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वर्तमान सत्ता के चरित्र को देखकर क्या आप आज उसी नैतिकता के निर्वहन की अपेक्षा कर सकते हैं?…..कहाँ से कहाँ आ गए हम”

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जी हाँ सही सुना! प्रधानमंत्री नेहरू को कार्टूनिस्ट शंकर ने एक बार गधे के रूप में चित्रित किया था। हाँ तब ही, जब वह प्रधानमंत्री के पद पर थे। यह वह दौर था जब हद से ज्यादा आलोचना को भी पद की प्रतिष्ठा से जोड़ने का चलन नहीं था। न नेहरू और न उनके मंत्रिमंडल ने इसको मुद्दा बनाया। नेहरू चौराहे पर खड़े होकर रोने वालों में से नहीं थे। वे विशाल हृदय के थे। उनकी नीतियां गलत हो सकती हैं, पर नीयत तो कतई नहीं।

नेहरू अभिव्यक्ति की आजादी के प्रबल पैरोकार थे। वे विपक्ष की अहमियत जानते थे, इसलिए उन्होंने जमानत तक जब्त करा चुके कई बड़े विपक्षी नेताओं को राज्यसभा के जरिये देश की सबसे बड़ी पंचायत को विपक्ष की आवाज़ से समृद्ध करवाया। उन्होंने कभी विपक्ष मुक्त भारत का आह्वान नहीं किया।
वे लोकतांत्रिक चेतना से संपन्न थे, इसलिए खुद ही छद्म नाम से अपनी आलोचना लिखते हैं, ताकि लोगों की प्रतिक्रिया जान सकें। बताते चलें कि नेहरू ने स्वयं कलकत्ता की पत्रिका ‘माडर्न रिव्यू’ में चाणक्य नाम से अपनी आलोचना लिखी थी।
उन्होंने लिखा था- “नेहरू को जिस तरह से लोग हाथों हाथ ले रहे हैं और उनके पीछे दीवाने हैं, कहीं एक दिन नेहरू तानाशाह न हो जाएं ……..नेहरू तानाशाह हो सकता है इसलिए उसे रोकने की जरूरत है। उसकी हर बात पर यकीं करना ठीक नहीं। लेख के अंत में लेखक ने लिखा – ”वी वांट नो सीजर्स”। बाद में खुलाव खुला कि यह चाणक्य और कोई नहीं, स्वयं नेहरू थे।
नेहरू का लोकतन्त्र सिर्फ़ सत्ता हासिल करना या उस पर दावेदारी सिद्ध करने तक सीमित नहीं था। वे कहते हैं – “यदि प्रजातंत्र का मतलब अपना निर्णय भीड़ पर छोड़ना है तो यह प्रजातंत्र भाड़ में जाये। मैं ऐसी मानसिकता के ख़िलाफ़ लड़ूँगा, जहाँ कहीं भी यह सर उठायेगी। हाँ, गणतंत्र मुझसे प्रधानमंत्री पद छोड़ने के लिए कह सकता है। मैं इस आदेश का पालन करूँगा। यदि आने वाले चुनावों में कांग्रेसी सिर्फ़ कुछ एक वोटों की खातिर अपने आदर्श छोड़ देंगे तो कांग्रेस बेजान हो जायेगी। मुझे ऐसी लाश नहीं चाहिए।”
(21 सितंबर 1950 को नासिक कांग्रेस अधिवेशन में)

नेहरू ने आज की तरह विपक्ष को धमकाने के लिए कभी सरकारी तंत्र का इस्तेमाल नहीं किया। आज जबकि तमाम घोटालों में संलिप्तता को सत्ताधारी दल में कदम रखते ही निर्लिप्तता का प्रमाणपत्र मान लिया जाता है, हमें नेहरू के समय की सिद्धांत-आधारित, लोकतांत्रिक-चेतना-संपन्न राजनीति की तरफ लौटना होगा और मूल्यांकन करना होगा कि हम कहाँ से कहाँँ आ गए। सुनते हैं एक बार एक चुनावी सभा में मंच पर ही यह जानकारी होने पर कि पार्टी ने एक गलत उम्मीदवार का चयन कर लिया है, जनता से उसे वोट न देने की अपील कर दी। यह वाकया विंध्य प्रदेश के रीवा के प्रत्याशी शिवबहादुर सिंह का है।
वर्तमान सत्ता के चरित्र को देखकर क्या आप आज उसी नैतिकता के निर्वहन की अपेक्षा कर सकते हैं? हमें लगता है बिलकुल नहीं!

