शशिकांत गुप्ते
सीतारामजी आज बहुत ही विचित्र विषय पर चर्चा करने आएं हैं।
सीतारामजी,आज मिलते ही कहने लगे आप ने कभी भूत देखा है। आज हमें भूत पर चर्चा करना है।
मैने कहा, मैंने तो अंध विश्वास के विरुद्ध अपना अभियान चला रखा है,मैं मानता ही नहीं हूं भूत, हूत को।
क्या आप को कोई भूत लग गया?
सीतारामजी ने कहा,मुझे ही नहीं
इनदिनों हमारी व्यवस्था को ही भूत लगा है।
मैं कुछ समझ नहीं,मैने कहा।
सीतारामजी ने कहा पिछले लगभग एक सौ आठ महीनों में हर तरह की समस्याओं के लिए भूत को ही कोसते हैं। भूत में ही विचरण करने लगते हैं।
मैने पूछा यह किस किस्म का भूत है।
सीतारामजी ने कहा,इस भूत के लक्षण है,अपनी जिम्मेदारी (Responsibility) से मुंह मोड़ना और जवाबदेही
(Accountability) से बचने के लिए सवालों से बचना।
मैने कहा यह लापरवाही का भूत है।
सीतारामजी ने कहा यही तो “भूत” काल का भूत है।
मैने कहा वर्तमान में धार्मिक लोगों के हाथों व्यवस्था है।
सीतारामजी ने मेरे उक्त वक्तव्य पर शायर मशहर अफरीदी
यह शेर सुना दिया।
कोई ग़म से परेशां है,कोई जन्नत का तालिब है
गरज सजदे करवाती है,इबादत कौन करता है
मैने कहा नैतिकता का तकाज़ा है,बशर्ते व्यक्ति में नैतिकता विद्यमान हो?
इस मुद्दे के संदर्भ में मुझे प्रख्यात कवि गिरधर की की निम्न रचना का स्मरण हुआ।
बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ।
इस रचना की यह पंक्ति महत्वपूर्ण है।
दुर्जन हंसे न कोइ, चित्त मैं खता न पावै॥
सीतारामजी कहा कलयुग में दुर्जन और सज्जन को पहचानना मुश्किल ही नहीं,ना मुमकिन है।
मैने कहा आप गलत कह रहें हैं
………. है तो मुमकिन है इस स्लोगन को भूल गए।
सीतारामजी ने मुझे शायर श्री नरेन्द्र शर्माजी का यह शेर सुना दिया।
तेरा फ़रदा भी इक बहुरूपीय है
मेरा माज़ी ये मुझसे कह रहा है
( फ़रदा= भविष्य काल, माज़ी=भूत काल)
भावार्थ भूत में भी बहुरूपिया और भविष्य में भी बहुरूपिया ही।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





