इंदौर
मप्र में शनिवार को बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम हुआ। बीजेपी के कद्दावर नेता व पूर्व विधायक भंवर सिंह शेखावत ने बीजेपी का दामन छोड़कर शनिवार को कांग्रेस जॉइन की है। शेखावत के कांग्रेस जाने से उनके साथ काम कर चुके बीजेपी के अन्य नेता अचंभित व पार्टी आलाकमान के साथ ही शेखावत से नाराज हैं।
इन नेताओं का कहना है कि जिसके पिता मालवा मील में कम्युनिस्ट और कांग्रेस के दौर में संघ की शाखा लगाया करते थे उस विचारधारा के कार्यकर्ता को मजबूर होकर बीजेपी छोड़ना पड़ी यह पार्टी की नाकामी है। वहीं शेखावत ने भी गलत किया आज उनके कांग्रेस में जाने से उनके पिता पर क्या गुजर रही होगी इस बारे में उन्होंने सोचा तक नहीं।
आखिर क्यों भंवर सिंह शेखावत कांग्रेस में गए इसके पीछे क्या रहीं वजह

भंवर सिंह शेखावत के बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में जाने की वजह को लेकर पार्टी में अलग-अलग चर्चाएं हैं। राजनीति के जानकारों का मानना है कि शेखावत के भाजपा छोड़ने का कारण भाजपा नेता राजेश अग्रवाल हो सकते हैं। अग्रवाल ने 2018 का चुनाव बदनावर से निर्दलीय लड़ा था।
सूत्रों ने बताया कि दरअसल, 2018 के विधानसभा चुनावों में बदनावर से कांग्रेस ने राज्यवर्धन सिंह दत्तीगांव को टिकट दिया था तो बीजेपी ने भंवर सिंह शेखावत को। बाहरी होने का मुद्दा हावी होने के कारण शेखावत चुनाव हार गए। इसमें बड़ी वजह अग्रवाल भी रहे। अग्रवाल ने भाजपा छोड़कर निर्दलीय होकर चुनाव लड़ा। बदले में पार्टी ने उन्हें 6 साल के लिए बाहर कर दिया।
कुछ पार्टी सूत्रों का दावा है कि 2020 में कमलनाथ सरकार गिरने और शिवराज सरकार बनने के बाद राजेश अग्रवाल की न केवल पार्टी में वापसी हुई बल्कि वे राज्यमंत्री भी बन गए। पार्टी सूत्रों का दावा है कि इन सबके पीछे पार्टी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय हो सकते हैं। दरअसल अग्रवाल को पार्टी में विजयवर्गीय समर्थक ही माना जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम से भंवर सिंह शेखावत नाराज हो गए और उन्हें संगठन व सीएम को शिकायत करते हुए कहा कि दत्तीगांव तक तो बात ठीक है लेकिन ऐसे व्यक्ति को राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया है जो पार्टी के साथ दगाबाजी कर चुका है। जिसने 2018 चुनाव में पार्टी प्रत्याशी को ही हराने का काम किया।
शेखावत को परिवार नहीं छोड़ना था, निर्णय मूर्खतापूर्ण

भाजपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व प्रदेश मंत्री व पूर्व लघु उद्योग निगम के अध्यक्ष बाबूसिंह रघुवंशी का कहना है कि शेखावत को कांग्रेस में कुछ मिलने वाला नहीं है। कांग्रेस उनका उपयोग करेगी। शेखावत मेरे से 6 महीने बड़े हैं यह उम्र का तकाजा ही है। बीजेपी पार्टी ने शेखावत को बहुत कुछ दिया है। शेखावत को अगर पार्टी से कोई नाराजी थी भी तो भी उन्हें पार्टी छोड़कर नहीं जाना था।
पार्टी छोड़ने वालों को वह दिन याद करना चाहिए जब आपको पार्टी ने नाम और पहचान दी थी

पूर्व विधायक व पूर्व भाजपा नगर अध्यक्ष गोपी कृष्ण नेमा का कहना है कि पार्टी छोड़कर जाना मेरे नजर में कभी भी ठीक नहीं है। मैं इसे उपेक्षा नहीं बल्कि आकांक्षा की दौड़ मानता हूं। पार्टी ने आपको नाम दिया पहचान दिया सम्मान दिया। उस वक्त भी कई लोगों दावेदार होंगे जब आपको यह सब दिया तो उनके हाथ से छीन कर आपको पार्टी ने सब कुछ दिया। तो पार्टी छोड़ने वालों को उन दिनों को याद करना चाहिए।
पार्टी ने हर बार सम्मान दिया, पिछले चुनाव में भी टिकट दिया, यह उपेक्षा कैसे हो सकती है

भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रदेश प्रवक्ता गोविंद मालू का कहना है कि कोई भी परिवार का सदस्य पार्टी छोड़कर जाता है तो दु:ख तो होता ही है। शेखावत के सम्मान को बनाए रखने के लिए पार्टी ने उन्हें नगर अध्यक्ष बनाया, टिकट दिया यहां तक की अपेक्स बैंक का चेयरमैन बनाया। शेखावत जी की उपेक्षा का पार्टी में कोई सवाल ही नहीं बचता। पार्टी ने उन्हें 2018 के पिछले चुनाव में भी टिकट दिया यह उपेक्षा तो नहीं हो सकती।
आपको BJP से खुलेआम टिकट क्यों मांगना पड़ा?:पूर्व विधायक शेखावत बोले- पहले इंदौर से बाहर किया, अब मेरी बदनावर सीट भी गई

भंवरसिंह शेखावत इंदौर भाजपा के दिग्गज नेता हैं। विधानसभा क्रमांक 5 से विधायक रह चुके हैं। 1993 में हुए चुनाव में विधानसभा क्रमांक 5 से शेखावत पहली बार विधायक बने। 1998 के चुनाव में वे इसी सीट से कांग्रेस के सत्यनारायण पटेल से 10 हजार से ज्यादा वोटों से हार गए।
मालवा-निमाड़ की राजनीति में उठापटक ने भाजपा को हैरान कर दिया है। पूर्व मंत्री दीपक जोशी के बाद अब पूर्व विधायक भंवरसिंह शेखावत का दर्द फूट पड़ा। शेखावत धार जिले की बदनावर सीट से विधायक रहे हैं, लेकिन अब ये सीट कांग्रेस से भाजपा में आए राज्यमंत्री राजवर्धन सिंह दत्तीगांव के पास है। शेखावत को संकेत मिल गए हैं कि पार्टी इस बार दत्तीगांव को ही उम्मीदवार बनाएगी। इसके चलते उन्होंने कहा है कि मालवा की किसी भी हारी हुई सीट से टिकट दिया जाए। इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं और छुपा हुआ दर्द भी।





