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*ज्ञान जी की विरासत  पर चलने का साहस जुटाना मुश्किल है*

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  -नंदलाल सिंह 

साठोत्तरी कहानी के एक अलबेले स्तम्भ, एक प्राध्यापक, एक संगठनकर्त्ता, पहल के सम्पादक, पहल पुस्तिका, पहल सम्मान , पहल व्याख्यानमाला, देश विदेश में एक सघन नेटवर्क, सख्त पसंद -नापसंद भरी शख्सीयत और इस बात में यकीन करने वाले कि I am ever a fighter , so one fight more.

 जीते जी किवदंती बन जाने वाले ज्ञान रंजन जी का चले जाना , एक बड़ी सामाजिक क्षति है।  वे एक मिटती हुई पीढ़ी के प्रतिनिधि थे। कुछ रचनाकार ऐसे होते हैं, जिनसे व्यक्तिगत रिश्ता बनाना सम्भव नहीं हो पाता पर दूसरी श्रेणी के रचनाकार से उनकी रचना और व्यक्ति दोनों से रिश्ता बनाना एक बड़ी उपलब्धि होती है। ज्ञान जी दूसरी श्रेणी में आते थे।

 कहानीकार और सम्पादक के रूप में उन्होने अमिट छाप छोड़ी है जो वर्तमान और आने वाली पीढी को प्रेरणा देती रहेगी। कहानीकार के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने के बाद ज्ञान जी ने पहल के सम्पादक के रूप में जो कीर्ति अर्जित की , उसकी मिसाल मिलना मश्किल है। उन्होंने ‘पहल’ को इस महादेश के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रस्तुत प्रगतिशील रचनाओं की एक अनिवार्य पुस्तक बनाने की घोषणा की और इसे मूर्त रूप भी दिया।  अनेकों नवोदित रचनाकारों के अन्दर के स्पार्क को उन्होनें पहचाना और उन्हे पहल में प्रकाशित कर एक लांचिंग पैड का काम किया।

  ‘पहल’ से आगे पहल करते हुए उन्होने पहल सम्मान की शुरूआत की और सम्मानित होने वाले रचनाकारों को उन्ही के नगर में जाकर सम्मानित करने का सिलसिला भी शुरू किया, 

फ़िर पहल पुस्तिका और पहल व्याख्यानमाला की शुरूआत की। पहल व्याख्यानमाला के अंतर्गत सबसे ऐतिहासीक व्याख्यान दिल्ली में प्रो एज़ाज अहमद का मार्क्सवाद की प्रसांगिकता पर दिया गया व्याख्यान था। उस व्याख्यान को सुनने के लिए  जितनी बडी संख्या में लोग उपस्थित हुए ,वह एक रिकार्ड है। 

यह समय वो था , जब सोवियत संघ सहित पूरा समाजवादी विश्व ढह गया था , चारों ओर बेचैनी भरा सन्नाटा था। कम्युनिस्ट पार्टी के नेता भी मार्क्स वाली विचारधारा की प्रासांगिकता के बारे कुछ तसल्ली बख़्श बात नहीं कह पा रहे थे। ऐसे मे प्रेमचंद के इस कथन को फ़ैज़ साहब ने साबित किया। साहित्य राजनीति के हाथ की मशाल है। उन्होने एक नज़्म कही-

जब दुख की नदिया में हमने ,

जीवन की नैया डाली थी ,

 था कितना कस- बल हाथों में

 लहू में कितनी लाली थी। 

 यूं लगता था दो हाथ लगे

 और नैया पूरम पार हुई ,

  ऐसा न हुआ हर धारे में

  कुछ अनदेखी मझधारें थी,

  कुछ मांझी थे अनजान बहुत

   कुछ बेपरखी पतवारें थीं। 

 एज़ाज साहब ने अपने व्याख्यान के अंत में फ़ैज़ की इस नज़्म को पढ़ाथा। इसमें अपने तरीके से फ़ैज़ साह्ब ने विफ़लता के कारणों की तरफ़ संकेत किया।

 गुजरात दंगे के बाद नागपुर में ज्ञान जी ने अपने पुत्र पाशा के सहयोग से राजदीप सरदेसाई का व्याख्यान आयोजित किया था। संघ मुख्यालय में आयोजित इस व्याख्यान पर संघ के लोगों ने हमला किया था , जिसे पाशा और उसके साथियों ने विफ़ल कर दिया।

ज्ञान जी की विरासत की बात करना तो आसान है उस पर चलने का साहस जुटाना मुश्किल है।

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