पुष्पा गुप्ता
जीवन-यथार्थ संजटिल होता है। उसके संघटन, स्थापत्य और गतिकी को हम महज इन्द्रियानुभवों के जरिए नहीं समझ सकते। इसके लिए आपके पास प्रतीति को भेदकर सार वस्तु तक पहुँचने वाली दृष्टि होनी चाहिए, अमूर्तन, सामान्यीकरण और अवधारणा-निर्माण की क्षमता होनी चाहिए।
भौतिक और आत्मिक जीवन की गति की द्वन्द्वात्मकता और अन्तर्सम्बन्धों को समझे बिना आप यथार्थ के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, वैचारिक—किसी भी पहलू को और उनके अन्तर्सम्बन्धों को नहीं समझ सकते.
आभासी तौर पर यथार्थ मकड़ी के जाले की तरह उलझा हुआ लगता है, लेकिन उसकी एक नियमसंगति होती है, एक सुव्यवस्थित विन्यास होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से रिक्त कवि-लेखक-कलाकार इस मकड़ी के जाले को मकड़ी के जाले की ही तरह देखते हैं, चाहे उनके अनुभव और पर्यवेक्षण जितने भी सूक्ष्म और व्यापक क्यों न हों।
वे जीवन के आभासी, खण्डित, आंशिक ,विरूपित और स्थैतिक (जड़) द्विआयामी चित्र ही तरह-तरह से उपस्थित करते हैं और यही उनका “यथार्थवाद” होता है। यथार्थवादी आवरण में ढँकी होने पर भी ये कृतियाँ किसी न किसी रूप में अनुभववादी, भोड़ी भौतिकवादी, प्रत्यक्षवादी, प्रकृतवादी या भाववादी ही हुआ करती हैं। जीवन और उसकी गतियों के बारे में ये कृतियाँ किसी न किसी रूप में रहस्यवादी, निष्कर्मवादी नतीज़ों तक, विरति और उसके उलट आत्मग्रस्त भोगवाद के नतीज़ों तक, नैराश्य, तटस्थता और अवसादी अन्यमनस्कता के नतीज़ों तक ही पहुँचाती हैं।
हमारे समय के ज़्यादातर प्रगतिशील-जनवादी-वामपन्थी लेखन की भी समस्या यह है कि जिन बहुत थोड़े से लोगों के पास जीवन का व्यापक अनुभव और पर्यवेक्षण है भी, उनके पास बदलते यथार्थ की गतिकी और दिशा को, निरन्तरता और परिवर्तन के तत्वों के द्वन्द्व को, सार और प्रतीति के द्वन्द्व को जानने- समझने की कोई वैज्ञानिक दृष्टि है ही नहीं।
वे ज़्यादा से ज़्यादा “प्रामाणिक” प्रकृतवादी या अनुभववादी लेखन करते रहते हैं, या फिर, अपने बने-बनाये सूत्रीकरणों के हिसाब से जीवन से कुछ तथ्यों के टुकड़े चुनकर यथार्थ का मनमाना चित्र उकेरते रहते हैं, यूँ कहें कि जूते की नाप के हिसाब से पैर को काटते रहते हैं।
इस मायने में मुक्तिबोध पिछले सात-आठ दशकों के ‘लिटरेरी लैण्डस्केप’ पर दूर से एक प्रकाश-स्तम्भ की तरह नज़र आते हैं। उन्होंने गहन दार्शनिक अध्यवसाय से अपनी विश्वदृष्टि और विश्लेषण-पद्धति विकसित की और अपने समय के यथार्थ को समझने और अपने सृजन में उसके कलात्मक परावर्तन के प्रयास किये।
ऐसे सभी ‘पाथब्रेकिंग’ और ‘ट्रेंडसेटर’ प्रयोगों की अपनी सफलताओं के साथ अपनी विफलताएँ भी होती हैं, और मुक्तिबोध भी इसके अपवाद नहीं थे, लेकिन उनके कृतित्व की, और रचना-प्रक्रिया को लेकर उनके सघन विचार-मन्थन की ऐतिहासिक महत्ता को कोई बेहद सतही, कूपमण्डूक, लोकरंजकतावादी या कोई भोंड़ा भौतिकवादी ही खारिज करेगा।
यह मुक्तिबोध की दार्शनिक विश्लेषण क्षमता और इतिहास को देखने की वैज्ञानिक दृष्टि का ही नतीज़ा था कि अपने देशकाल को उसके अतीत से जोड़ने वाले उलझे हुए तन्तुओं को भी उन्होंने कविता और विचारों की दुनिया में समझने की कोशिश की और अपने संक्रमणशील कालखण्ड की तरल परिस्थितियों में निहित अंतरविरोधों की शिनाख़्त करते हुए भविष्य की दिशा और संभावनाओं की भी पड़ताल की।
कई बार मुझे लगता है कि 1950 के दशक में भारतीय समाज के इतिहास और वर्तमान को समझने में समाज विज्ञान के क्षेत्र में जैसी पथान्वेषी, कुशाग्र और मौलिक प्रतिभा डी. डी. कोसम्बी की थी, वैसी ही साहित्य की वैचारिकी और सृजन के क्षेत्र में मुक्तिबोध की थी. मेरी जानकारी में, अन्य भारतीय भाषाओं में भी इतना विचार-सम्पन्न सर्जक उस दौर में अन्य कोई नहीं था। उस दौर में तो नहीं ही था, शायद उसके बाद के दौरों में भी नहीं हुआ।

