अग्नि आलोक
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*कश्मीर, धर्मनिरपेक्षता, और भाजपा के दोगले आरोपों पर नेहरू का जवाब*

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मेरे प्यारे देशवासियों,

मैं, जवाहरलाल नेहरू, आपके सामने हूँ, उन झूठे और दोगले आरोपों को ध्वस्त करने के लिए जो भाजपा और उनके वैचारिक पूर्वज—RSS और हिंदू महासभा—मुझ पर थोपते हैं। वे कहते हैं कि मैंने कश्मीर को बर्बाद किया, धारा 370 मेरी भूल थी, और मैं सांप्रदायिकता का शिकार हुआ। लेकिन मैं कहता हूँ—इतिहास के तथ्य झूठ से नहीं दबते! मैं आपको सच बताऊंगा—कश्मीर को भारत का ताज मैंने बनाया, और उसे बदनाम करने वाले वही हैं जिनके पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई में गद्दारी की और जिन्होंने कश्मीरी पंडितों व भारत-समर्थक मुस्लिमों की त्रासदी को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया। मैं विनायक दामोदर सावरकर की सांप्रदायिकता, RSS की घृणा फैलाने वाली बयानबाजी, और भाजपा समर्थित सरकार की नाकामी को कटघरे में खड़ा करूंगा।

कश्मीर: मेरा गर्व, मेरा नेतृत्व

1947 में, जब भारत आजाद हुआ, 565 रियासतों का भविष्य अनिश्चित था। कई हिंदू रजवाड़ों ने स्वतंत्रता या अन्य रास्ते तलाशे: जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह ने जिन्ना से हथियार और बंदरगाह के लिए बात की (V.P. Menon, The Integration of Indian States, 1956); जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान को चुना (Mountbatten Papers, India Office Records); हैदराबाद के निजाम ने स्वतंत्रता मांगी (Sardar Patel’s Correspondence, Vol. 7); ट्रावनकोर के दीवान सी.पी. रामास्वामी ऐयर ने 11 जुलाई 1947 को स्वतंत्रता की घोषणा की (Travancore State Archives, 1947). सावरकर ने ट्रावनकोर को पत्र लिखकर भारत में विलय का विरोध किया और स्वतंत्र हिंदू राज्य की वकालत की (Savarkar’s Letters to C.P. Ramaswamy Aiyar, Hindu Mahasabha Archives, 1947). यह भारत की एकता के खिलाफ साजिश थी। 

कश्मीर में, महाराजा हरि सिंह ने स्वतंत्र कश्मीर के लालच में देरी की, भारत या पाकिस्तान में शामिल होने से हिचकते रहे (Hari Singh’s Correspondence, 1947). लेकिन शेख अब्दुल्ला और उनकी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने शुरू से भारत का साथ दिया, धर्मनिरपेक्ष भारत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई (Sheikh Abdullah, Flames of the Chinar). जब 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान समर्थित कबायलियों ने हमला किया, तब मैंने और सरदार पटेल ने हरि सिंह को राजी किया। 26 अक्टूबर 1947 को अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर हुए, और भारतीय सेना ने श्रीनगर को बचाया (Lord Mountbatten’s Report, 1947). शेख अब्दुल्ला की भारत-समर्थक भूमिका ने कश्मीरी जनता को जोड़ा। हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक आग के बीच, मैंने कश्मीर को भारत का धर्मनिरपेक्ष ताज बनाया।

धारा 370: चतुर रणनीति, पटेल की सहमति

भाजपा धारा 370 को मेरी “भूल” कहती है। सच? यह कश्मीर को भारत के साथ जोड़ने की चतुर रणनीति थी। 17 अक्टूबर 1949 को संविधान सभा में, मेरे विदेश दौरे के दौरान, पटेल ने धारा 370 का समर्थन किया (Constituent Assembly Debates, Vol. X). यह अस्थायी व्यवस्था थी, जिसने कश्मीरी जनता को उनकी पहचान का सम्मान देकर भारत के साथ जोड़ा (Delhi Agreement, 1952). 1952 से 1990 तक, स्वायत्तता को धीरे-धीरे कम किया गया (Kashmir Accord Papers). श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसका विरोध किया, लेकिन उनकी सांप्रदायिक मांगें कश्मीर की मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी को अलग कर सकती थीं (Mookerjee Papers, NMML). मैंने एकता चुनी, सांप्रदायिकता नहीं।

शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी: भारत की एकता के लिए

1953 में, जब शेख अब्दुल्ला की मांगें भारत की संप्रभुता के लिए खतरा बनीं, मैंने उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया (Kashmir Accord Papers, 1953). यह व्यक्तिगत रंजिश नहीं, बल्कि भारत की एकता को बचाने का फैसला था। मैंने कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाए रखा, जबकि हिंदू महासभा सांप्रदायिक नारे लगाकर तनाव बढ़ा रही थी।

संयुक्त राष्ट्र: कूटनीति की जीत

भाजपा कहती है कि मैंने कश्मीर को संयुक्त राष्ट्र में ले जाकर गलती की। 1 जनवरी 1948 को मैंने दुनिया को बताया कि पाकिस्तान ने हम पर हमला किया (UN Security Council Records, 1948). जनमत संग्रह की बात मैंने कही, क्योंकि मुझे कश्मीरी जनता और शेख अब्दुल्ला पर भरोसा था। पाकिस्तान ने शर्तें—सेना की पूर्ण वापसी—पूरी नहीं कीं, और जनमत संग्रह नहीं हुआ। यह मेरी कूटनीति थी, जिसने कश्मीर को भारत में रखा।

कश्मीरी पंडितों और भारत-समर्थक मुस्लिमों की त्रासदी: भाजपा समर्थित सरकार की नाकामी

भाजपा मुझ पर कश्मीरी पंडितों के पलायन का आरोप लगाती है, लेकिन 1989-90 में यह त्रासदी तब हुई जब केंद्र में भाजपा समर्थित वी.पी. सिंह की सरकार थी (Balraj Puri, Kashmir: Towards Insurgency, 1993). गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद थे, जिन्हें भाजपा के समर्थन से नियुक्त किया गया (Victoria Schofield, Kashmir in Conflict, 2003). फारूक अब्दुल्ला, तत्कालीन मुख्यमंत्री, ने जगमोहन की नियुक्ति का विरोध किया, चेतावनी दी कि वे इस्तीफा दे देंगे (Alexander Evans, Journal of Contemporary History, 2002). फिर भी, वी.पी. सिंह सरकार ने 19 जनवरी 1990 को जगमोहन को राज्यपाल बनाया (Tavleen Singh, Kashmir: A Tragedy of Errors, 1995). फारूक ने 18 जनवरी 1990 को इस्तीफा दे दिया, और जगमोहन ने विधानसभा भंग कर दी (Manoj Joshi, The Lost Rebellion, 1999).

जगमोहन, जिन्हें भाजपा का करीबी माना जाता था (Ashok Kumar Pandey, Kashmirnama, 2019), ने सुरक्षा प्रदान करने के बजाय कश्मीरी पंडितों को जम्मू स्थानांतरित करने को प्रोत्साहित किया (Balraj Puri, Kashmir: Towards Insurgency, 1993). स्वतंत्र लेखकों जैसे बलराज पुरी और तवलीन सिंह के अनुसार, जगमोहन ने पंडितों को घाटी छोड़ने के लिए परिवहन की व्यवस्था की, ताकि उग्रवादियों पर कठोर कार्रवाई की जा सके (Puri, 1993; Singh, 1995). मार्च 1990 में, जब पंडितों का पलायन हो चुका था, जगमोहन ने अपील की कि वे न जाएं (Sumantra Bose, Kashmir: Roots of Conflict, 2003)—यह देर से उठाया गया कदम था।

1989-90 में, उग्रवादियों ने न केवल कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया, बल्कि भारत-समर्थक मुस्लिमों को भी मारा। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1989-2007 के बीच 219 कश्मीरी पंडित मारे गए, जबकि कश्मीरी पंडित संगठन 700 के करीब होने का दावा करते हैं (Manoj Joshi, The Lost Rebellion, 1999; Kashmiri Pandit Sangharsh Samiti, 2010). इसी अवधि में, लगभग 1,000 भारत-समर्थक मुस्लिमों की हत्या हुई, जिनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मोहम्मद यूसुफ हलवाई, मौलाना मसूदी, और अन्य कार्यकर्ता शामिल थे (Victoria Schofield, Kashmir in Conflict, 2003; Alexander Evans, Journal of Contemporary History, 2002). जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) ने इन हत्याओं को अंजाम दिया, जो भारत-समर्थकों को निशाना बनाते थे (Sumantra Bose, Kashmir: Roots of Conflict, 2003). स्वतंत्र लेखक तवलीन सिंह और मनोज जोशी ने पुष्टि की कि 1989-90 में सैकड़ों भारत-समर्थक मुस्लिम बुद्धिजीवियों और नेताओं को मारा गया (Singh, 1995; Joshi, 1999).

