अख़बारों को छोड़कर ज़्यादातर अख़बार अपनी विश्वसनीयता खो चुके है।
अब हम मूल विषय पर आते है । जिस बयान पर एक पार्टी अध्यक्ष को पद छोड़ना पड़ा हो , लानत मलानत हो चुकी हो , वैसा बयान देना अब रोज़ का काम हो गया है । न्यूज़ चैनल्स पर पार्टी प्रवक्ता खुलकर बरुआ जी के बयान से भी चार कदम आगे बढ़कर अपने नेता को देश से भी महान बताने में बाक़ायदा बहस करते हैं और जो इनसे असहमत होता है उसे देशद्रोही तक कहने में संकोच नहीं करते। मज़ेदार यह भी है कि ऐसी बहसों में न्यूज़ चैनल्स के ऐकर विरोध करने या तटस्थ रहने के बजाये उनकी हॉ में हॉ मिलाते रहते है। प्रिंट मीडिया तो ऐसे मामलों में भाव शून्य बना रहता है। अब लोकतंत्र शायद यही रह गया है जिसमें असहमति का मतलब देश विरोधी होना है।
देवकांत बरुआ साहब ने शायद समय से पहले जन्म ले लिया था वरना आज वह अगर वैसा बयान अपने नेता के गुणगान में देते तो राजनिति में बहुत आगे जाते ।





