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कहानी:मास्टर दीनानाथ

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बाबूजी, अगर काम जल्दी करवाना है तो अंदर वाले बाबू को थोड़ा ‘चाय पानी’ देना पड़ेगा…
नहीं तो महीनों चक्कर लगाते रहिए।”

नगर निगम के पुराने दफ्तर के बाहर उस दिन एक अजीब सा दृश्य था।
गेट पर खड़े गार्ड ने एक बुज़ुर्ग आदमी को रोकते हुए कहा—
“बाबूजी, अगर काम जल्दी करवाना है तो अंदर वाले बाबू को थोड़ा ‘चाय पानी’ देना पड़ेगा… नहीं तो महीनों चक्कर लगाते रहिए।”

बूढ़े आदमी ने थकी हुई आँखों से उसकी ओर देखा।
“बेटा… मैंने पूरी जिंदगी बच्चों को ईमानदारी सिखाई है…
अब बुढ़ापे में रिश्वत देकर अपना काम कैसे करवा लूँ?”
गार्ड हल्का सा हँस पड़ा।
“बाबूजी… आदर्श और ईमानदारी किताबों में अच्छी लगती है… नगर निगम में नहीं।”
बूढ़े आदमी ने कुछ नहीं कहा।
वह धीरे-धीरे अंदर चला गया।
वह कोई साधारण आदमी नहीं था।
वह थे मास्टर दीनानाथ।
चालीस साल तक उन्होंने इसी शहर के बच्चों को पढ़ाया था।
उनकी डांट और उनके संस्कारों से सैकड़ों बच्चे बड़े होकर अधिकारी बने थे।
लेकिन आज…
उन्हें अपने ही शहर के दफ्तर में
एक आम आदमी की तरह लाइन में खड़ा होना पड़ रहा था।
घर से निकलते समय रुक्मिणी जी ने उन्हें रोका भी था।
“अजी आप क्यों जा रहे हैं? आपके कितने विद्यार्थी आज बड़े अफसर बन गए होंगे। किसी को फोन कर दीजिए।”
दीनानाथ जी मुस्कुराए थे।
“सुमित्रा… गुरु का काम पढ़ाना होता है, एहसान जताना नहीं।”

