अखिलेश अखिल
सब समय का ही तो फेर है और उम्र की अपनी बाध्यता भी। भला कोई राजनीति के ऊँचे पदों से क्यों पैदल होना चाहेगा? लेकिन ढलती उम्र और बदलते सामाजिक, राजनीतिक दृश्य इंसान को यह एहसास करा देता है कि अब उनकी पारी ख़त्म हो रही है। उनमें अब वह जज्वा नहीं रहा जो पहले कभी हुआ करता था।
आप बेहतर और ईमानदार हो सकते हैं, समाज को साथ लेकर चलने वाला और राजनीति के महान खिलाड़ी हो सकते हैं लेकिन बदलती राजनीति और बदलते समाज में युवाओं, आम जनमानस और देश, समाज और राज्य के सामने उभरती चुनौतियों के सामने वह हर इंसान और ज्ञानी एक समय के बाद बेकार और शक्तिहीन हो जाता है।
किसके भाग्य में कल क्या लिखा है यह भला कौन जाने लेकिन मौजूदा समय की मांग तो ये है कि बिहार के 9 बार के मुख्यमंत्री रहे और कभी सुशासन बाबू के नाम से चर्चित हुए नीतीश कुमार अब राजनीति के अंतिम पड़ाव पर खड़े दिख रहे हैं। अगर इस बार भी उनकी पार्टी जदयू चुनाव में बेहतर भी कर जाती है तो अब इसकी कोई गारंटी नहीं वे फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी के दावेदार होंगे या फिर कोई उनके नाम पर दावेदारी का जोर लगाएगा।
बिहार को नीतीश कुमार ने बहुत कुछ दिया है। इसे कौन झुठला सकता है ? कमी यही रह गई कि देश के बाकी राज्यों के साथ बिहार कभी कदमताल नहीं बैठा पाया। भारत के दक्षिणी राज्यों को छोड़ भी दीजिये तो बिहार के साथ ही दशक पहले तक कई राज्य बीमारू राज्यों की सूची में खड़े थे लेकिन समय के साथ वे आगे बढ़ते चले गए। विकास का कीर्तिमान स्थापित किया और कई राज्य अपने पैरों पर खड़े भी हो गए।
लेकिन बिहार अभी तक बीमारू, पिछड़ा, गरीब, बीमार, बेरोजगार, पलायन के लिए मजबूर वाला राज्य ही कहलाता रहा। ऐसा भी नहीं है कि पिछले 20 वर्षों में नीतीश कुमार ने बिहार को आगे बढ़ाने का काम नहीं किया। लेकिन जब किसी प्रदेश की सोंच और समझ ही भ्रष्टाचार, ठगी, बेईमानी और सत्ता सरकार से कुछ पाने की बन जाए तो कोई क्या कर सकता है?
बिहार पिछले 30 सालों की तुलना में आज बहुत आगे हैं लेकिन जब बाकी राज्यों से बिहार की तुलना करें तो आज भी यह सूबा सभी मानक पर सबसे पीछे है।
और इसके लिए केवल बिहार की सरकार ही नहीं बिहार की जनता भी कम कसूरवार नहीं है। कसूरवार इसलिए कि कभी भी बिहारी जनता ने सरकार से यह नहीं कहा कि उसे भी उद्योग धंधे की जरूरत है। उन्हें भी अपने घरों में काम करने की जरूरत है। लेकिन जनता ने 20 सालों में कभी भी सरकार से इस तरह के सवाल नहीं पूछे।
बिहार में पहले काफी उद्योग धंधे थे। चीनी मिलों की लम्बी श्रृंखला थी। जूट मिल थे। कागज मिल थे। मुजफ्फरपुर के बेला औद्योगिक क्षेत्र में सरकारी दवा फैक्ट्री थी। नाम था आइडीपीएल। जब तक ये उद्योग चल रहे थे बड़ी संख्या में लोग इन मिलों और फैक्ट्रियों से जुड़े थे। लेकिन सरकारी खेल की वजह से धीरे -पधिरे सब बंद होते चले गए।
हर चुनाव से पहले सभी दलों ने इन बंद मिलों को खोलने का वादा किया लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। इन बंद पड़े मिलों के लिए विपक्ष को दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता है। चूंकि सरकार तो नीतीश कुमार की जदयू और भाजपा की चलती रही। ऐसे में आज जब फिर से चुनाव सामने है ,एनडीए से यह सवाल तो किया ही जा सकता है कि इन मिलों को क्यों नहीं खोला गया ? बड़ा सवाल तो यह है कि क्या कभी बिहार की सरकार ने कभी भी केंद्र सरकार के सामने इन बंद मिलों को खोलने की बात रखी? कभी नहीं।
दरअसल सरकार भी हमेशा शॉर्ट कट रास्ते को ही अपनाती रही है। बिहार के नेताओं को पता है कि विकास और रोजगार के नाम पर बिहार के लोग कभी वोट नहीं डालते। यहाँ जातियों का बोलबाला है। जातियों में पैठ बनाओं और चुनावी समर में उतर जाओ।
