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मधु लिमये :’भारतीय राजनीति का नया मोड़’

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विनोद कोचर

1979 में जनता पार्टी के विघटन और केंद्र की सत्ता से बेदखली के बाद हुए लोकसभा के मध्यावधि चुनावों में इंदिरा गांधी की, प्रचंड बहुमत से केंद्र की सत्ता में पुनर्वापसी के बाद, 17, 18 और19 सितंबर 1981को बम्बई के के. सी. कॉलेज हॉल में, मधुलिमये ने तीन विषयो-वर्तमान राजनीति, आर्थिक नीति और विदेश नीति पर  व्याख्यान दिए थे तथा इसके करीब दो माह बाद, औरंगाबाद में हुए एक युवा सम्मेलन में आरक्षण व सामाजिक नीति पर एक व्याख्यान दिया था।

टेप किये हुए इन चारों व्याख्यानों को, बाद में श्री मस्तराम कपूर ने संपादित किया और प्रो. राजकुमार जैन ने इन संकलित व्याख्यानों को, ‘भारतीय राजनीति का नया मोड़’ शीर्षक से प्रकाशित किया था।

अपने ‘विदेश नीति’ विषयक व्याख्यान में मधुजी ने जनता पार्टी की हुक्मरानी के दौरान एक सर्व दलीय प्रतिनिधि मंडल के उस रूसी दौरे का जिक्र किया है जिसका नेतृत्व स्वयं उन्होंने ही, जनता पार्टी के महामंत्री की हैसियत से किया था।

इस रूसी दौरे के बारे में पढ़ते ही मेरी यादों की कोठरी में पड़ी उन दिनों की यादें ताजा हो गईं जब आरएसएस/जनसंघ परिवार के ‘पांचजन्य’, आर्गेनाइजर’, ‘चरैवेति’ जैसे नियत कालिक अखबारों में छपे लेखों में मधुजी को ‘रूस का दलाल’, ‘राजनीति का नटवरलाल’ जैसी अनेकों राजनीतिक गालियों से नवाजे जाने के साथ साथ मुझ पर भी अनर्गल आरोप लगाए जाते थे।

12अगस्त1979 के पांचजन्य ने एक लेख में मधुलिमये पर कीचड़ उछालते हुए लिखा कि, “अपनी रूस भक्ति पर पर्दा डालने के लिए मधु लिमये ने जनसंघ को अमेरिका का एजेंट बताने का दुस्साहस किया। एक प्रकार से मधु लिमये के रूप में, भारतीय राजनीति में एक नए नटवर लाल का उदय हुआ है जो केवल अपनी धूर्तता और बुद्धि चातुर्य के बल पर राजनीतिज्ञों को चकमा देकर देश को राजनीतिक अस्थिरता के गड्ढे में धकेलने में सफल होता जा रहा है।”

पांचजन्य ने मधु लिमये को ‘बौद्धिक वेश्याचारी’ तक बताकर, विरोध करने के शालीन और लोकतांत्रिक तरीके को भी कलंकित करने का दुस्साहस किया।

पांचजन्य ने अपने इसी लेख में मधुजी के साथ साथ, मुझ पर भी, यह लिखकर कीचड़ उछाला कि “19महीनों के सतत प्रयत्न के बाद 5000 संघ बंदियों में से केवल एक निष्क्रिय स्वयं सेवक विनोद कोचर को नरसिंहगढ़ जेल में 14 मास लंबे संपर्क के द्वारा, मधु लिमये संघ विरोधी दीक्षा प्रदान कर सके तथा जनता पार्टी की स्थापना के पश्चात अपने संघ विरोधी अभियान में इन विनोद कोचर का भी इन्होंने पूरा पूरा इस्तेमाल किया है।”

पांचजन्य के सुर में सुर मिलाते हुए, दीनदयाल विचार प्रकाशन के लिए, कैलाश सारंग द्वारा भोपाल से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘चरैवेति’ नेअपने 1 दिसंबर 1977 के अंक में मधु लिमये की उस शासकीय रूस यात्रा को भारत-रूस सांस्कृतिक सोसायटी (इस्कस) द्वारा आयोजित यात्रा बताकर, झूठ बोलने के संघी चरित्र को लेख के शुरू में ही चरितार्थ कर दिया, जो विदेश मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी, प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और जनता पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर द्वारा मधु लिमये से किये गए आग्रह पर मधु लिमये के नेतृत्व में गठित सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल द्वारा की गई थी।

इसी लेख में चरैवेति ने ये भी लिखा कि “मधु लिमये रूस के इशारे पर अपने अस्तित्व तथा देश की सुरक्षा को दांव पर लगाकर आरएसएस से खुली लड़ाई मोल लेने का खतरा उठा रहे हैं और अपने आप को मास्को का मोहरा सिद्ध करने में तनिक भी नहीं हिचकिचा रहे हैं।”

