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जेल बनी नियम और जमानत बनी अपवाद

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मुनेश त्यागी 

     भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत से जुड़े कानूनों में सख्त और प्रभावी सुधार करने की जरूरत बताया है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि जैसे विदेशों में जमानत के कानून है वैसे ही हमारे यहां भी होने चाहिए। न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेष और एस के कोल की पीठ ने जमानत से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

     1977 में देश की सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले  में जमानत देते हुए कहा था कि “जमानत नियम और जेल अपवाद” होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय कि इस रूलिंग का देश की निचली अदालतों पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा था और बड़ी आसानी से आरोपियों को जमानतें दी जाने लगी थीं। लगभग 2010 तक जमानतों को लेकर यही नरम रवैया चलता रहा। मगर अब पिछले 10 वर्षों से जमानत की इस नरम प्रक्रिया को पलट दिया गया है और अब “जमानत एक अपवाद और जेल एक नियम” बन गई है।

    अब निचली अदालतों से जमानत मिलना एक टेढ़ी खीर हो गई है। अब तो जैसे आरोपी छोटी छोटी में भी जमानत को तरस गए हैं। अब जमानतों को लेकर निचली अदालतों का रवैया बिल्कुल बदल गया है, जैसे वे जमानत देने को तैयार ही नहीं है और उन्होंने न्यायमूर्ति कृष्णा ईयर की रोलिंग को लगभग नाकाम कर दिया है।

     अब अदालतों के जमानत न देने के रवैए से पुलिस और जांच एजेंसियों का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया है। ये एजेंसियां अब अपनी मनमानी पर उतर आई है। उन्हें अदालतों का कोई खौफ नहीं रह गया है। इन एजेंसियों ने जन विरोधी और कानून विरोधी रुख अपनाते हुए जैसे गिरफ्तारी को दंड देने का अधिकार बना लिया है।

     सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार आधारित किया है कि पुलिस द्वारा गिरफ्तारियों को रूटीन नहीं बनाया जा सकता। प्रमाणित साक्ष्यों के अभाव में किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। राजस्थान बनाम बालचंद वाले केस में 1977 में जस्टिस कृष्णा अय्यर ने अवधारित किया था कि “जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद।” जस्टिस कृष्णा अय्यर ने गुड़ी कांति नरसिमहुलु बनाम स्टेट में फिर यही अधारित किया और कहा कि जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद। उन्होंने कहा था कि आजादी, आरोपी का बुनियादी अधिकार है और जमानत को सजा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, ना ही इसे अपराध मुक्त माना जा सकता है।

     सर्वोच्च न्यायालय 1980 और 1994 में अपनी इसी जनहितकारी रूलिंग को दोहराती रही है। उसने बार-बार कहा है कि आरोपी को सबक सिखाने के उद्देश्य से जमानत देने से इनकार नहीं किया जा सकता और ऐसा करना सही और क़ानून सम्मत भी नहीं है।

     मगर इस रूलिंग के खिलाफ पिछले कई वर्षों से निचली अदालतों में उल्टा ही ट्रेंड चल पड़ा है जैसे वे आरोपियों को जमानत देना ही नहीं चाहतीं। हजारों केसों में ऐसा ही देखा जा सकता है। इसी कारण बहुत से आरोपी छोटी छोटी धाराओं में कई कई वर्षों से जेल में सड़ रहे हैं। अदालतों के इस रवैए के खिलाफ वकील और बार एसोसिएशन आंदोलित भी हुई हैं, उन्होंने जजों की शिकायत भी की हैं, मगर निचली अदालतों की कार्यप्रणाली पर कोई फर्क नहीं पड़ा और अब तो सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग की जैसे धज्जियां ही उड़ाई जा रही हैं।

      राष्ट्रीय पुलिस आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था भारत में 60% से ज्यादा आरोपियों को झूठे केसों में फंसा कर जेलों में ठूंस दिया जाता है और वे छोटे-छोटे केसों में वर्षों तक जेलों में सड़ते रहते हैं। आज भी यही स्थिति बनी हुई है। छोटे-छोटे केशव में आरोपियों को जमानत न मिलने से और उनके जेल में जाने से बहुत सारे वकील परेशान हताश और निराश हैं। उनको अदालतों का यह रवैया पसंद नहीं आ रहा है। वे अचंभे में हैं कि यह क्या हो रहा है?

     हमने एक”आशा किरण” नाम की टीम बनाकर 2002 से 2010 तक जेल में जाकर ऐसे ही गरीबों को कानूनी सहायता प्रदान की थी और हजारों कैदियों को  जेल लोक अदालतों के माध्यम से छुटवाया था। एक बार तो  जेलर और सुपरिटेडेंट हंसी हंसी में कहने लगे  कि वकील साहबान, अगर आपकी यह मुहिम इसी तेज गति से जारी रही तो आप तो हमारी जेल को ही खाली करा देंगे। हमारा मानना है की निरपराध अपराधियों की मदद करने के लिए वकीलों को छोटी-छोटी टीम बनाकर, जेलों में जाकर जेल लोक अदालतों में इन आरोपियों की मदद करनी चाहिए और इन्हें जेल से बाहर निकलवाना चाहिए।

     पुलिस और निचली अदालतों की कार्यप्रणाली को देखकर यही कहा जा सकता है कि हमारा जनतंत्र,एक पुलिस राज बनता जा रहा है। विदेशों में भी भारतीय न्याय व्यवस्था और पुलिस प्रणाली की यही छवि बनती जा रही है। आज के संदर्भ में  इस अवधारणा को तुरंत तोड़ने और रोकने की जरूरत है और जमानत के नियमों को आसान और प्रभावी बनाने की सबसे ज्यादा जरूरत है। भारतीय सरकार को इस विषय में सबसे ज्यादा तेजी से काम करने की जरूरत है। तभी भारत को एक पुलिस राज्य बनने से बचाया और रोका जा सकता है।

Ramswaroop Mantri

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