अवधेश पुरोहित
भोपाल। झाबुआ की राजनीति में वर्षों से सक्रिय रहकर उच्च पदों पर झाबुआ का कितना विकास कांतिलाल भूरिया ने किया इस बात से झाबुआ के लोग भलीभंाति परिचित हैं कि कांतिलाल भूरिया जो केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक, मध्यप्रदेश में मंत्री और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे लेकिन इतने सब महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बाद भी झाबुआ का उनके शासनकाल में कितना विकास हुआ, इस बात को लेकर वहां के स्थानीय नागरिक भलीभांति समझ चुके हैं, यही नहीं अपने आपको आदिवासियों का स्वयंभू नेता स्थापित करते हुए झाबुआ, अलीराजपुर ही नहीं बल्कि धार और आसपास के जिलों का शायद ही कोई आदिवासी नेता होगा जो अपना प्रभाव बनाया पाया हो।
हाँ, यह जरूर है कि अपने पिता के स्वयंभू नेता होने की राजनीति की तर्ज पर उनके पुत्र विक्रांत भूरिया जरूर दिग्विजय सिंह की मेहरबानी से युवक कांग्रेस की कमान संभालने में कामयाब हो गए। कुल मिलाकर कांतिलाल भूरिया के परिवार की राजनीति जो झाबुआ में कायम है उसी के चलते लॉकडाउन के दौरान आये अप्रवासी मजदूरों और उनके चहेते नेताओं की कारगुजारी के चलते इस जिले के तमाम लोगों को ठीक से खाद्यान्न भी उपलब्ध नहीं हो सका, इसका खुलासा मध्यप्रदेश सरकार कर चुकी है और भूरिया के चहेते कांग्रेसी नेता की कारगुजारी के चलते गरीबों के हक पर डाका डालने वाले इस नेता को जेल की हवा तक भी यह सरकार लगवा चुकी है।
जहां तक बात कांतिलाल भूरिया और उनके पुत्र विक्रांत भूरिया की करें तो यदि छतरपुर के जागरूक नागरिकों की बात मानें तो उनकी डिक्शनरी में क्षेत्र का विकास नहीं बल्कि अपने परिवार और अपने परिवार के चंगु-मंगु नेताओं के विकास की परम्परा है और इसी परम्परा को कायम करते हुए दिग्विजय सिंह की मेहरबानी से युवक कांग्रेस की कमान संभालने के बाद कांतिलाल के पुत्र विक्रांत भूरिया ने झाबुआ में नियमों को धता बताते हुए एक तीन कमरों का नर्सिंग कॉलेज खोज रखा है और मजे की बात तो यह है कि पिता-पुत्र की राजनीति के दम पर मध्यप्रदेश सरकार ने तीन कमरों वाले इस नर्सिंग कॉलेज को मान्यता देने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी जबकि नियम है कि नर्सिंग कॉलेज की कान्फ्रेंसिंग के लिये बड़े हॉल होना चाहिये और कॉलेज कैम्पस और लेबोरेटरी आदि का होना अति आवश्यक है लेकिन यदि झाबुआ के अलीराजपुर रोड पर बने आदिवासियों के स्वयंभू नेता बनकर राजनीति करने वाले भूरिया परिवार के इस तीन कमरे के नर्सिंग कॉलेज को देखकर हर कोई सरकार के उन नुमाइंदों की कारगुजारी को लेकर चर्चा करते नजर आते हैं और जैसा कि कांतिलाल भूरिया की राजनीति के चलते अक्सर लोग कहा करते हैं कि यह भूरिया की संपत्ति है वैसे ही इस नर्सिंग कॉलेज के नियमों को धता बनाते हुए बने तीन कमरों के इस नर्सिंग कॉलेज को देखकर यह लगता है कि शायद सरकार में कॉलेज खोलने का कोई नियम व कायदा नहीं है तभी तो मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी करते हुए इस कॉलेज की अनुमति दी, हालांकि भूरिया परिवार द्वारा इस तीन कमरों के कॉलेज खोले जाने को लेकर भी क्षेत्र के लोग जिस प्रकार से उनके क्लीनिक की कार्यशैली की चर्चा करते हैं वैसी ही चर्चा करते हुए लोग नजर आते हैं, अब सवाल यह उठता है कि भाजपा के शासनकाल में कांग्रेसी अपना उद्योग धंधा शुरू करें लेकिन कम से कम नर्सिंग कॉलेज के तय मापदण्डों और दिशा निर्देशों का पालन करने में भी कोई कोताही नहीं बरतें
लेकिन भूरिया परिवार के इस नर्सिंग कॉलेज की दशा और दिशा देखकर तो यही लगता है कि अधिकारियों ने आखिर नियमों को धता बताते हुए इनको अनुमति कैसे दी इस तरह का सवाल क्षेत्र में लोग तमाम प्रश्न खड़े करते नजर आ रहे हैं हालांकि इस प्रदेश में भाजपा शासनकाल में इस प्रकार के कई कॉलेज व संस्थान ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े नर्सिंग होम राजनेताओं के हैं, लेकिन झाबुआ जिले के तीन कमरों के इस अजब व गजब नर्सिंग कॉलेज को देखकर यह लगता है कि शायद इस कॉलेज की स्वीकृति देने वाले अधिकारी कांतिलाल भूरिया व उनके पुत्र विक्रांत भूरिया के युवक कांग्रेस का अध्यक्ष होने के चलते नियमों को ताक में रखकर इस कॉलेज की अनुमति आंख बंद कर दी है तो इस बारे में क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि इस तीन कमरे के नर्सिंग कॉलेज में कितने लोग बैठ पाएंगे इसमें लेबोरेटरी कहां होगी और लोग कहां एकत्रित होकर कान्फ्रेंस कर पायेंगे और परिसर होने का तो सवाल ही नहीं है, लोग सड़क अथवा दूसरे मैदान मेंखड़े होकर निजी स्कूलों के बच्चों की तरह चर्चा तो कर ही लेंगे? कुल मिलाकर पिता-पुत्र की राजनीति की बदौलत नर्सिंग कॉलेज के नियम व कायदे कानूनों को ताक में रखते हुए इस खोले गये नर्सिंग कॉलेज को लेकर क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चायें हैं?
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