यहाँ हर जाति के संगठन हैं और लगभग हर जाति के अपने नेता भी। इन नेताओं की शिक्षा -दीक्षा भी काफी कमजोर ही रही है। किसी के पास कोई बड़ा विजन नहीं। वे जानते हैं कि चुनाव के समय जातियों का बोलबाला ही अहम है। जाति को इकठ्ठा करो और चुनावी मैदान में फतह कर जाओ।
नीतीश कुमार भी ऐसा की करते रहे हैं। उन्होंने बड़े ही चालाकी से दलित से महादलित का निर्माण किया और अपना वोट बैंक तैयार किया। फिर पिछड़ी जातियों से अति पिछड़ी जातियों में अपनी पैठ बढ़ाई और चुनावी वैतरणी पार करते रहे।
उधर विपक्षी राजद भी यादव और मुस्लिम गठजोड़ के दम पर बिहार की राजनीति बढ़ाती रही। जदयू की सहयोगी रही भाजपा भी अगड़ी ,पिछड़ी जातियों के सहारे चुनाव जीतती रही। भाजपा का खेल कुछ और ही बड़ा रहा। उसने धर्म की राजनीति को भी आगे बढ़ाने का काम किया। हिन्दू -मुसलमान के नाम पर वोटों का ध्रुवीकरण किया। कभी राम मंदिर के सहारे ठगने का काम किया तो कभी बाहरी -भीतरी के नाम पर लोगों को बांटती रही।
बिहारी समाज को भी दलों का यह खेल मजेदार लगता गया और परिणाम यह हुआ कि बिहार बुनियादी समस्याओं के जाल में उलझता चला गया।
आज जब फिर चुनाव सामने है, सत्ता पक्ष और विपक्ष के सामने वही समस्या है -बेरोजगारी और पलायन। इस क्रोनिक समस्या को पाटने के लिए एक से बढ़कर एक दांव खेले जा रहे हैं। ऐसे -ऐसे दावे किया जा रहे हैं जिसे लागू करना मुश्किल और नामुमकिन है।
अभी हाल में ही बिहार की सरकार ने महिलाओं को दस -दस हजार रुपये जारी किए हैं। करीब 9 हजार करोड़ की राशि एक महीने में बांटी गई है। नीतीश सरकार कह रही है कि दो महीने और इतनी ही राशि दी जायेगी। लेकिन ये राशि कहाँ से आ रही है इसका जवाब सरकार नहीं दे रही है।
बड़ी बात तो यह है कि इन्ही राशियों का उपयोग बंद मिलों को खोलने में किया जाता तो बड़े स्तर पर रोजगार का निर्माण भी होता और प्रदेश का उत्पादकता भी बढ़ती। मिलों के आसपास भी रोजगार निर्माण होते और कई परिवारों को स्थाई रोजगार भी मिल जाता। लेकिन ऐसा सरकार करेगी नहीं।
सरकार अभी तक वही काम करती रही है जहाँ से नेताओं, मंत्रियों और अफसरों को कमाई हो। सड़क निर्माण, पुल और पुलिया निर्माण से लेकर बाढ़ के समय बाढ़ रोकने का प्रयास कुछ ऐसे खेल है जहाँ भ्रष्टाचार के जरिये पैसे कमाए जाते हैं और इस खेल में सब बराबर के हिस्सेदार हैं।
इस चुनाव के परिणाम क्या होंगे यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन इस बात जो समझ में आ रही है वह यह है कि 9 बार के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार का राजनीतिक अध्याय अंत की तरफ बढ़ रहा है।
सुप्रसिद्ध इतिहासकार और चिंतक रामचंद्र गुहा ने नीतीश कुमार को भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ अपवाद के रूप में पहचाना था. गुहा ने कहा था, ‘भारतीय राजनीति में नीतीश कुमार एक ऐसे नेता हैं जो विचार और शासन, दोनों को समान गंभीरता से लेते हैं।
यह बयान उस दौर में आया था जब बिहार में ‘सुशासन बाबू’ की छवि नई थी, और विकास की राजनीति जातिगत समीकरणों से ऊपर उठती दिख रही थी। आज, दो दशक बाद वही नीतीश कुमार अपनी छवि की रक्षा में लगे हैं, पर राजनीतिक मैदान कहीं ज़्यादा कठिन है, और दर्शक कहीं ज़्यादा अधीर हो चुके हैं।
एक समय था कि बिहार को लेकर नीतीश एक सनक थी। उनका हनक भी था। विकास और प्रशासन के लिए उनके नाम लिए जाते थे लेकिन अब उनकी माया ख़त्म हो गई है। उनके तल्ख़ तेवर खो गए हैं और उनकी नीतियां भोथरी दिखने लगी है।
अभी बिहार का जो हाल है उसके कर्ताधर्ता अगर नीतीश कुमार हैं तो बिहार की बदहाली के लिए जिम्मेदार भी वही कहलायेंगे। बिहार की जिन समस्यायों को लेकर विपक्ष आज उन्हें घेर रहा है उसके लिए दोषी भी वही कहला सकते हैं।





