मुझसे कहा गया कि ‘ तुम या तो न्याय चुन लो या रोटी ? ‘
मैंने कहा कि ‘किसी भी व्यक्ति के लिए ये दोनों ज़रूरी हैं। फिर यह चुनाव क्यों ? ‘
उसने कहा ‘ तुम लोग समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो, हाशिये पर पड़े लोग हो तुम। हम तुम्हे हाशिए पर भी बर्दाश्त क्यों करें ? तुम्हें दो वक्त की रोटी मिल जाए, यही काफ़ी है और तुम हो कि इंसाफ़ माँग रही हो। पता नहीं, तुम्हारे साथ कुछ हुआ भी है कि नहीं ! तुम्हारी इज़्ज़त की क्या इतनी क़ीमत है कि तुम इज़्ज़तदार लोगों की तरह न्याय माँगो ? ‘
मैंने कहा ‘हम ग़रीब ही सही, इज़्ज़त हमारी भी है। आप जानते हैं मेरे साथ ज़ुल्म हुआ है। राज्य के मुखिया होने के नाते मुझे न्याय दिलाना आपकी ज़िम्मेदारी है। ऐसे में…’
लाल भभूका हुए मुखिया ने मेरी बात काटते हुए कहा कि ‘मुझे मेरी ज़िम्मेदारी मत समझाओ, अपना निर्णय बताओ। शुक्र करो कि तुम्हें चुनाव का मौक़ा दिया जा रहा है। लोकतन्त्र और संविधान नाम के पाखण्ड न होते तो…’
तर्क के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची थी, सो मैंने न्याय पर उंगली रख दी। मुखिया ने वितृष्णा से मुझे देखते हुए मुझे साधुवाद कहा, फिर हँसते हुए न्याय का आश्वासन दिया। उसके बाद मेरे परिवार को सचमुच रोटी के लाले पड़ गए। कुछ-कुछ दिनों के बाद हमारी झोंपड़ी उजड़ जाती रही, पर मैं न्याय की आस में सब बर्दाश्त करती रही। न्याय की उम्मीद में तीन बरस बीत गए। इस बीच मेरे पिता को पुलिस ने हिरासत में लिया और हिरासत में ही उनकी मौत हो गई। मेरे दो परिजन सड़क पर उल्टी दिशा से आते अनियंत्रित ट्रक से कुचलकर मारे गए। मैं अकेली थककर हताश हो गई थी, सो एक दिन मुखिया के एक ख़ास आदमी के ज़ोर देने पर उसके साथ मुखिया से मिलने पहुँच गई। उसने पानी पिलवाया और मेरी कुशलक्षेम पूछी। मैंने न्याय में हो रहे विलम्ब की चर्चा की। वह हँसा प्रायः वह किसी भी परिस्थिति में हँसता ही था ! न्यायिक प्रक्रिया में वक्त तो लगता ही है। मैंने उसे पिता और परिजनों की मौत के बारे में बताया। उसने दुख जताते हुए कहा ‘ होनी को कौन टाल सकता है ? ‘
नाउम्मीद होकर मैं लौट आने के लिए मुड़ी तो सुना, वह कह रहा था ‘आज तुम्हारा जन्मदिन है न शारदा ! ‘ मैं अपना जन्मदिन भूल चुकी थी, उसे जाने कैसे पता भी था और याद भी था। उसने बधाई देते हुए मेरी लम्बी उम्र की कामना की और मैं किसी अनिष्ट की आशंका से काँप गई !
- हरभगवान चावला,सिरसा,हरियाणा