नगर निगम के अंदर लंबी लाइन लगी थी।
कोई फाइल लेकर खड़ा था।
कोई परेशान होकर कह रहा था—
“तीन महीने से चक्कर लगा रहा हूँ… बिना पैसे दिए फाइल आगे नहीं बढ़ती।”
दीनानाथ जी चुपचाप लाइन के आख़िरी छोर पर जाकर खड़े हो गए।
उनकी उम्र सत्तर साल थी।
घुटनों में दर्द था।
लेकिन उनके उसूल अभी भी जवान थे।
तभी अचानक एक कर्मचारी तेज़ी से बाहर आया।
वह भीड़ में किसी को ढूँढ रहा था।
अचानक उसकी नज़र दीनानाथ जी पर पड़ी।
वह तुरंत उनके पास आया बोला आप मास्टर दीनानाथ जी हैं
दीनानाथ जी ने सिर हिला कर हां बोला …
“सर… आप यहाँ लाइन में क्यों खड़े हैं?”
दीनानाथ जी चौंक गए।
“बेटा, मेरी बारी आएगी तब ही जाऊँगा।”
कर्मचारी बोला—
“नहीं सर… आपको लाइन में खड़े होने की ज़रूरत नहीं है। साहब ने आपको अंदर बुलाया है।”
पूरा हॉल यह देखकर हैरान रह गया।
अंदर बड़े केबिन का दरवाज़ा खुला।
एक रोबदार अधिकारी बाहर आए।
जैसे ही उनकी नज़र दीनानाथ जी पर पड़ी…
वे तेजी से उनकी ओर बढ़े।
और अचानक…
वह अधिकारी उनके सामने दोनों हाथ जोड़कर झुक गया।
पूरा दफ्तर स्तब्ध रह गया।
“मास्टर जी… आपने अपने इस नालायक छात्र को पहचाना?”
दीनानाथ जी ने चश्मा ठीक किया।
कुछ पल तक ध्यान से देखा।
फिर उनकी आँखों में पहचान की चमक आ गई।
“तुम… राघव हो?”
अधिकारी की आँखों से आँसू बहने लगे।
“हाँ सर… मैं वही राघव हूँ… वही शरारती लड़का… जो हमेशा स्कूल से भाग जाता था।”
दीनानाथ जी हल्का सा मुस्कुराए।
“और जिसे मैंने एक दिन छड़ी से बहुत पीटा था।”
राघव ने सिर झुका लिया।
“सर… अगर उस दिन आपकी छड़ी मेरी पीठ पर नहीं पड़ी होती… तो शायद आज हथकड़ी मेरे हाथों में होती।”
पूरा कमरा शांत था।
राघव आगे बोला—
“सर… आपको शायद याद भी नहीं होगा…
मेरे पिता के गुजर जाने के बाद जब मेरे पास बोर्ड परीक्षा की फीस भरने के पैसे नहीं थे…”
“तब आपने बिना किसी को बताए अपनी जेब से मेरी फीस भरी थी।”राघव कुछ क्षण तक चुप खड़ा रहा।
पूरा दफ्तर शांत था।
किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कुछ बोलने की।
फिर उसने धीरे-धीरे कहा—
“आप सब लोग मुझे आज एक अधिकारी के रूप में देखते हैं…
लेकिन सच यह है कि मेरी जिंदगी की असली कुर्सी यहाँ नहीं है…”
उसने दीनानाथ जी के चरणों की ओर इशारा किया।
“मेरी असली कुर्सी यहाँ है…
इन चरणों के पास।”
पूरा हॉल स्तब्ध था।
राघव की आवाज़ भर्रा गई।
“जिस दिन मेरे पिता की मृत्यु हुई थी…
उस दिन मेरे घर में इतने भी पैसे नहीं थे कि मैं अपनी बोर्ड परीक्षा की फीस भर सकूँ।”
“मैंने किताबें बंद कर दी थीं…
और तय कर लिया था कि अब पढ़ाई छोड़ दूँगा।”
राघव की आँखों से आँसू गिरने लगे।
“लेकिन उसी शाम…”
वह दीनानाथ जी की ओर देखने लगा।
“…गुरु जी मेरे घर आये थे।”
“उन्होंने चुपचाप मेरी माँ के हाथ में पैसे रखे और मुझसे कहा—
‘राघव… बेटा… गरीबी तुम्हारी मजबूरी हो सकती है…
लेकिन हार मान लेना तुम्हारा फैसला होगा।’”
तुम कभी हार मत मानना एक दिन तुम जरूर बड़े आदमी बनोगे।
पूरा दफ्तर अब भावनाओं से भर गया था।
राघव की आवाज़ कांपने लगी।
“सर… उस दिन आपने सिर्फ मेरी फीस नहीं भरी थी…”
“आपने मेरे टूटे हुए सपनों को फिर से जोड़ दिया था।”
फिर वह धीरे-धीरे घुटनों के बल बैठ गया।
उसने दीनानाथ जी के पैर पकड़ लिए।
“सर… आज मैं इस कुर्सी पर बैठा हूँ…
लेकिन सच कहूँ तो…”
“यह कुर्सी मेरी नहीं है…
यह आपकी छड़ी का कर्ज है।”
यह सुनकर कई कर्मचारियों की आँखों से आँसू बहने लगे।
पूरा दफ्तर खामोश था।
फिर राघव खड़ा हुआ और पूरे हॉल की ओर मुड़ा।
उसकी आवाज़ अब मजबूत थी।
“आज से इस दफ्तर में एक नया नियम होगा।”
सब लोग ध्यान से सुनने लगे।
“जिस शहर के शिक्षक अपने बुढ़ापे में लाइन में खड़े हों…”
“उस शहर को खुद पर शर्म आनी चाहिए।”
फिर उसने कहा—
“आज से इस नगर निगम में कोई भी शिक्षक या बुज़ुर्ग लाइन में नहीं खड़ा होगा।”
“और अगर कोई कर्मचारी किसी से रिश्वत लेते पकड़ा गया…”
“तो समझ लीजिए उसकी नौकरी उसी दिन खत्म।”
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
लेकिन कई लोगों की आँखों में आँसू थे।
जब दीनानाथ जी बाहर निकलने लगे तो पूरा दफ्तर अचानक खड़ा हो गया।
किसी ने कुछ नहीं कहा…
लेकिन हर कर्मचारी ने सिर झुका लिया।
यह एक शिक्षक के सम्मान में मौन प्रणाम था।

जब दीनानाथ जी घर पहुँचे तो रुक्मिणी जी ने पूछा—
“इतनी जल्दी काम कैसे हो गया?”
दीनानाथ जी कुछ पल चुप रहे।
फिर धीरे से बोले—
“काम तो हो गया सुमित्रा…”
“लेकिन आज मुझे बहुत बड़ी दौलत मिल गई।”
रूकमिणी जी ने पूछा—
“कौन सी दौलत?”
दीनानाथ जी की आँखें भर आईं।
उन्होंने आसमान की ओर देखा और कहा—
“आज मुझे मेरी चालीस साल की तपस्या का ब्याज मिल गया।”

दोस्तों

“मास्टर जी को लगा था कि उनके पढ़ाए हुए बच्चे उन्हें भूल गए होंगे…
लेकिन आज उन्हें पता चला कि उनके संस्कार किसी के दिल में मंदिर बनाकर बैठे हैं।”
“जिस गुरु ने अपने घर का चूल्हा बुझाकर छात्र की फीस भरी थी…
आज वही छात्र पूरे दफ्तर में उनका सम्मान जगा रहा था।”
👏🙏

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