डॉ. विकास मानव
हवा में हड्डी नहीं होती. इसीलिए वो बह रही है. पानी की पीठ में भी रीढ़ की हड्डी नहीं होती इसलिए वो भी बहता रहता है. अग्नि की देह में भी हड्डी रहित ज्वाला है. इसीलिए अग्नि की ज्वाला बिना किसी रुकावट के आकाश की ओर दौड़ पड़ती है. पृथ्वी भी बिना हड्डी के बनी है. इसीलिए आकार गोल है.
यूनिवर्स में सभी नक्षत्र अपने आकार में इसीलिए गोल-गोल होकर अपने अक्ष पर घूर्णित हैं ,क्योंकि उनका निर्माण हड्डियों के ढांचों पर नहीं किया गया है. यूनिवर्स का भी कोई अपना कोई अस्थि-कलश नहीं है. तो फिर मनुष्य का निर्माण अस्थिकलश पर क्यों किया गया है?
हम मनुष्यों की देह का निर्माण उपरोक्त पांच तत्वों से तो बना है लेकिन हम मनुष्य का पूरा शरीर हड्डियों से भरा पड़ा है। हड्डियों के कंकाल पर ही मनुष्य की मांसल देह क्यों बुनी हुई है? पृथ्वी हमारे सौरमंडल का एक सदस्य ग्रह है, इसलिए मुखिया सूर्य से मैंने पूछा.
सूर्य का उत्तर था :
तुम्हारा अवलोकन गलत है।तुम क्यों केवल अपनी हड्डियों से झांककर मुझे देख रहे हो।जबकि मैं तुम्हारे भीतर युगों से आत्मस्वरूप बैठा हूँ।आत्मा ही तो तुम्हारा केंद्रीय पुरुष है।उसमें कहाँ हड्डी है.
तुम अपने भीतर की आत्मा में प्रवेश करके जगत को देखो. तब तुम्हें यह हड्डी कहीं भी दिखाई नहीं देगी. पर तुम तो अपने शरीर की हड्डियों की दूरबीन से अस्तित्व में ताक-झांक क्यों करते फिरते हो? तुम अपनी हड्डियों में घुसकर जगत में ताक-झांक करना बंद क्यों नहीं कर देते. यह बंद करो, फिर तुम भी आत्मवत होकर बोलने लगोगे। इसीलिए तो मैंने तुम्हारी जीभ की रचना बिना हड्डी के की और लिंग की रचना भी.”
यह सुनकर मैं जैसे किसी गहरी नींद से जागा। सुबह हो गयी थी।पर सुबह की देह में अब कहीं एक भी हड्डी दिखाई नहीं दे रही थी।
आकाश में सूर्य चमक रहा था।उसमें भी किसी प्रकार की हड्डी का नामों- निशान नहीं था।फूलों में,खेतों की लहराती फसलों में,फल और सब्जियां तक में कहीं भी हड्डी दिखाई नहीं दी थी।
पर तभी मुझे अपने शरीर के भीतर से रीढ़ की हड्डी ने टोकते हुए कहा-
“सूरज झूठ बोल रहा है।सूर्य की वजह से ही तुम्हारे शरीर का जन्म हुआ है. तुम उनसे पुनःबात करो. उस तपते सूर्य ने तुम मनुष्यों के शरीर में इतनी हड्डियां क्यों रख दी है, जबकि वो खुद अपने शरीर में अपना कोई अस्थिकलश नहीं रखता है. क्यों उसने तुम मनुष्यों के शरीर को हड्डियों के ढांचे पर खड़ा किया है?
यह सुनकर जैसे ही मैंने अपने सिर को अपनी खोपड़ी के ढांचे के सहारे से उठाकर सूर्य देव की ओर देखा, सूर्य देव तत्काल बोल पड़े-
अपने शरीर के पांचों तत्वों में प्रवेश करके मुझ ईश्वर को जान. ध्यान दे और मुझे सुन वत्स. तुझको मैंने अपने ही सूक्ष्म रूप से बनाया है. तेरा अभी क्रमिक-विकास हो रहा है.तुम अभी मनुष्य हो..इसलिए तुम्हारे मानसिक विचारों में और देह में मुझे हड्डी का निर्माण करना पड़ा है
लेकिन किन जिन पांच तत्वों से तम्हारा शरीर बना है, उनमें मैंने यह ‘अस्थिकलश’ नहीं रखा है.क्योंकि तुम्हारे शरीर में प्रवासित रह रहे पांचों तत्व मेरे सौर-मंडल में अपना पूर्ण-विकास कर चुके हैं.
मतलब…? मैँ समझा नहीं? पूर्ण तत्वों से बने मेरे मनुष्य आकार में आपने मेरे क्रमिक-विकास को अवरुद्ध करने के लिए यह जड़-अस्थिकलश क्यों रख दिया है?
सूर्य मुस्कुराते हुए बोले-
इसलिए कि तुम मानवों में से ही अतिमानव का जन्म होना अभी बाकी है. तुम्हारा क्रमिक विकास अभी चल रहा है.
यह तुम्हारा अतिमानवीय कोशिकीय विकास इसी तरह कीलित और क्रमित होता है. आकार के साकार होने का coding process यही है और अभी भी चालू है.
मैंने पूछा, हम मनुष्यों की देह में रोग,शोक,जन्म और मृत्यु के चमगादड़ लगातार उड़ते रहते हैं. हम मनुष्यों की देह बहुत पीड़ादायक एक दाहसंस्कार के भयानक विस्फोट से हर जन्म से होकर गुजरती है. यह हम मनुष्यों पर आपका अत्याचार नहीं है क्या?
सूर्य बोले:
सुनो वत्स! मुझे ध्यान से सुनो. अभी तुम मानसिक विचारों का धनुष पकड़े मुझसे युद्ध कर रहे हो. अभी तुम एक मानसिक कच्चा घड़ा हो.
तुममें मैंने अपनी एक अतिमानसिक कोशिका भी रखी हुई है. यह धीरे-धीरे सक्रिय हो रही है. जब यह पूर्णतः विकसित हो जाएगी तो तुम देख सकोगे कि आध्यात्मिक और अतिमानसिक विचारों में हड्डी नहीं होती.
इसी कारण वास्तविक आध्यात्मिक और अतिमानसिक विचार हिंसक और लालची नहीं होते. बल्कि ये सृजक होते हैं. तुम आगे बढ़ो.खुद का अतिक्रमण करके.
मानव की दंतपंक्ति की लाइन से बाहर निकलो. दन्तकथाओं की व्यथाओं से मुक्त हो जाओ. अपनी नवीन कोशिका में जागो और आगे बढ़ो. जल्दी उठो. जागने का समय हो गया है.
मेरी नींद खुल गयी। सचमुच मैं अब हड्डियों के तालों से मुक्त हो गया था।अब मौत की हड्डी से मुक्त होने के पहले कदम की ताल से अनुसंधान करने के लिए आगे बढ़ चुका था.

