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बिहार में मीडिया की आज़ादी पहले से “डिलीट” हो चुकी है : रिपोर्ट

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बिहार में पिछले पाँच सालों में छह पत्रकारों की हत्या हुई है और 11 हमलों की घटनाएं हुई हैं। इसके अलावा भी, पत्रकारों की गिरफ्तारियों, प्रमुख दैनिकों के संपादकों को धमकियों, मानहानि के मामलों और सोशल मीडिया में सेन्सरशिप के कारण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माहौल संकुचित ही हुआ है। 

यह जानकारी फ्री स्पीच कलेक्टिव की एक रिपोर्ट में दी गई है जो चुनावी राज्यों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर  जारी की जाने वाली रेपोर्टों की शृंखला में बिहार विधानसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर जारी की गई है। 

नवंबर 2020 से 2025 तक के वर्षों में मीडिया के हाल पर जारी इस रिपोर्ट के अनुसार मारे गए छह पत्रकारों में दो पत्रकार प्रमुख हिन्दी दैनिकों प्रभात खबर और जागरण से थे जबकि चार अन्य स्वतंत्र या स्थानीय मीडिया के लिए काम करने वाले पत्रकार थे। इन पत्रकारों ने स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार, अपराध, शराब माफिया और चिकित्सा में लापरवाही जैसे मुद्दों पर रिपोर्टिंग की थी।   

2021 में मनीष कुमार सिंह का क्षत विक्षत शव पूर्वी चंपारण जिले में मिला था, उनकी आँखें निकाली गई थी। मनीष एक निजी समाचार चैनल के लिए काम करते थे और हिन्दी दैनिक अरेराज दर्शन के संपादक संजय कुमार सिंह के पुत्र थे। 

नवंबर 2021 में फर्जी दवाखानों से सम्बद्ध एक फेसबूक पोस्ट डालने के दो दिन बाद बुद्धिनाथझा का अधजला शव मधुबनी जिले में सड़क के किनारे मिला था। 

नृशंस हत्याओं के अलावा जो हमले पत्रकारों पर किए गए वह भी क्रूरतापूर्ण थे और गोली चलाने से लेकर बुरी तरह पीटना इनमें शामिल था। 

कानूनी शिकंजा 

एफएससी की रिपोर्ट में कारवां की एक रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि कोविड-19 महामारी के दौरान और उसके बाद कम से कम दस पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया। आरोपों में आपराधिक षड्यन्त्र से लेकर हफ्ता वसूली के आरोप शामिल थे।

जनवरी 21 में साइबर अपराध के मामले देखने वाली आर्थिक अपराध शाखा के अतिरिक्त महानिदेशक नय्यर हुसैन खान ने एक पत्रक जारी कर कहा कि मुख्यमंत्री, मंत्रियों, जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों के बारे में कोई भी “आपत्तिजनक” पोस्ट साइबर अपराध मानी जाएगी। 

सेना में संविदा पर भर्ती की अग्निपथ योजना के विरोध के खिलाफ पुलिस कार्रवाई में 2022 में तीन पत्रकारों को हिरासत में लिया गया और एक को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने पत्रकारों को पीटा लेकिन उन्हीं पर सरकारी अधिकारियों के कार्य में बाधा का मामला दर्ज किया। 

दिसंबर 2023 में प्रभात खबर के प्रधान संपादक आशुतोष चतुर्वेदी को फोन पर धमकी दी गई। धमकी वाला फोन बिरसा मुंडा केन्द्रीय जेल से आया था और फोन करने वाले ने खुद को योगेंद्र तिवारी बताया था। एक और संपादक विजय पाठक को भी धमकी भरे फोन आए। 

एफएससी की रिपोर्ट के अनुसार नीतीश कुमार के शासन में प्रेस की आजादी का बुरा हाल रहा है। इससे पूर्व 2016 में पत्रकार राजदेव रंजन की सीवान में कथित रूप से गिरोहबाज और पूर्व राजद सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के इशारे पर हुई हत्या ने मीडिया में हलचल मचा दी थी जिसके बाद नीतीश कुमार ने आशा रंजन (राजदेव की पत्नी) की मांग तुरंत मानते हुए केन्द्रीय जांच ब्युरो से जांच कराने की घोषणा की थी।

शहाबुद्दीन के करीबी माने जाने वाले लद्दन मियां समेत पाँच लोगों को गिरफ्तार किया गया था। शहाबुद्दीन जो उस समय दो भाइयों की हत्या के मामले में दोषी पाए जाने के कारण जेल में था, की 2021 में कोविड से मौत हो गई। इस मामले में अभी दो महीने पहले ही सीबीआई की विशेष अदालत ने लद्दन मियां और दो अन्य आरोपियों को “सबूतों के अभाव” में बरी कर दिया जबकि तीन अन्य को दोषी ठहराया। 

बिहार में प्रिन्ट हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सरकार की 2008 की मीडिया विज्ञापन नीति के रहमोकरम पर हैं। 2012 में नीतीश सरकार की मीडिया नीति की आलोचना के बीच तत्कालीन भारतीय प्रेस परिषद के प्रमुख मार्कन्डेय काटजू ने  कहा था कि बिहार में प्रेस की आजादी नहीं है और मीडिया पर सरकारी दबाव की जांच के लिए  तीन सदस्यीय समिति बनाई थी।

समिति की रिपोर्ट टेबल पर रखी गई और 2013 में अपनाई गई। इसमें कहा गया कि अखबार सरकारी दबाव में भ्रष्टाचार के मुद्दों को समुचित तरजीह नहीं देते। विज्ञापन वितरण की देखरेख के लिए स्वतंत्र इकाई बनाने की मांग हालांकि ठुकरा दी गई। 

2015 के बाद कई स्वतंत्र पत्रकार सोशल मीडिया मंचों का इस्तेमाल करने लगे। 2020 आते-आते सोशल मीडिया भी जदयू-भाजपा सरकार के निशाने पर आ गया। 

सामाजिक आर्थिक सूचकांकों पर बिहार संघर्ष कर रहा है। बेरोजगारी, पलायन के अलावा, स्वास्थ्य, शिक्षा सुविधाओं का अभाव भी झेल रहा है। 2019-20 नीति आयोग स्वास्थ्य सूचकांक पर बिहार 19 बड़े राज्यों में से 18 वें नंबर पर था।

मार्च 2025 में नीति आयोग के मैक्रो एवं फिस्कल परिदृशय के अनुसार लिंग अनुपात राष्ट्रीय औसत से कम था। कम साक्षरता स्तर, कम प्रति व्यक्ति आय, उच्च बेरोजगारी हर साल लाखों युवकों को पलायन पर मजबूर करती है।

उद्योग न के बराबर होने के कारण, कृषि मुख्य काम है और सरकारी नौकरी हजारों युवकों की मृग तृष्णा। नीति आयोग के एसडीजी इंडिया सूचकांक 2023-24 के अनुसार बिहार का सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय पैमानों पर सबसे बुरा प्रदर्शन था। 

अंत में विधानसभा चुनाव से जरा पहले एसआईआर के कारण बड़े पैमाने पर मतदाता सूचियों से नाम काटे जाने का असर चुनावों पर पड़ेगा ही। लेकिन स्वतंत्र मीडिया जो सवाल कर सकता है और सरकार की जवाबदेही तय कर सकता है, का क्षरण लोकतंत्र की बुनियाद को और कमजोर ही करेगा।    

Ramswaroop Mantri

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