जगमोहन की नीतियों, जैसे 21 जनवरी 1990 को गौकदल नरसंहार, जहां 50 से अधिक प्रदर्शनकारी मारे गए (Manoj Joshi, The Lost Rebellion, 1999), ने घाटी में अराजकता बढ़ाई। पंडितों और भारत-समर्थक मुस्लिमों को सुरक्षा देने के बजाय, उनकी अनुपस्थिति में उग्रवादियों पर कार्रवाई को प्राथमिकता दी गई, जिससे पंडित देशभर में शरणार्थी बन गए (Balraj Puri, Kashmir: Towards Insurgency, 1993). बाद में, भाजपा ने इस त्रासदी का राजनीतिक लाभ उठाया, हिंदू-मुस्लिम विभाजन को बढ़ावा देकर राम मंदिर आंदोलन को बल दिया (Ashok Kumar Pandey, Kashmirnama, 2019). यूपीए सरकार ने 2008 में 5,242 घर और 1,168 करोड़ रुपये का पैकेज दिया (Sumantra Bose, Kashmir: Roots of Conflict, 2003), लेकिन भाजपा ने शरणार्थी शिविरों की बदहाली पर चुप्पी साधी (R.K. Bhat, Youth All India Kashmiri Samaj, 2008).

सावरकर और जिन्ना: सांप्रदायिकता के दोषी

भाजपा मुझ पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाती है, लेकिन सावरकर को कटघरे में खड़ा करने का समय है। 1923 में, सावरकर ने हिंदुत्व में भारत को हिंदू राष्ट्र बताया, जहां गैर-हिंदू द्वितीय श्रेणी के नागरिक हों (Savarkar, Hindutva, 1923). 1937 में हिंदू महासभा के अधिवेशन में उन्होंने कहा कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग राष्ट्र हैं (Hindu Mahasabha Records, 1937). यह सांप्रदायिकता का बीज था, जो जिन्ना के 1940 के लाहौर प्रस्ताव (All India Muslim League Records, 1940) से पहले बोया गया। सावरकर ने 1947 में ट्रावनकोर को पत्र लिखकर भारत में विलय का विरोध किया (Savarkar’s Letters to C.P. Ramaswamy Aiyar, Hindu Mahasabha Archives, 1947). जिन्ना ने पाकिस्तान मांगा, सावरकर ने हिंदू राष्ट्र—दोनों ने भारत को बांटा। सुभाष चंद्र बोस ने 1943 में दोनों को चेतावनी दी कि उनकी नीतियां भारत की एकता को तोड़ रही हैं (Netaji Collected Works, Vol. 11). 

कांग्रेस ने एक अविभाजित, धर्मनिरपेक्ष भारत की लड़ाई लड़ी। 1905 में, जब ब्रिटिश ने बंगाल को धार्मिक आधार पर बांटा, हमने स्वदेशी आंदोलन चलाया, और 1911 में ब्रिटिश को फैसला वापस लेना पड़ा (Bipan Chandra, India’s Struggle for Independence). 1946 में, जब मुखर्जी ने बंगाल के धार्मिक विभाजन की मांग की (Hindu Mahasabha Papers, 1946), कांग्रेस ने इसका विरोध किया। 1947 में, सांप्रदायिक ताकतों के दबाव में बंगाल का विभाजन हुआ (Partition Proceedings, Vol. 6), लेकिन हमने एकजुट भारत चाहा।

गांधी हत्या: RSS की झूठ, अफवाह, और घृणा की बयानबाजी

भाजपा मुझ पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाती है, लेकिन गांधी जी की हत्या (30 जनवरी 1948) का सच क्या है? सरदार पटेल ने 4 फरवरी 1948 को RSS पर प्रतिबंध लगाते हुए लिखा: “उनके भाषण और लेखन झूठ, अफवाह, और घृणा से भरे थे, जिसने सांप्रदायिक वैमनस्यता फैलाई और गांधी जी की हत्या का माहौल बनाया” (Sardar Patel’s Correspondence, Vol. 6). नाथूराम गोडसे, हिंदू महासभा और RSS से जुड़ा, ने हत्या की (Trial of Nathuram Godse, 1949). कपूर आयोग (1969) ने सावरकर की वैचारिक भूमिका को उजागर किया (Kapoor Commission Report). 1934, 1944, और 1946 में गांधी जी पर हमले हुए (Gandhi’s Collected Works, Vol. 87), जो RSS और हिंदू महासभा की सांप्रदायिक घृणा का परिणाम थे। मैं नहीं, पटेल ने यह सच बताया!