मेरे बारे में, अपने इसी लेख में चरैवेति ने लिखा कि, “आरएसएस के विरुद्ध एक पथभ्रष्ट स्वयंसेवक विनोद कोचर के नाम पर लगातार लेख लिखवा कर मधु लिमये द्वारा प्रकाशित कराया जा रहा है। उक्त विनोद कोचर वारासिवनी के एक अत्यंत विवादास्पद व्यक्ति हैं जिनका अपना चरित्र ही संघ से उनके टूटने का प्रमुख कारण है। कोचर को समाजवादियों द्वारा अपने सम्मेलनों में बुलाकर, आरएसएस के विरोध में भाषण दिलवाकर, आए दिन अपनी सफलता समझी जा रही है।”

उन दिनों के आरएसएस के अखबारों में मेरे और मधुजी के खिलाफ संघ की बौखलाहट का असली कारण तो ये था कि जनता पार्टी के जन्मदाता और प्रेरणा स्रोत लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा आरएसएस से की जाने वाली इस अपेक्षा से संबंधित एक नोट, मधुजी ने जनता पार्टी के महामंत्री की हैसियत से 1977 को जनता पार्टी के सत्तारुढ़ होने के कुछ ही महीनों बाद जनता पार्टी की कार्यसमिति के समक्ष पेश कर दिया था कि जेपी की सम्पूर्ण क्रांति के आंदोलन से सैद्धांतिक सहमति रखने वाले सभी स्वयंसेवी सांस्कृतिक संगठनों का एका हो जाना चाहिए ताकि सत्ता की राजनीति से दूर रहते हुए, सम्पूर्ण क्रांति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक सशक्त मंच कायम किया जा सके।

जेपी के सम्पूर्ण क्रांति के सपनों को साकार करने की इच्छा को ही मधुजी ने एक नोट के जरिये जनता पार्टी की कार्यसमिति के समक्ष पेश क्या कर दिया, सारा का सारा संघ/जनसंघ परिवार मधुजी के पीछे हाथ धोकर पड़ गया और बिना सोचे समझे ही मधुजी को रूस का दलाल, जनता पार्टी भंजक, नटवरलाल, वेश्याचारी जैसे गालीनुमा अपशब्दों के जरिए कोसने लगा। और मधुजी के बारे में लिखे गए लेखों में ही आरएसएस ने मुझ पर भी अनर्गल आरोप इसलिये लगाए क्योंकि इसी नोट पर आधारित मेरा एक लेख उन दिनों की मशहूर नियतकालिक राजनीतिक पत्रिका, ‘रविवार’ने न केवल आमुख कथा के रूप में छापा बल्कि पत्रिका के मुखपृष्ठ पर मधुजी की फुल साइज़ फोटो के साथ मेरे लेख का शीर्षक,’जनता बनाम आरएसएस’ भी बड़े बड़े अक्षरों में मधुजी की फोटो पर ही चस्पा कर दिया।

यही लेख समाजवादी चिंतक और नेता किशन पटनायक ने भी अपनी पत्रिका ‘सामयिक वार्ता’ में ‘अराष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ शीर्षक से प्रकाशित किया। पूरे देश भर में मेरा ये लेख बड़े चाव से पढ़ा और पसंद किया गया।

अपने इसी लेख में मैंने 1977 में संघ द्वारा नागपुर में आयोजित रक्षाबंधन उत्सव में आरएसएस के मंच से दिए गए, सरसंघचालक बाळासाहेब देवरस के छोटे भाई और सह सरसंघचालक श्री भाऊराव देवरस के उस भाषण का भी उल्लेख किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि, हरिजनों पर अत्याचार के मामले को, हिंदुस्तान का अखबारी जगत, पता नहीं क्यों तूल दे रहा है?हरिजनों पर होने वाले अत्याचारों से, आरएसएस को आम तौर पर कोई पीड़ा नहीं होती क्योंकि आरएसएस की यह धारणा है कि अज्ञान, अभाव और अन्याय से निपटने का काम हिन्दू धर्म ने ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य समाज के कंधों पर सौंप रखा है।’

शूद्रों को अज्ञान, अभाव और अन्याय की बीमारी से निपटने के काम से दूर रखना ही आरएसएस की राष्ट्रभक्ति है😢

मेरे लेखों से आरएसएस वैसे भी मुझसे काफी कुपित था क्योंकि जेल में मधुजी के सत्संग एवं गांधी-लोहिया साहित्य के अध्ययन व अन्य अनेक ठोस कारणों से उनका एक पूर्ण प्रशिक्षित व संघ कार्य के प्रति समर्पित युवा स्वयं सेवक, न केवल समाजवादी बन गया, बल्कि आरएसएस के खिलाफ लिखे गए मेरे तीखे लेखों से आरएसएस की बौखलाहट भी बढ़ने लगी थी।

