एम वाय अस्पताल मे आज सामान्य व्यक्ति भी क्यो नही जाना चाहते

सुरेश उपाध्याय
मध्यप्रदेश की औधोगिक व व्यवसायिक राजधानी के नाम से ख्यात इंदौर मध्यप्रदेश का सर्वाधिक आबादी वाला शहर भी है. भारतीय तकनीकी संस्थान व भारतीय प्रबंधन संस्थान से सज्जित यह देश का एकमात्र शहर है. स्वच्छता के क्षेत्र मे लगातार पांच वर्ष तक देश मे प्रथम स्थान प्राप्त करने का गौरव भी इस शहर को प्राप्त है. कुछ वर्ष पूर्व से मेडिकल हब के रूप मे भी इस शहर की पहचान बन रही है. सात मंजिला अस्पताल के नाम से ख्यात महाराजा यशवंतराव चिकित्सालय एकसमय प्रदेश की जनता के लिए गम्भीर बिमारियो मे आशा व विश्वास का एकमात्र केंद्र रहा है. बढती आबादी के मद्देनजर धार रोड पर जिला चिकित्सालय बना तो सन्योगितागंज मे प्राथमिक केंद्र को उन्नत कर पी सी सेठी चिकित्सालय का निर्माण किया गया है. मनोरमा राजे क्षय चिकित्सालय व बाणगंगा स्थित मानसिक चिकित्सालय के अतिरिक्त लाल अस्पताल, कुछ अन्य छोटे सरकारी अस्पताल भी पहले से है. सामाजिक, धार्मिक व व्यवसायिक ट्रस्ट द्वारा संचालित चिकित्सालय भी सेवारत है. आधुनिक व उन्नत चिकित्सा सुविधा की बढती मांग तथा निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन के दौर मे स्थानीय के साथ देश के बडे व नैगमिक अस्पतालो ने भी बडी संख्या मे अस्पताल संचालित किए है. महात्मा गांधी चिकित्सा महाविधालय की अपनी प्रतिष्ठा है तथा निजी क्षेत्र मे तीन चिकित्सा महाविधालय व इनसे सम्बद्ध चिकित्सालय भी संचालित है. एलोपेथी के अलावा अन्य पेथी के सरकारी व निजी महाविधालय व औषधालय भी कार्यरत है. रक्तदान व नेत्रदान के लिए अग्रणी शहर मे अंगदान व देहदान के प्रति सजग व प्रेरक संस्थाए भी है तथा विभिन्न अवसरो पर प्रभावी तरीके से ग्रीनकोरिडोर बनाए गए है. अंगप्रत्यारोपण की अभी शुरूआत नही हुई है. दो सौ करोड की लागत से सुपर स्पेशियलिटी सेंटर बनकर तैय्यार है परंतु विशेषज्ञ चिकित्सको की पदस्थापना जरूरत अनुसार होना शेष है. पचास करोड की लागत से जिला चिकित्सालय का कायाकल्प किया जा रहा है. चालिस करोड की लागत का प्रदेश का पहला राष्ट्रीय स्तर का संस्थान सेंटर आफ एक्सीलेंस फार आई विशेषज्ञो की भर्ती के बावजूद जरूरी तैय्यारियो व उद्घाटन की प्रतिक्षा मे है.
आज शहर की आबादी लगभग पैंतीस लाख है और 2050 तक पचास से साठ लाख होने का अनुमान है. आबादी के मान से सरकारी क्षेत्र की चिकित्सा सुविधा काफी कम है और 70 प्रतिशत आबादी निजी क्षेत्र पर निर्भर है. कोरोना महामारी की त्रास हम सब ने झेली है और उसने हमारी चिकित्सा सेवा की कमजोरियो को उजागर भी किया है. मन्हंगी होती चिकित्सा सेवा लोगो को गरीबी मे धकेल रही है. चिकित्सा राज्य का विषय है फिर भी राज्य की चिकित्सा नीति बनाने की कभी कोशिश नही की गई है.