नेहरू अपने धुर विरोधी लोहिया और जेपी का भी साथ चाहते थे। वे चाहते थे कि दल इनकी प्रतिभा से लाभान्वित हो। यह अलग बात है कि लोहिया और जेपी दोनों ने विपक्ष की भूमिका को सर्वाधिक महत्त्व दिया। तब के नेताओं में राजनीतिक विरोध के बावजूद संवाद कायम रहता था। राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर विरोधी नेताओं और नेहरू के बीच पत्रव्यवहार चलता रहता था। किसी सिलसिले में नेहरू लोहिया के एक पत्र के जवाब में लिखते हैं – “प्रिय राम मनोहर, तारीख और पते के बिना तुम्हारा पत्र मिला। उत्तर सोशलिस्ट पार्टी इलाहाबाद के पते पर भेज रहा हूँ। मुझे खुशी है कि आप जैसा गंभीर व्यक्ति चुनाव में मेरा विरोध कर रहा है। मुझे लगता है कि इस चुनाव में चर्चा राजनीतिक कार्यक्रमों पर केंद्रित होगी। सतर्क रहें और सुनिश्चित करें कि व्यक्तिगत चर्चा पर अंकुश लगाया जाए। मैं अपनी ओर से वादा करता हूं कि मैं एक दिन के लिए भी अपने निर्वाचन क्षेत्र का दौरा नहीं करूंगा।”
यह तब का दौर है जब मतवैभिन्नय को दुश्मनी नहीं समझा जाता था।

इसी तरह लोहिया से जुड़ी हुई एक घटना याद आती है। बताते हैं एक बार (1953 में) लोहिया लखनऊ में अपनी ही पार्टी की क्षेत्रीय बैठक में विमर्श का हाल जानने चुपचाप श्रोता के तौर पर पिछली सीट पर जा बैठे। किसी ने उनको नहीं पहचाना। सबकी निगाहें मंचीय नेताओं पर थी। बैठक में कांग्रेस और नेहरू को लेकर आक्रामक भाषण दिए जा रहे थे, तभी लखनऊ के एक नेता नेहरू और एडविना के संबंधों को लेकर भी नेहरू पर तंज कसने लगे। तभी लोहिया उत्तेजित होकर वक्ता को डांटने लगे। वह बोले, ‘राजनीति में व्यक्तिगत आलोचना और स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर किसी के जीवन पर निजी टीका-टिप्पणी ठीक नहीं है। इस तरह की टिप्पणियां वे करते हैं जिनके पास तर्क नहीं होते, विरोधियों की आलोचना के लिए तथ्य नहीं होते। नीति नहीं होती। कम से कम प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के लोगों से मैं विरोधियों पर तर्क हीन और अमर्यादित टिप्पणियों की उम्मीद नहीं करता। आप लोग एक बात ठीक से समझ लें कि लोहिया, प्रधानमंत्री नेहरू की नीतियों का विरोधी है, न कि जवाहर लाल नेहरू का।’
समाजवादी पुरोधा अपने सारे राजनीतिक विरोध के बावजूद नेहरू के रागात्मक लगाव के चलते आश्वस्त रहते थे कि संकट के समय चाहे कोई न खयाल रखे लेकिन जब तक नेहरू हैं, तब तक चिंता की कोई बात नहीं।

इसी तरह एक बार कांग्रेस के नेता संपूर्णानंद समाजवादी आचार्य नरेंद्र देव के आग्रह पर समाजवादी घोषणापत्र को अंतिम रूप देते हैं। उनके इस व्यवहार की सूचना किसी ने नेहरू को दी और इसके लिए संपूर्णानंद के खिलाफ पार्टीविरोधी कृत्य के लिए कार्यवाई की मांग की, पर नेहरू ने बड़े मन का परिचय दिया। उनके द्वारा इसे सौमनस्यता के रूप में देखे जाने का आज की राजनीति के परिप्रेक्ष्य में लोगों को आश्चर्यचकित कर सकता है, पर यह सच है।

हाँ तो बात छूट गई थी, बात हो रही थी शंकर के कार्टून की, जिसमें वे प्रधानमंत्री को गधे के रूप में दिखाते हैं।
कार्टून देखकर नेहरू शंकर को फोन लगाते हैं और कहते हैं कि “क्या आज शाम आप एक गधे के साथ चाय पीना पसंद करेंगे?”
आपको पता हो कि शंकर की पत्रिका “शंकर्स वीकली” का उद्घाटन करने को नेहरू इसी शर्त के साथ तैयार हुए थे कि आप अपने कार्टूनों में मेरे साथ कोई रियायत नहीं करेंगे।
बाद में शंकर के कार्टून “डोंट स्पेयर मी शंकर” के नाम से ही प्रकाशित हुए।

इसी तरह एक और प्रख्यात कार्टूनिस्ट लक्ष्मण बताते हैं कि वे एक सुबह चौंक गए कि जब उनके पास नेहरू जी का फोन आ गया और उन्होंने कहा कि “आज मैंने अखबार में आपका बढ़िया कार्टून देखा। क्या मुझे फ्रेम करवाने के लिए इसकी बड़ी कॉपी आपके हस्ताक्षर वाली मिल सकती है?”
साथ ही एक और मौके पर नेहरू ने कार्टूनिस्ट लक्ष्मण को फोन कर कहा कि “मुझे लगता है कि पिछले दो महीनों में मैने कोई काम नहीं किया है, क्योंकि मुझ पर आपका बनाया एक भी कार्टून इन दिनों मैंने नहीं देखा”।
ये बड़े लोग थे जो अपनी तारीफों को तो नजरअंदाज करते थे, लेकिन अपनी आलोचनाओं का सम्मान करते थे। अब तो नोटिस पकड़ाने का रिवाज है।

