

होलकरकालीन महलों का आर्किटेक्चर देखने सूरत से 85 आर्किटेक्चरल स्टूडेंट्स इंदौर आए। पीपी सवाणी यूनिवर्सिटी सूरत के इन स्टूडेंट्स ने होलकर राजाओं के पार्टी डेस्टिनेशन लालबाग पैलेस में विजिट किया। उन्होंने देखा कि 130 साल पहले बनाए गए इस महल में वे सुविधाएं थीं जिनकी उस समय दुनिया में किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। बतौर आर्किटेक्चर स्टूडेंट्स उन्होंने यहां जो देखा-समझा, उन चीजों की ड्रॉइंग्स बनाईं। वे इस पर एक स्टडी भी तैयार करेंगे जो यूनिवर्सिटी के बाकी स्टूडेंट्स भी पढ़ेंगे। उदय सिंह होलकर ने इन स्टूडेंट्स से चर्चा भी की। लालबाग पैलेस की भव्यता, इसकी निर्माण शैली और होलकर राजाओं की दूरदर्शिता के बारे में कुछ रोचक तथ्य इन स्टूडेंट्स और फैकल्टी ने शेयर किए।

छतों पर पीओपी की गई है।
भारत का पीओपी ऑर्नामेंटेशन वाला पहला महल
72 एकड़ में फैला यह भव्य महल यूरोपियन शैली में बना है। जो बात सबसे ज्यादा हैरत में डालती है वह यह है कि 130 साल पहले जब भारत में पीओपी किसी से सुना भी नहीं था, तब लालबाग पैलेस में पीओपी का ऑर्नामेंटेशन यानी गोल्ड और सिल्वर कलर में कशीदा कारीगरी की गई थी। तब भारत के किसी भी पैलेस में ऐसी कारीगरी नहीं की गई थी।

लालबाग पैलेस का ड्राइंग रूम।
दुनिया में ऐसे दो ही द्वार
लालबाग पैलेस का मुख्य द्वार इंग्लैंड के बकिंघम पैलेस की तरह बनाया गया था। फोर्ज्ड आयरन (बीड़) से बनाए गए इस भारी भरकम गेट को जहाज के रास्ते मुंबई लाया गया और वहां से सड़क मार्ग से यह इंदौर लाया गया था। दुनिया में ऐसे दो ही द्वार हैं। इस पर होलकर राज का चिह्न बनाया गया था और अष्टधातु के दो शेर भी बनाए गए।
तकरीबन 10 साल पहले इस गेट में कुछ मामूली खराबी आ गई थी। इंदौर के तो सभी कारीगर यह काम करने से इनकार कर गए। कोलकाता तक दौड़ लगा ली गई, लेकिन बात नहीं बनी। आखिरकार इंग्लैंड से ही कारीगर बुलवाए गए। इसमें एक कील भी लगाना होगी तो बकिंघम के कारीगर ही लगा सकेंगे। लालबाग के इस द्वार का छोटा सा टुकड़ा भी अगर गिरता है तो उसे बर्मिंघम से उसी पुराने सांचे में ही तैयार कराना होगा।

डाइनिंग हॉल जहां एक साथ कई लोग खाना खा सकते हैं।
बिल्डिंग ओरिएंटेशन ऐसा है कि गर्मी लगती ही नहीं
बहुत आश्चर्य की बात है कि मॉडर्न स्टाइल में बने इस पूरे पैलेस के किसी भी कमरे में सीलिंग फैन के लिए इलेक्ट्रिक पॉइंट नहीं छोड़े गए थे। न ही कभी पंखे लगवाए गए। फिर भी यहां के एक भी कोने में गर्मी महसूस नहीं होती। ऐसा इसलिए क्योंकि बिल्डिंग का ओरिएंटेशन प्लान ऐसा है कि यहां हर वक्त हवा आती है और ठंडक बनी रहती है। उत्तर-दक्षिण में बने इस महल के बाहर काफी खुला एरिया है। पहले बाहर बड़ा फव्वारा भी था। पास ही नदी भी थी। पानी के कारण भी ठंडक बनी रहती होगी। कुछ कमरों में बेड के पास कपड़े और रस्सी वाले पंखे हैं जिन्हें कोई चलाए तो वे हवा देते थे। महल में हर कमरे में चारों तरफ फ्रेंच और इंडियन स्टाइल विंडो हैं।
उस दौर में इंटरनल इलेक्ट्रिकल फिटिंग रेयर
उस दौर में महल में इंटरनल इलेक्ट्रिकल फिटिंग की गई थी जो उस जमाने में दुनिया के कुछ महलों में ही होगी। आज भी पैलेस में वही सिस्टम काम कर रहा है। इससे अंदाजा लगता है कि किस क्वालिटी के तार और पाइप इस्तेमाल किए गए होंगे।

फर्श से लेकर दीवारों तक संगमरमर और गोल्डन ऑर्नामेंट वर्क।
इटालियन मार्बल, शैंडलियर और झाड़-फानूस
पूरे महल में इटालियन मार्बल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया है। यह ठंडा पत्थर है और हीट ट्रैप नहीं करता है। इसके कारण भी महल में ठंडक बनी रहती है। भव्य झूमर, झाड़ फानूस, आलीशान कालीन भी आज तक वैसे ही चमक रहे हैं। होलकर राजाओं का एस्थेटिक सेंस कमाल का था। इसके निर्माण में रोमन शैली, पेरिस के राजमहलों वाली सजावट, बेल्जियम की कांच कला, कसारा संगमरमर के स्तंभ शामिल किए गए।
होलकरों का पार्टी डेस्टिनेशन था लालबाग पैलेस
इस एजुकेशनल टूर में शामिल एशान वैरागकर ने बताया कि स्टूडेंट्स ने लालबाग के फर्नीचर की ड्रॉइंग्स भी बनाईं। यहां का फर्नीचर भी आलीशान है। वेस्टर्न स्टाइल डाइनिंग हॉल या जिसे बैंक्वेट हॉल कहते थे वहां 100 लोग खाना खा सकते थे। यह भी बताया जाता है कि लालबाग पैलेस होलकरों का पार्टी डेस्टिनेशन था। इसलिए डांस फ्लोर भी बनाया गया था। मेहमानों का खाना ऊपर से नीचे लाने ले जाने के लिए लॉजिंग लिफ्ट भी लगवाई गई थी।

सीलिंग पर फ्रांस के कलाकारों ने बनाई पेंटिग्स।
महल की सीलिंग पर पेंटिंग्स हैं जिन्हें बनवाने फ्रांस से बुलाए कलाकार
जानकारों के मुताबिक पैलेस का निर्माण 1850 के आसपास शुरू हुआ। 1910 में तुकोजीराव होलकर द्वितीय ने इसकी आंतरिक सज्जा कराई। पेंटिग्स फ्रांस के वीनस व अपोलोजेसी ग्रीक ने किसी ऊंची व चौड़ी सीढ़ी पर लेटकर बनाई थीं। इन सीलिंग पेंटिंग्स के रंग आज भी फीके नहीं पड़े हैं। वॉटर पाइप्स में लीकेज के कारण कुछ पेंटिंग्स खराब हुई थीं पर दो करोड़ रुपए लगाकर सुधार कार्य करा लिया गया था।





