जिन्हें राष्ट्रपिता ने कहा था,‘राष्ट्रकवि’
वो सूरज थे शब्दों के… और हिंदी भाषा के आसमान के तारे भी। तारे ऐसे कि जिनके बिना राष्ट्रभाषा
हिंदी के शब्द तारों का कोई सफर पूरा ही नहीं हो सकता। लेखनी ऐसी…जिसने दासता के दौर में हर
हिंदुस्तानी के दिल में स्वतंत्रता का नया जोश भरा, तो खुद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिन्हें दिया
राष्ट्रकवि का सम्मान। हिंदी की ऐसी अनमोल धरोहर महान कवि मैथिलीशरण गुप्त की136वीं जयंती पर
नमन…
झांसी जिले का चिरगांव कस्बा आज करोड़ों हिंदी प्रेमियों के लिए किसी तीर्थ स्थान से कम नहीं है। यहां
की मिट्टी में पैदा हुए भारत मां के ऐसे सपूत, जिन्होंने अपनी लेखनी से स्वतंत्रता आंदोलन को जोश से
भर दिया। 03 अगस्त 1886 को यहीं जन्म हुआ था मैथिलीशरण गुप्त का। मैथिलीशरण गुप्त, सेठ
रामचरण कनकने और कौशल्या बाई की तीसरी संतान थे। उनके पिता राम भक्त और काव्य प्रेमी थे।
विद्यालय में खेलकूद में अधिक ध्यान देने के कारण मैथिलीशरण गुप्त की पढ़ाई अधूरी ही रह गयी।
ऐसे में बजाय स्कूल के उन्हें घर पर ही हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी और बांग्ला भाषा का ज्ञान निजी शिक्षक के
जरिए मिला। कहा जाता है कि मैथिलीशरण गुप्त ने एक बार कहा था, “मैं क्यों पढ़ाई करूंगा। मैं पढ़ने
के लिए पैदा नहीं हुआ हूं। लोग-बाग हमें पढ़ेंगे।” बचपन में कही उनकी ये बातें आगे जाकर सही साबित
हुई।
रसिकेंद्र से मैथिलीशरण गुप्त का सफर
बात उन दिनों की है जब साहित्य खासकर कविता में ब्रज भाषा का वर्चस्व था। उस समय खड़ी बोली के
पुरोधा पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी भाषा को लेकर देशभर में आंदोलन चला रहे थे। महावीर प्रसाद
द्विवेदी झांसी रेलवे में काम करते थे और वहीं से नागरीप्राचारणी सभा द्वारा प्रकाशित सरस्वती पत्रिका
के संपादन की जिम्मेदारी भी निभाते थे। सरस्वती इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से प्रकाशित होती थी, तब
सरस्वती में छपना किसी भी लेखक के लिए सम्मान की बात होती थी। एक दिन मैथिलीशरण हिम्मत
कर महावीर प्रसाद से मिलने गए, जहां दोनों में दिलचस्प संवाद हुआ। वे बोले – मेरा नाम मैथिलीशरण
गुप्त है, मैं कविता लिखता हूं और चाहता हूं कि आप मेरी कविताएं सरस्वती में प्रकाशित करें। इस पर
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कहा – बहुत से लोग चाहते हैं कि उनकी रचनाएं सरस्वती में प्रकाशित हों
लेकिन सबको मौका नहीं मिलता और फिर आप तो ब्रज भाषा में लिखते हैं। हम सिर्फ खड़ी बोली में
रचनाएं छापते हैं। इस पर मैथिलीशरण ने कहा- अगर छापने का आश्वासन मिले तो मैं खड़ी भाषा में
कविता लिख दूंगा, मैं अपनी रचनाएं रसिकेंद्र के नाम से भेजूंगा। जवाब मिला – अगर प्रकाशित होने के
लायक होगी तो अवश्य प्रकाशित करेंगे, साथ यह भी कहा गया कि रचनाएं किसी उपनाम से नहीं अपने
नाम से भेजिए। महावीर प्रसाद द्विवेदी के कहने पर पहली बार मैथिलीशरण गुप्त ने हेमंत शीर्षक से
खड़ी बोली में कविता लिखी जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कुछ संशोधनों के बाद सरस्वती में छापी।
हेमंत के प्रकाशन के बाद सरस्वती में गुप्त लगातार छपते रहे। देखते ही देखते वे अपनी हिंदी की सेवा
के कारण दद्दा के रूप में लोकप्रिय हो गए।
दद्दा की हिंदी सेवा
1905 से 1925 के बीच मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं सरस्वती में लगातार जगह पाती रहीं। अपनी
पहली कविता हेंमत से लेकर जयद्रथ, भारत-भारती, साकेत जैसी तमाम रचनाएं किताब के रूप में आने से
पहले सरस्वती में छप चुकी थी। महावीर प्रसाद और सरस्वती पत्रिका से अपने लगाव के बारे में गुप्त ने
साकेत की प्रस्तावना में लिखा- करते तुलसीदास भी कैसे मानस-नाद? महावीर का यदि उन्हें मिलता नहीं
प्रसाद। वैसे तो मैथिलीशरण गुप्त की सभी रचनाएं कालजयी है लेकिन 1910 में आई कविता ‘रंग में