आजादी की लड़ाई में गद्दारी: सावरकर, हिंदू महासभा, RSS

भाजपा मुझे देशद्रोही कहती है, लेकिन उनके पूर्वजों की गद्दारी देखिए। सावरकर ने 1910-1911 में ब्रिटिश से पांच माफी पत्र लिखे, और 1913 से 60 रुपये मासिक पेंशन ली (Savarkar’s Mercy Petitions, National Archives; British Home Department Records, 1913). 1941 में, उन्होंने हिंदू महासभा के जरिए ब्रिटिश सेना में एक लाख हिंदू युवाओं की भर्ती करवाई, जो बोस की इंडियन नेशनल आर्मी के खिलाफ लड़े (Savarkar’s Speeches, 1941). 1947 में, सावरकर ने ट्रावनकोर को पत्र लिखकर भारत में विलय का विरोध किया (Savarkar’s Letters to C.P. Ramaswamy Aiyar, Hindu Mahasabha Archives, 1947). श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया, ब्रिटिश को पत्र लिखकर इसे दबाने को कहा (Mookerjee Papers, NMML). उन्होंने बंगाल में मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन सरकार चलाई (Bengal Legislative Records, 1941-43). RSS ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया; 1942 में गोलवलकर ने कार्यकर्ताओं को आंदोलनों से दूर रहने को कहा (M.S. Golwalkar, Bunch of Thoughts, 1966). यह थी उनकी गद्दारी, जिसने ब्रिटिश शासन को मजबूत किया, जबकि मैं, बोस, और पटेल आजादी के लिए लड़े।

भाजपा का दोगलापन: तब और अब

रुबिया सईद कांड (1989) में भाजपा समर्थित सरकार ने आतंकवादियों को रिहा किया (Balraj Puri, Kashmir: Towards Insurgency, 1993). IC-814 अपहरण (1999) में उनकी सरकार ने मसूद अजहर जैसे आतंकवादियों को छोड़ा, जिन्होंने संसद (2001), पठानकोट (2016), और पुलवामा (2019) हमले किए (Sumantra Bose, Kashmir: Roots of Conflict, 2003). फिर मुझ पर उंगली उठाते हैं? यह दोगलापन नहीं तो क्या? 

वे पटेल को मुझसे लड़ाते हैं, लेकिन पटेल ने RSS पर प्रतिबंध लगाया, हिंदू राष्ट्र को “पागलपन” कहा (Sardar Patel’s Correspondence, Vol. 6). वे बोस को “नायक” कहते हैं, लेकिन उनके पूर्वजों ने बोस के खिलाफ ब्रिटिश सेना को मजबूत किया। वे सावरकर को “वीर” कहते हैं, लेकिन सावरकर ने ब्रिटिश से पेंशन ली, सांप्रदायिकता बोई, ट्रावनकोर को भारत-विरोधी रास्ते पर भड़काया, और गांधी हत्या का माहौल बनाया। यह दोगलापन भारत की आत्मा पर धब्बा है।

मेरा सपना: एकजुट, धर्मनिरपेक्ष भारत

मैंने कश्मीर को भारत का ताज बनाया, धर्मनिरपेक्षता को इसकी आत्मा। बोस, पटेल, और मैंने एक भारत का सपना देखा—जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सब साथ चलें। भाजपा उस सपने को सांप्रदायिकता की आग में झोंकना चाहती है। उनके झूठ, उनकी घृणा, और उनका दोगलापन भारत की आत्मा को नहीं दबा सकता।

देशवासियों, सच को पहचानिए। कश्मीरी पंडितों और 1,000 भारत-समर्थक मुस्लिमों की त्रासदी भाजपा समर्थित सरकार की नाकामी थी। मैंने कश्मीर को भारत से जोड़ा, शेख अब्दुल्ला के समर्थन से। सावरकर और जिन्ना ने बांटा, मैंने जोड़ा। बोस की एकता, पटेल की धर्मनिरपेक्षता, और मेरे सपनों के भारत को फिर से जागृत कीजिए। 

जय हिंद!

Ramswaroop Mantri

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