ये नेहरू ही थे जो “अबे सुन बे गुलाब” लिखने वाले निराला के दैनिक खर्चों की चिंता कर उनके लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराते थे और ताकीद करते थे कि ये रुपया महादेवी वर्मा के जरिये उन पर खर्च हो। वे निराला के निरालेपन से वाकिफ थे। ज्ञात हो कि जाड़े में ठिठुरते हुए निराला जी के लिए रजाई की व्यवस्था महादेवी ने कराई थी, जिसे निराला ने किसी और जरूरतमंद को दे दी थी।
नेहरू ने नागार्जुन की प्रखर आलोचना को सुन आज के नेताओं की तरह कोई नोटिस या एफआईआर नहीं दर्ज कराई थी।
ये था तब के नेताओं का बड़प्पन और ये बड़प्पन लगभग सभी नेताओं में था। इसी तरह नेहरू के मुखर आलोचक रहे राजेंद्र प्रसाद ने भारतरत्न देने का फैसला तब लिया जब नेहरू विदेशी दौरे पर थे और वह भी बिना उनकी सलाह लिए। तत्कालीन राष्ट्रपति ने नेहरू के सफल विदेशी दौरे के उपलक्ष्य में उनके सम्मान में एक रात्रिभोज रखा, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री की सलाह के बिना उन्हें भारतरत्न दिए जाने के अपने फैसले से सबको चौंका दिया।
यह वह दौर था जब लोग राजनीतिक विरोध को वैमनस्यता की वजह नहीं बनने देते थे।
नेहरू अपनी तमाम कमजोरियों के साथ एक बेहतरीन इंसान थे। असहमति को उन्होंने हमेशा सम्मान दिया। यह नेहरू ही थे कि उनके सामने उनके ही मंत्री महावीर त्यागी उनके चीन के बयान पर उनकी तीखी भर्त्सना की। क्या आज संभव है यह सब ? क्या नेहरू ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया?

अपने मित्र सुभाष की पत्नी और बेटी की आर्थिक मदद के लिए नेहरू ने बाकायदा एक ट्रस्ट बनाया और उन्हें भारत आने के लिए आमंत्रित किया, तो जानकारी मिलने पर शहीद आजाद की माँ को भी आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई, लेकिन कभी इसका विज्ञापन नहीं किया। चार घन्टे सोने वाले नेहरू ने कभी यह नहीं कहा कि वे इतने-इतने घण्टे काम करते है। उन्होंने किसी तरह का हाउडी टाइप का इवेंट नहीं किया।
बेशक वे इंसान ही थे, कोई नॉन बायोलॉजिकल नहीं, सो गलतियां भी हुईं होंगी। आप उन गलतियों को रेखांकित कर सकते हैं किसने मना किया है? लेकिन नहीं आप तो अपनी महानता का छद्म आभामंडल गढ़ने के लिए उनका चरित्र हनन करेंगे। उन्होंने जो कभी किया नहीं, जो कभी कहा नहीं आप यदि उसे उनके नाम से जोड़ेंगे, तो सच का आईना दिखाना ही पड़ेगा।

जब ब्लिट्ज के प्रधान संपादक करेन्जिया ने नेहरू से पूछा कि क्या मैं दुनिया के सबसे बड़े स्टेट्समैन नेहरू से बात कर रहा हूँ और क्या अब भारत में नेहरू युग शुरू हुआ माना जाय? नेहरू ने कहा कि रुक जाइये मि. करेन्जिया! न तो नेहरू युग जैसी कोई चीज है और न ही नेहरू विचार जैसी कोई चीज है। इसे आप अधिक से अधिक भारतीय विचार या गांधी विचार कह सकते हैं । दुनिया में एक ही सबसे बड़े स्टेट्समैन हैं और वे हैं -महात्मा गांधी और हम सब गांधी के बच्चे हैं।”

तो ये हैं नेहरू, जिनके विराट व्यक्तित्व से बौने आज भी भय खाते हैं। उन्होंने कहा था- ‘मैं नहीं चाहता कि भारत ऐसा देश बने जहां लाखों लोग एक व्यक्ति की ‘हाँ’ में हाँ मिलाएं, मैं एक मजबूत विपक्ष चाहता हूँ।’

ख़ैर कोई कुछ भी कहे पर जितने भी अच्छे काम हो रहे हैं, वे नेहरू के ही कामों का विस्तार हैं। नेहरू आधारशिला हैं।

(चित्र में नेहरू बटुकेश्वर दत्त के साथ खड़े हैं। यह चित्र मुझे बहुत सम्मोहित करता है।)

-संजीव शुक्ल

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