नारायण, नारायण ।
इस आवाज को सुनने का बैकुंठ धाम में विष्णुजी, कैलाश पर्वत पर शिवजी, स्वर्ग में इंद्र राज और अन्य देवता इंतजार करते हैं। आवाज के स्वामी नारदजी का स्वागत,आवा भगत भी करते हैं। वही आदत कुछ-कुछ अपुन की भी है। यह अलग बात है कि अपुन के आसपास देवता जैसे लोग नहीं बसते इस कारण अपुन को सम्मान का टोटा रहता है। लोग अपुन की पीढ पीछे बुराई भले ही करते हो पर इंतजार भी करते हैं।
कुछ लोग इस आदत को इधर की उधर करना कहते हैं। कुछ चुगलखोरी तो कुछ चापलूसी या निंदा सुख कहते हैं हुए कबीर के ‘निंदक नियरे’ का उल्लेख कर देते हैं। जबकि उसका इससे दूर-दूर तक का संबंध नहीं है ।
मूढ़ होते हैं वे लोग जो चापलूसी और चुगलखोरी में अंतर नहीं जानते। चापलूसी वह करता है जिसमें रीढ़ की हड्डी हो ही नहीं या हो तो लचकदार इतनी की फोल्ड करके बैग में रखा जा सकें। चापलूस लोगों को सामने वाले की खुशी, प्रसन्नता का ज्यादा ख्याल रखना पड़ता है। अपने मान सम्मान का नहीं। वे बिछ जाते हैं। उनका सोच की सुई अटकी होती है। दिमाग जो भरा है गया उसे ही उन्हें निकालना होता है। आजकल देश में इनकी दो शाखाएं चर्चा में है- चमचागिरी और अंधभक्ति ।
चमचा वह होता है जो दूसरे के लिए बिना उसके कहें ही काम करता है। कभी-कभी तो जो उसे पकड़े होता है उस पर भी दाग लगा देता है। आजकल चमचों की मांग और प्रभाव दोनों ही कम है। अंधभक्त का प्रोग्राम कहीं ओर (जैसे संतरों के शहर नागपुर) से बनता है। इनका सर्वर कुछ दुसरे लोग संभालते हैं। प्रोग्राम समय-समय पर अपडेट होता रहता है। अंधभक्त इसी प्रोग्रामिंग के अनुसार चलता है और लाठियां भांजता है। संरक्षण के चलते ये प्रभावी मानते हैं खुद को। इन दिनों इनकी प्रजाति जलकुंभी की तरह फैल रही है। चमचों और अंधभक्तों के क्रियाकलापों को देखकर लगता है कि दोनों के पास दिमाग ही नहीं होता और यदि होता है तो गिरवी होने के कारण उपयोग पर प्रतिबंध होता है।
चुगलखोर इनसे ऊपर वाली कैटेगरी का प्राणी होता है। उसे स्थिति को समझना और उस पर नियंत्रण रखना पड़ता है। अपनी कमजोरियों को ढंकना पड़ता है। किसके सामने, कब, कौन सी बात बात रखनी है और कैसे रखती है यह सब सोच समझकर दिमाग लगाकर करना पड़ता है। जानकारियां रखना पड़ती है। उनके लिए मेल मुलाकात बढ़ाना पड़ती है। बातों बातों में वह सामने वाले की फिल्म भी उतार देता है। पर अपना काम निकलवाने में माहिर होता है। अपुन भी शाणा, स्वार्थी है इसलिए खुद को इस कैटेगरी में मान लेता है। क्या मालूम कभी अपुन की भी मजार/मकबरा बना दिया जाए। जैसा सम्मान चुगलखोर का इटावा के राजा सुमेर सिंह ने जूतों से मारने के बाद दन्तावली गांव में मजार बना कर किया। आज भी खंडहर बन चुकी इस चुगलखोर की मजार पर लोग पांच जूतें मार कर जाते हैं। चापलूसों को यह सम्मान कहां नसीब हो सकता! खैर..
अपुन जा रहा था कि रास्ते में पंचायत के अधिकारी मिल गए। अध्यक्षा से खटपट के चलते चर्चा में थे ऐसी अपुन को जानकारी थी। उन्हें देखकर अपुन ने कहा- ‘नमस्कार, साहेब का सितारा बुलंद रहें।’
‘सितारा तो गर्दिश में चल रहा है इन दिनों यार। नौकरी पर बन आई है। पर सांच को आंच नहीं। सच परेशान हो सकता है, पराजित नहीं।’- उन्होंने नारें चिपका दिए ।
‘मेहनती और ईमानदार आदमी को परेशानी तो झेलना ही पड़ती है। रामजी को देख लो वनवास का कष्ट झेला या नहीं!’- अपुन ने भी बात निकलवाने के लिए मख्खन चिपकाया।
वे फिसल पड़ें। बोले- ‘सब जानते हैं अध्यक्षा तो कठपुतली है। पति बागडोर संभाले है। भ्रष्टाचार की बाढ़ ला रहा। हाईवे वाले धाकड़ साहब जैसों की हरकतों को बढ़ावा दे रहा। मेरे जैसें सिद्धांत वाले आदमी से यह सब देखा नहीं जाता। उनका साथ नहीं दिया तो बाहर का रास्ता दिखला दिया। मैं भी छोडूंगा नहीं। वह जो(…. ) घपले वाली जमीन है, जिसमें उसके बेटे की भागीदारी है वो काली फाइल अपने पास है। समय पर सामने लाऊंगा। अध्यक्षा जेल के अंदर और मैं वापस नौकरी पर।’- उन्होंने कहा।
अपुन का काम हो गया।जानकारी निकल चुकी थी।
हाल ही में अपुन ने मंगल जी की एक कविता पढ़ी थी। उसकी कुछ पंक्तियां इस तरह थी-
‘.. जमी पै लौटने वाले को,
पानी में मूतने वाले को
नीति-मरजाद की चाहिेए नहीं ओट
आधी कच्ची, आधी सच्ची
नारद का नारायण, नारायण
आगे की गीता है।…’
तो आधी अधूरी इस जानकारी को अध्यक्षा के पति तक बढ़ना ही था। अपुन का नक्शा भी पंचायत में अटका पड़ा था उसे पास भी करना था। नारायण नारायण करते अपुन अध्यक्षा के पति के धाम की ओर बढ़ गया।
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