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खेल को खेल ही रहने दो

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गोपाल राठी

खेलों में अपनी रुचि ज़रूर है लेकिन खेलों में व्यवसायिकता आने के बाद यह रुचि कम होती गई l देखने मे आया कि खेल में खेल भावना के अलावा सभी भावनाएं बहुत उग्र रूप में सामने आ जाती है l राष्ट्रवादी भावनाओं का तो जैसे सैलाब उमड़ पड़ता है l भारत पाकिस्तान के बीच होने वाले क्रिकेट हॉकी या अन्य किसी खेल में यह भावना दोनों तरफ बड़ी प्रबल हो जाती है l ऐसा लगता है खेल का मैच नहीं युद्ध हो रहा हो l उन्हें खिलाड़ियों के कौशल  पर भरोसा नहीं होता इसलिए जीत के लिए मन्दिरो में पूजा अर्चना और मस्जिदों में इबादत की जाती है l सब किसी भी तरह जीतने की दुआ मांगते हैं l जीत पर खुश होते है नाचते है फटाके चलाते है जश्न मनाते है तो हार पर मायूस होकर खिलाड़ियों को गालियाँ देते है ,रोने लगते है तोड़फोड़ करने लगते है l 
अपने देश की विजय पर खुशी हमें भी होती है बिल्कुल वैसे ही जैसे हमारे मोहल्ले की टीम की जीत पर होती थी l हमारे स्कूल कालेज या शहर की टीम जीतने पर होती थी l हम यह मानते हैं कि कोई टीम हारने के लिए मैच नहीं खेलती l जीत के लिए कौशल के अतिरिक्त टीम की अंडरस्टैंडिंग और मिले अवसर का लाभ उठाने की कारगर रणनीति बहुत जरूरी है l अन्यथा अच्छे खेल प्रदर्शन के बावजूद छोटी सी चूक मैच में पराजय का कारण बन जाती है 
देश के मुसलमानों के प्रति घृणा को स्थायी बनाने के लिए संघी बिरादरी शुरू से यह प्रचार करती रही है कि भारत पाकिस्तान के मैच के समय मुसलमान पाकिस्तान की जीत के लिए दुआ करते है ,पाकिस्तान की जीत पर खुश होते है और फटाके फोड़ते है l बचपन मे हम भी इस दुष्प्रचार के प्रभाव में यह मानते रहे लेकिन जैसे जैसे बड़े हुए तो हमें इस प्रचार की सच्चाई पता चली l हमें आज तक कोई ऐसा मुसलमान नहीं मिला जो पाकिस्तान की जीत पर खुश दिखा l अब संघी कहते हैं कि वे हिंदुओं के भय से ज़ाहिर नहीं करते लेकिन मन ही मन खुश होते है l अपने मज़हब के नाम पर बने मुल्क पाकिस्तान बनने के वावजूद जिन मुसलमान भाइयों ने अपनी मातृभूमि भारत मे ही रहना कुबूल किया उन पर इस तरह की तोहमत लगाकर पूरी मुस्लिम बिरादरी की राष्ट्रभक्ति पर संदेह करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय  है l
1936 के ओलम्पिक में ध्यानचंद के नेतृत्व में हॉकी खेल में झंडा गाड़ने के बाद द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण ओलम्पिक 12 वर्ष तक नहीं हो पाया l इस बीच 1947 में भारत का विभाजन हो गया l भारत की मजबूत हॉकी टीम भी दो भागों में बट गई l 1948 का ओलम्पिक इंग्लैंड में हुआ था जहां विभाजित भारत की दोनों टीमो ( भारत पाकिस्तान ) ने शिरकत की थी l बिना उम्मीद के ओलम्पिक में खेलने गई भारतीय टीम के खिलाड़ियों को ओलम्पिक खेलने का कोई पूर्व अनुभव नहीं था l दादा ध्यानचंद तब तक रिटायर्ड हो चुके थे l इन विषम परिस्थियों में भारत की टीम ने 1948 के ओलम्पिक खेलो में भाग लिया l और फाइनल में अंग्रेजों की टीम को पराजित कर स्वर्ण पदक प्राप्त किया था l
इस पृष्ठभूमि में अभी हाल ही में बनी गोल्ड फ़िल्म देखी तो उस समय की जद्दोजहद का कुछ अंदाज़ा लगा l इस फ़िल्म में गौर करने वाली बात यह थी कि भारत और पाकिस्तान की हॉकी टीम के अधिकांश खिलाड़ी आपस मे मित्र और परिचित थे l खेल मैदान की दर्शकदीर्घा में बैठकर दोनों एक दूसरे का हौसला बढ़ा रहे थे l इस ओलम्पिक में भारत और पाकिस्तान को अलग अलग समूह में रखा गया था l पाकिस्तान सेमी फाइनल तक नहीं पहुंच पाया  जबकि भारत सेमी फाइनल का बौरीयर पार कर फाइनल में आ गया जहां उसका मुकाबला इंग्लैंड से हुआ l फ़िल्म में भारत पाकिस्तान के खिलाड़ी एक दूसरे का मनोबल बढ़ाने के लिए मारल सपोर्ट करते हुए दिखाई दे रहे थे l
खेलों को व्यावसायिकता और अन्धराष्ट्र वाद से बचाना अत्यंत ज़रूरी है अन्यथा उनके व्यवसाय बन जाने और खेल  मैदान को युद्ध का मैदान बन जाने से कोई नहीं रोक सकता l 
अब तो हमारे देश मे राजनेताओं की ऐसी नस्ल पैदा हुई है जो हर खिलाड़ी के पराक्रम का श्रेय खुद लेना चाहती है l बिना कुछ किए धरे वाही वाही लूटने वाली यह प्रवृत्ति उन खिलाड़ियों का अपमान है जिन्होंने घोर गरीबी और असुविधाओं के वावजूद अपनी लगन और दृढ़ संकल्प से यह मुकाम हासिल किया l
@ गोपाल राठी

Ramswaroop Mantri

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