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 अदालतों पर अनावश्यक मामलों का बोझ डालना ठीक नहीं 

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देश की अदालतों में लाखों मामले लंबे समय से लंबित हैं। हालत यह है कि इन मुकदमों की सुनवाई के लिए अदालतों के पास पर्याप्त न्यायाधीश भी नहीं हैं। इस हालत में अदालतों पर अनावश्यक मामलों का बोझ डालना ठीक नहीं है। निर्वाचित सरकारों को भी आत्मावलोकन करना होगा।

मणिपुर में हो रही हिंसा जितना संवेदनशील मुद्दा है, क्या उससे निपटने के प्रयास भी उतनी गंभीरता से किए जा रहे हैं? यह सवाल इसलिए उठता है, क्योंकि राज्य में हो रही हिंसा तमाम प्रयासों के बावजूद रुक नहीं पा रही। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.वाइ. चंद्रचूड़ ने साफ कर दिया है कि राज्य में तनाव और बढ़ाने के लिए कोर्ट का इस्तेमाल नहीं किया जाए। कोर्ट की टिप्पणी इस मायने में महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि आखिर तनाव बढ़ाने के लिए कोर्ट का उपयोग कौन करना चाहता है? हिंसा चाहे मणिपुर में हो अथवा अन्य राज्य में, उसे रोकना सरकार और पुलिस-प्रशासन का काम है। देश की अदालतें कानून-व्यवस्था का तंत्र अपने हाथ में नहीं ले सकती हैं। अदालतें सरकारों और प्रशासन को सिर्फ निर्देश ही दे सकती हैं। बीते सवा दो महीने में पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में हिंसा के चलते १५० से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। मंत्रियों और नेताओं के दौरों और सर्वदलीय बैठक के बावजूद राज्य में हालात सामान्य नहीं होना चिंता की बात है।

सबसे बड़ी ङ्क्षचता इस बात की भी है कि आज देश की अदालतों का काम जरूरत से अधिक बढ़ गया है। किसी राज्य में सरकार गिर जाए तो मामला अदालत की चौखट तक पहुंचता है। कहीं हिंसा हो जाए, तब भी कोर्ट से दखल की गुहार लगाई जाती है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकारों की जिम्मेदारी है। यही वजह है कि सर्वोच्च अदालत ने मणिपुर में जनजातियों की सुरक्षा के लिए सेना तैनात करने की मांग को खारिज कर दिया है।

सरकारों के कामकाज में अदालती दखल जितना कम हो, उतना ही अच्छा है। किसी राज्य में हो रही हिंसा के मामले में कोर्ट के दखल से क्या हो जाएगा? ऐसे मामलों से कोर्ट को दूर रखना चाहिए और राज्य सरकारों को ही ठोस कदम उठाने चाहिए। देश की अदालतों में लाखों मामले लंबे समय से लंबित हैं। हालत यह है कि इन मुकदमों की सुनवाई के लिए अदालतों के पास पर्याप्त न्यायाधीश भी नहीं हैं। इस हालत में अदालतों पर अनावश्यक मामलों का बोझ डालना ठीक नहीं है। निर्वाचित सरकारों को भी आत्मावलोकन करना होगा। आखिर वे जनता का विश्वास जीतने में विफल क्यों हो जाती हैं? जनता को सरकार से ज्यादा कोर्ट पर भरोसा क्यों है? चुनाव जीत कर सरकार बनाने के बाद नेतृत्व की दृष्टि में हर नागरिक समान होना चाहिए। जनता का विश्वास जीतने के लिए सरकार को निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ काम करना चाहिए। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सभी धर्मों और जातियों के लोगों को समान रूप से सुरक्षा प्रदान करे।

Ramswaroop Mantri

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