भंग’ ने जोश से भर दिया। 1921 में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने संपादक पद से इस्तीफा दे दिया और इधर
मैथिलीशरण ने भी गोरी सरकार के खिलाफ खुलकर लिखना शुरु कर दिया।
आज की चित्तौड़ का सुन नाम कुछ जादू भरा
चमक जाती चंचला-सी चित में करके त्वरा
रंग में भंग के बाद आई जयद्रथ-वध। 1905 में बंगाल विभाजन का गुस्सा जयद्रथ वध के जरिए
निकला…
वाचक! प्रथम सर्वत्र ही ‘जय जानकी जीवन’ कहो।
फिर पूर्वजों के शील की शिक्षा तरंगों में बहो।।
दु:ख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्य पूर्वक सब सहो।
होगी सफलता क्यों नहीं कर्त्तव्य पथ पर दृढ़ रहो।।
अधिकार खो कर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है।
न्यायार्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है।।
जयद्रथ वध के बाद मैथिलीशरण गुप्त लोकप्रियता के शिखर पर थे लेकिन 1914 में भारत भारती ने
उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहली जमात में बैठा दिया। भारत भारती की लोकप्रियता का आलम ये था कि
सारी प्रतियां देखते ही देखते समाप्त हो गई और 2 महीने के भीतर दूसरा संस्करण प्रकाशित करना पड़ा।
राष्ट्रीय आंदोलनों, शिक्षा संस्थानों और प्रातः कालीन प्रार्थनाओं में भारत भारती ही गाई जाती थी। गांव-
गांव में अनपढ़ लोग भी सुन सुनकर इसे याद कर चुके थे। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के बाद
जब नागपुर में झंडा सत्याग्रह हुआ तो सभी सत्याग्रही जुलूस में भारत भारती के गीत गाते हुए सत्याग्रह
करते थे। गोरी सरकार ने भारत भारती पर पाबंदी लगा दी और सारी प्रतियां जब्त कर ली। भारत भारती
साहित्य जगत में आज भी सांस्कृतिक नवजागरण का ऐतिहासिक दस्तावेज है।
मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरतीं। भगवान्! भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती।।
हो भद्रभावोद्भाविनी वह भारती हे भवगते। सीतापते! सीतापते!! गीतामते! गीतामते!!
1914 में शकुंतला और इसके 2 साल बाद किसान नाम से कविता संग्रह प्रकाशित हुए। किसान में
भारतीय किसानों की दुर्दशा और उनकी परेशानियों का चित्रण अद्भुत है। 1933 में उन्होंने द्वापर और
सिद्धराज जैसे पौराणिक और ऐतिहासिक काव्य संग्रह लिखें। वे अब तक कहानी, उपन्यास, कविता, निबंध
पत्र, आत्मकथा अंश, महाकाव्य की लगभग 10 हजार पंक्तियां लिख चुके थे। इसी बीच जिंदगी के 50
साल पूरे हुए। देशभर के साहित्य प्रेमियों ने बनारस से लेकर चिरगांव तक मैथिलीशरण गुप्त की 50वीं
वर्षगांठ धूमधाम से मनाई। इस अवसर पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रीय
कवि की उपाधि से सम्मानित किया। इसके बाद से मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रकवि हो गए। 50वीं वर्षगांठ
का जश्न समाप्त भी नहीं हुआ था कि 1937 एक और कामयाबी लेकर आया। साकेत के लिए उन्हें हिंदी
साहित्य सम्मलेन ने मंगला प्रसाद पुरस्कार से सम्मानित किया। साथ ही 1954 में उन्हें पद्मभूषण दिया
गया।कोरोना काल में मिले अवसरों पर बात करते हुए राज्यसभा में अपने भाषण के दौरान प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी ने मैथिलीशरण गुप्त का जिक्र करते हुए कहा था- ”जब मैं अवसरों की चर्चा कर रहा हूं, तब
महाकवि मैथलीशरण गुप्त जी की कविता को मैं उद्घोषित करना चाहूंगा। गुप्त जी ने कहा था-
अवसर तेरे लिए खड़ा है, फिर भी तू चुपचाप पड़ा है।
तेरा कर्म क्षेत्र बड़ा है पल-पल है अनमोल,
अरे भारत उठ, आखें खोल।।
ये मैथिलीशरण गुप्त जी ने लिखा है। लेकिन मैं सोच रहा था इस कालखंड में, 21वीं सदी के आरंभ में
अगर उनको लिखना होता तो क्या लिखते- मैं कल्पना करता था कि वो लिखते-
अवसर तेरे लिए खड़ा है, तू आत्मविश्वास से भरा पड़ा है।
हर बाधा, हर बंदिश को तोड़,
अरे भारत, आत्मनिर्भरता के पथ पर दौड़।।”

