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*शरजील और उमर को जमानत नहीं  मामला विवादास्पद क्यों?*

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-सुसंस्कृति परिहार 

बहुत कठिन है डगर पनघट की।यूं ही मुश्किल है जमानत मिलना उमर और शरजील को।पांच साल तक बिना सबूत यूएपीए के तहत दोनों जेल में नज़रबंद है। पिछले सोमवार को उनके साथियों को जमानत दे दी गई लेकिन ये दोनों फिर लटका दिए गए।ऐसा समझा जा रहा है कि न्यूयॉर्क मेयर और विदेशी दबाव के चलते ये मामला बिगड़ गया है।आशा थी कि इस दबाव में आकर सरकार इन सभी को जमानत दिलवाने में मदद करेगी। लेकिन जब अदालत ने इन दोनों को छोड़कर बाकी सभी को जमानत दे दी और इन्हें एक साल तक जमानत की अपील करने पर रोक लगाई तो दाल में काला होने से इंकार नहीं किया जा सकता। उनके लिए विशेष तौर पर जांच हेतु एक साल का समय दिया गया है।इस बीच चिकिन नेक काटने और दिल्ली जाम करने जैसे सबूत अब मिलने लगे हैं आगे साल भर में पता नहीं उनके मत्थे कितने गुनाह मढ़ दिए जाएं।शरजील का नाम तो कन्हैया कुमार की तरह टुकड़े टुकड़े गैंग से भी जोड़ा गया है। कन्हैया कुमार बरी हुए पर शरजील इमाम नहीं ऐसा क्यों हुआ।उमर खालिद छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता थे उन्हें दिल्ली दंगे का षड्यंत्रकारी दिल्ली पुलिस ने बनाया और वे तब से जेल के सीखचों में हैं। जबकि उन्होंने साफ किया है दंगा भड़काने वालों से पुलिस ने पूछताछ नहीं की। लेकिन जेएनयू के मुस्लिम छात्र की क्विज इस सरकार में कौन सुनता है।।

शायद अदालतें मुस्लिम समाज के साथ लंबे अर्से से भेदभाव बरतती रही हैं।याद आता है कश्मीर का 18वर्षीय युवक निसार जिसे पुलिस ने उसे1996में नेपाल से उठाया जेल भेज दिया।उस पर विभिन्न शहरों को बम से उड़ानें का आरोप मढ़ा गया। 23साल बाद उनका फैसला आया 23जुलाई 2019को राजस्थान कोर्ट ने उन्हें रिहा कर दिया और मामला खारिज कर दिया।

इसी तरह एक और निर्दोष युवक अब्दुल करीम टुंडा का फैसला 31वर्ष बाद आता है वे आरोप मुक्त होते हैं।

ऐसी ख़बरें बराबर लगातार मिलती रहती हैं। सवाल ये है कि पुलिस की गल्ती की सजा इन निर्दोषों को क्यों झेलनी पड़ी।इन युवाओं निसार के जीवन के बेशकीमती 23वर्ष और अब्दुल करीम के 31वर्ष कैसे लौट सकते हैं।इस बीच उनके परिवार जनों ने समाज में जो असम्मान झेला होगा इसकी भरपाई कैसे होगी?इस गंभीर मसले पर भी सोचा जाना चाहिए।क्या सरकार को माफ़ी मांगकर इन निर्दोषों का सम्मान करना ज़रूरी नहीं।

बहरहाल बात शरजील और खालिद की ही की जाए तो जैसा कि लोग समझ रहे हैं कि यह मामला जटिल बनाया जा रहा है इसलिए उनकी जमानत में अभी एक साल और चाहिए।सुको के दो जजों की इस पीठ का ये फैसला जिन कारणों की वजह से बताया जा रहा उन सबकी पड़ताल में फिर वक्त लेना अनुचित है। फिर जिन्हें जमानत मिली हैं वे जो टिप्पणियां कर रही हैं क्या उस पर ऐक्शन होगा?शायद नहीं क्योंकि इसमें गैर मुस्लिम शामिल हैं।वे दिल्ली दंगे की साज़िश कैसे रच सकते हैं?

कुल मिलाकर खालिद निराश हैं स्वाभाविक ही है उन्होंने जेल को ही अपना घर मान लिया है।

 आज न्याय  पुलिस और सरकार सबकी भूमिकाएं संदिग्ध हैं।वे  स्वविवेक की जगह सरकार के इशारे पर काम कर रही हैं। तब तुष्टिकरण के इस दौर में सामाजिक कार्यकर्ता वह यदि मुसलमान हैं तो परेशान तो होंगे ही। उनके ऊर्जावान जीवन को विनष्ट कर देश कितना नुकसान पहुंचाया जा  रहा है।उसकी कीमत में नहीं जानते।

अब तक हालांकि कोई प्रमाण पुलिस के पास नहीं है लेकिन फिर भी बेल की जेल।एक घिनौना शातिराना मज़ाक है।

इस प्रकरण को लेकर सारी दुनियां में थू थू हो रही है। फिर भी आशा तो की जा सकती है कि वे निसार और अब्दुल करीम की तरह एक दिन बाइज्जत बरी होंगे।

Ramswaroop Mantri

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