मधुजी के खिलाफ छेड़े गए संघी निंदा अभियान के खिलाफ भी मेरे पत्र उन दिनों अखबारों में छपने लगे थे। रायपुर से प्रकाशित होने वाले एक प्रसिद्ध दैनिक अखबार ‘नवभारत’ ने 23 मार्च 79 को अपने अखबार में, मेरा एक पत्र प्रकाशित किया था जिसमें मैंने जनसंघ के युवा मंच, ‘मध्यप्रदेश जनता युवा मोर्चा ‘ की उस घोषणा का उल्लेख किया था कि ‘पूरे देश में, मधु लिमये विरोधी अभियान, उनकी सभाओं और दौरों में रुकावट पैदा करके, शुरू किया जाएगा।भोपाल, बिलासपुर, इटारसी आदि कई शहरों में इस घोषणा के मुताबिक, मधुजी की सभाओं में हुड़दंग भी मचाई गई।

अपने इसी प्रकाशित पत्र में मैंने उन दिनों के अखबारों में प्रमुखता से छपी खबरों के आधार पर ये भी बताया था कि, ‘नागपुर जिला न्यायाधीश की अदालत में आरएसएस के सर कार्यवाह प्रो. राजेंद्र सिंह द्वारा पेश किए गए हलफनामे की खबर का विस्फोट होते ही, ‘राजनीति में नहीं हैं’ का रात दिन राग अलापने वाले सरसंघचालक देवरस जी कहने लगे कि राजनीति में हैं भी और नहीं भी हैं। प्रकाशित पत्र के अंत में मैंने लिखा था कि, ‘लिमये विरोधी अभियान की शुरुआत से एक बात ये साफ हो गई है कि मधु लिमये व्यक्ति की बजाय विचार के रूप में आरएसएस द्वारा महसूस किये जाने लगे हैं। इतिहास गवाह है कि विचारों को दबाने या कुचलने के लिए जब जब भी व्यक्ति को निशाना बनाया जाता है, विचार दावानल की तरह फैलते हैं।’ अस्तु!

अपनी इस विस्तृत टिप्पणी की शुरुआत में ही मधुजी के 1981 के व्याख्यान के जिस अंश का मैंने सिर्फ जिक्र ही किया था, वह निम्नानुसार है:-

“….अब भारत की विदेश नीति का जहाँ तक सवाल है, जनता पार्टी सत्ता में आई तो प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने, विदेश मंत्री अटलजी ने और अध्यक्ष चंद्रशेखर जी ने मुझसे कहा कि ‘एक मित्र मंडल रूस जाएगा और उसका नेतृत्व आप करिए।’

‘मैं इंडो-सोवियत फ्रेंडशिप सोसायटी की कल्चरल सोसायटी का सदस्य नहीं था और न मैं कभी भी उनके नेतृत्व में रूस जाता था। लेकिन चूंकि हमारे विदेश मंत्री ने कहा, प्रधानमंत्री ने कहा, अध्यक्ष ने कहा कि रूस के साथ हमारे संबंध नहीं बिगड़ने चाहिए, अरबों के साथ अपने संबंध नहीं खराब होने चाहिये, इसलिए प्रतिनिधि मंडल का नेता बन कर मैं रूस गया था। उसमें सभी दलों के प्रतिनिधि भी थे। मैंने कोसिगिन से 90 मिनिट तक बात की और दूसरे नेताओं ने भी बात की।हिंदुस्तान की जो वैदेशिक नीति है, उसका मैंने इस ढंग से समर्थन किया कि हमारे प्रतिनिधि मंडल के सभी नेता और रूसी नेता भी प्रसन्न हो गए। भारत और रूस के संबंधों को सुदृढ़ बनाने का मैंने प्रयास किया।’

‘लेकिन आश्चर्य है कि संघ के आर्गेनाइजर, पांचजन्य आदि जो अखबार हैं, वे मेरी बदनामी कर रहे हैं।’

‘जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में तनिक सा भी हिस्सा नहीं लिया है, वे एक ऐसे व्यक्ति की बुराई कर रहे हैं जिसने 16-17 साल की उम्र में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई प्रारंभ की। दो बार अंग्रेजों की जेल मैंने काटी। गोआ मुक्ति संग्राम में 12 साल की सजा मुझे पुर्तगाली ट्रिब्यूनल ने फरमाई।’

‘अकेला मैं सत्याग्रही था इन सभी नेताओं में, जिसको न वकील दिया न जिसने अपील की। मैंने कहा कि मैं पुर्तगाली हुकूमत मानता ही नहीं।लेकिन ये बेशर्म लोग आज दिन रात मुझे बदनाम कर रहे हैं कि यह सोवियत यूनियन का दलाल बन गया।शर्म आनी चाहिए इनको। अंग्रेजों की दलाली करने का काम करते हैं, वही मेरे जैसे आदमी पर दलाली का आरोप लगाने की धृष्टता कर रहे हैं।”

“देश में और विशेष रूप से महाराष्ट्र में, पता नहीं क्यों, लेकिन कुछ लोग हैं जिनके गले के नीचे, मधु लिमये को गाली दिये बिना, सबेरे की चाय नहीं उतरती।”

देवेन्द्र सुरजन 

Ramswaroop Mantri

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