अलग ही जलवा है अपुन का। शान से रहना पसंद है अपुन को । आज से नहीं, बचपन से ही अपुन ऐसा ही है। बाप पेट काट कर पढ़ाई के लिए पैसे भेजता और अपुन यार दोस्तों के साथ मौज मजे में उन्हें खर्च करता। जब महिने के आखिरी दिनों में पैसे नहीं होते तो मांग-तुंग कर अपुन काम चला लेता। अपनी शान में कमी नहीं आने देता। ऐसे पढ़ाई तो पूरी होने से रहीं। हुई भी नहीं। पर इससे अपुन को क्या फर्क पड़ता! जो पढ़ लिख गए वे भी क्या उखाड़ रहे हैं। हमारे जैसे अनपढ़ों के पास 10 से 6 की नौकरी ही तो बजाते हैं!
अपुन ने तो चार्वाक के सूत्र को जीवन में आत्मसात कर लिया है- ‘यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥’ आप चाहे पढ़े लिखे हो पर मतलब तो आपको मालूम होगा नहीं! इसलिए अपुन को ही बताना पड़ेगा। इसका अर्थ होता है कि जब तक जीना है सुख से जीना चाहिये। अगर आपके पास साधन (यानि पैसा) नहीं है तो दूसरे से उधार लेकर मौज करना चाहिये। श्मशान में शरीर के जलने के बाद शरीर को किसने वापस आते देखा है!
एक बार अपुन यार-दोस्तों को रेस्टोरेंट में छोड़कर प्राइवेसी बनाने के लिए बाहर लोन से ली गई चमचमाती नई गाड़ी के पास शानदार कपड़े पहने, नए फीचर वाले फोन जो उधार के पैसों से खरीदा था, पर बात कर रहा था। बातों में ध्यान था इसलिए उन्हें आते हुए नहीं देखा। अचानक न जाने कहां से वे प्रकट हो गए। कालर पकड़ा। फोन खींचा और चिल्लाने लगें – ‘साले 2 साल हो गए। लाखों का उधार हो गया तुझ पर। चुकता ही नहीं। देखकर भाग जाता है। फोन उठाता नहीं। महंगी गाड़ी, महंगा फोन, महंगे कपड़े चाहिए तो पहले लोगों का उधार भी चुकाना चाहिए। हम साले, घिसे पीटे कपड़े पहनकर काम चलाते हैं। दो पैसे वक्त बेवक्त के लिए बचा कर रखते हैं कि लोगों के सामने हाथ नहीं फैलाना पडे। और तेरे जैसें अपने दुख का रोना रोकर उसे भी ले जाते हैं। इंसानियत के नाते हम मदद तो कर देते हैं पर वापस देने के नाम पर तुम जैसें…..’
वे चिल्लाते रहें। बात हाथापाई पर आए इससे पहले अपुन ने मक्खन लगाना चालू कर दिया। वे तो हाथ ही नहीं धरने दे रहे थे। पर मक्खन लगाने में तो अपुन की मास्टरी है। जैसे-तैसे थोड़ा समय लेकर अपुन होटल में घुसा। बैठे दोस्तों के सामने कहानी बना दुखड़ा रोया। दुखड़ा सुनकर वे पसीजे। जल्दी से कुछ मदद ली और कुछेक हजार ले जाकर उन्हें थमा दियें। अपुन उनसे बोला- ‘बाकी थोड़े दिनों में दूध में धो कर देता हूं।’
वे बड़बड़ाते हुए चले गए। ऐमदिया की टोपी, मेमदिया के सर पर घुमाना थी जो अपुन ने घुमा दी। अब थोड़े समय की शांति। वैसे भी ऐसे लोग पैसे पर कुंडली मार कर बैठें रहते है। ना खुद खाते हैं ना खाने देते हैं। रोटेशन घुमाने के लिए इनका पैसा बाजार में तो लाना ही पड़ता है। ये लोग तो लाते नहीं तो अपुन को ही यह काम करना पड़ता है। चेहरे पर मुस्कान ओढ़ कर अपुन फिर से दोस्तों के साथ रेस्टोरेंट में बैठ गया। इज्जत-विज्जत से अपुन को फर्क नहीं पड़ता। इज्जत को क्या चाटना है! मरने के बाद जिनको स्वर्ग मिलने का भ्रम हो वह इसकी चिंता करें। अपना तो स्वर्ग अपुन यहीं बना लेते हैं। अपना तो जिंदगी को लेकर नजरिया स्पष्ट है- जब तक जीना है सुख से जीना है। उधार लेकर घी भी पीना है तो पीना है! आपका नजरिया आप जानो।