शहर के विस्तार को देखते हुए प्रति दस लाख की आबादी पर एक के मान से चार जिला चिकित्सालय की जरूरत है. धार रोड स्थित जिला चिकित्सालय का कायाकल्प शीघ्र सुनिश्चित करना चाहिए तथा तीन नए जिला चिकित्सालय तीन अलग अलग दिशाओ मे शहरी सीमा से लगते हुए स्थापित करने की पहल की जानी चाहिए. यह जिला चिकित्सालय उस क्षेत्र तथा उसके आसपास के गांवो की जरूरत को भी पुरा करेंगे. इसके साथ ही चार वार्ड के समूह पर एक उन्नत प्राथमिक चिकित्सा केंद्र की स्थापना की जानी चाहिए. जिला चिकित्सालय व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की यह व्यवस्था आमजन को सुलभ चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराएगी तथा एम वाय अस्पताल के दबाव को भी कम करेगी. यह विचारणीय है कि पुरे प्रदेश से चिकित्सा सुविधा के लिए आने वाले एम वाय अस्पताल मे आज स्थानीय व्यक्ति भी क्यो जाना नही चाहते है ?. केवल आर्थिक रूप से अक्षम व मजबूरी की स्थिति मे ही लोग एम वाय जाने को क्यो विवश है?. कभी आक्सीजन आपूर्ति की कमी, कभी चूहो द्वारा बच्चो व लाशो को कुतरने की खबर, अपर्याप्त सफाई, दवाओ का अभाव, बाहर से जांचे करवाने की व्यवस्था, गाहे – बगाहे जूनियर डाक्टर की हडताले, डाक्टर व रोगियो के परिजनो के मध्य विवाद की खबरे, वरिष्ठ चिकित्सको के मनमुटाव, गुटबाजी व असहयोग की खबरे, आपरेशन के लिए लम्बे इंतजार की स्थिति, अस्पताल परिसर मे एम्बुलेंस के लिए मनमानी वसूली, मर्चुरी व परिसर मे दुर्व्यवहार / कुकृत्य की खबरे इस चिकित्सालय की गरिमा के अनुरूप नही है. चिकित्सको, नर्सिंग स्टाफ की पर्याप्त भर्ती कर, जूनियर डाक्टरो की वाजिब मांगो का हल कर, सुरक्षा, सफाई व देखरेख की उचित व्यवस्था तथा प्रभावी प्रबंधन से इसके प्रति पूर्वानुसार विश्वास को कायम किया जा सकता है. निजी क्षेत्र के चिकित्सालयो मे मालवा, निमाड, आदिवासी अंचल के रोगी भी आते है हालाकि इन क्षेत्रो से अधिकतर लोग गुजरात के अहमदाबाद जाने को प्राथमिकता देते है. इंदौर से भी इलाज के लिए कई लोग अहमदाबाद जाते है, इसके कारणो को भी समझने व तदनुसार सुधारात्मक पहल की जाना चाहिए. जिले की आबादी व बाहर से आने वाले रोगियो की संख्या के मान से विशेषज्ञो व चिकित्सको की कमी है परिणाम स्वरूप पूर्व से समय लेने के बाद भी लोगो का काफी समय व्यय होता है. हर कोई विशेषज्ञ चिकित्सको को ही दिखाना चाहता है, इससे अनावश्यक उनका कार्यभार बढा है. सम्भवत: उन्होने फीस बढाकर कार्यभार कम करने का रास्ता चुना है, इससे भी आमजन की दिक्कते बढी है. जरूरी होने पर ही या सामान्य चिकित्सक द्वारा संदर्भित किए जाने जैसी व्यवस्था से कुछ रास्ता निकल सकता है.
प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की पात्रता सीमा आय रू दस हजार प्रति माह काफी कम है तथा चिकित्सा व्यय ने इससे अधिक आय वालो के लिए भी मुश्किले बढा दी है. नीतिगत निर्णयो मे केंद्र व राज्य सरकार से बदलाव के लिए सतत प्रयास के साथ उपरोक्त मे से कुछ प्रस्ताव सहजता से स्थानीय स्तर पर पहल से भी सम्भव है. जन आरोग्य योजना के अंतर्गत आने वाले सभी परिवारो को जोडने के लिए अभियान चलाया जाना चाहिए. जन औषधि केंद्र की संख्या बढाने के साथ प्रत्येक केंद्र पर सभी दवाओ की उपलब्धता सुनिश्चित कर ही इसे जनहितैषी स्वरूप दिया जा सकता है. इसके प्रतिस्पर्धी स्वरूप से बाजार मे भी दवाओ की कीमतो मे प्रभावी कमी आ सकती है. जनप्रतिनिधियो, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, जूनियर डाक्टर एसोसिएशन, नर्सिंग होम एसोसिएशन, नर्सिंग स्टाफ एसोसिएशन, चिकित्सालय संचालित करने वाले सामाजिक / धार्मिक / व्यवसायिक संस्थाओ के न्यास के प्रतिनिधियो व सामाजिक संस्थाओ के प्रतिनिधियो की एक समंवय समिति बनाकर प्राथमिकताए तय की जा सकती है तथा सुधार के लिए पहल की जा सकती है.





