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धर्म और राजनीति की सांठ गांठ

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 -आलोक चतुर्वेदी 

आधुनिक भारत को दो तरह के लोगों ने संभाल कर रखा है एक हैं राजनैतिक लोग और दूसरे हैं धार्मिक लोग।जहां एक तरफ पढ़े लिखे शहरी लोगों को राजनैतिक गुरुओं ने संभाला है तो दूसरी तरफ गांव के कम पढ़े लिखे लोगों को धार्मिक गुरुओं ने संभाला है। 

अगर मैं धार्मिक गुरु की चर्चा करता हूं तो यह केवल किसी एक धर्म की तरफ नहीं सभी धर्मों के गुरुओं,इमामों,मठाधीशों की बात करूंगा और यही नियम राजनैतिक गुरुओं पर भी लागू होगी यह केवल एक पार्टी की चर्चा नहीं होगी भारत के समस्त छोटी बड़ी राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय पार्टी की बात होगी।

21 वी सदी का हर व्यक्ति जिससे भी आप बात करिए वह अपने धर्म को सबसे पुराना और सबसे वैज्ञानिक बताने में जुटा है लेकिन इस कल्पना में वह भूल जाता है कि धर्म अगर विज्ञान होता या वैज्ञानिक होता तो स्कूलों में विज्ञान की किताबों की जगह शायद कुरान,हदीद, वेद,उपनिषद इत्यादि किताबों का चलन होता और अगर धर्म वैज्ञानिक होता तो भारत माफ करिए आधुनिक भारत में 15 लाख से अधिक मंदिर,8 लाख से अधिक मस्जिद और कई हजार गुरुद्वारें हैं जिनमें करोड़ो लोग अपने धार्मिक भावनाओं और आस्थाओं के अनुसार पूजा पाठ करते हैं।उन किताबों को पढ़ते हैं जिन्हें वे देवताओं की किताब या आसमानी किताब या कहे सबसे वैज्ञानिक किताब बोलने का दावा करते हैं।

मेरा प्रश्न उन धार्मिक गुरुओं से है कि आपने तो सारी किताबों के मंत्रों और आयातों को कंठस्थ कर रखा है तो आपने उस विज्ञान से कितने अविष्कार किए और कितने वैज्ञानिक देश को दिए।

यह गुरु सुबह से ले लेकर शाम तक अपने धर्म को वैज्ञानिक बताने में लगे रहते हैं वह भी विज्ञान द्वारा बने माइक और स्पीकर की मदद से।अगर आप इस बहस में ज्यादा पड़ेंगे तो कोई आपसे बोलेगा कि हमारे पास तो पुष्पक विमान थी तो कोई बोल पड़ेगा की हमारे पास तो उड़ने वाली कालीन थी।होने को तो गांव के किसी बुजुर्ग से भूत ने बीड़ी भी मांगी होती है जिसका वह दावा करता है लेकिन किसी ने उसे देखा नहीं होता। असल में हमारे धर्म गुरु इन गांव के बुजुर्गों के ही पूरक होते हैं। 

धर्म का सीधा मतलब मानने से होता है कि हां मैं उसे मानता हूं  और विज्ञान का सीधा मतलब जानने से है अगर विज्ञान किसी चीज का दावा करता है तो वह उसे जान लेने के बाद उसका सबूत देता है कि हां यह चीज होती है।

मेरा किसी भी प्रकार का कोई द्वेष नहीं है ना किसी धर्म से ना  ही किसी धर्म को मानने वाले से या उसकी आस्था से। मेरा प्रश्न तो उन धार्मिक गुरुओं से है जो एक तरफ तो धर्म को वैज्ञानिक बना के प्रस्तुत करते हैं और विज्ञान को कोसते रहते हैं,दूसरी तरफ जरूरत पड़ने पर विज्ञान द्वारा बनाए गए अविष्कारों का पूरा पूरा उपयोग करते हैं l 

       छात्र ( महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय)

Ramswaroop Mantri

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