~ प्रखर अरोड़ा
जरावस्था यानी बुढ़ापा. क्या आप माता-पिता हैं? क्या आप अपनी संतान को प्यार करते हैं? क्या उनमें आपकी जान बसती है? अगर हाँ तो, क्या आप इस सच का अनुभव कर सकते हैं की आपके लिए आपके परेंट्स भी इसी स्थिति से गुज़रे हैं? क्या आप बूढ़े नहीं होंगे? आप अपने बुजुर्ग परेंट्स के साथ क्या सही कर रहे हैं? आपके साथ आपकी संतान जब सही नही करेगी तब क्या फील होगा आपको?
जापान में वृद्धजन अकेलेपन से निजात पाने के लिए “श्रोता” किराये पर लेते हैं. यद्यपि यह बात आश्चर्यजनक तो लगती है परन्तु है सच. जापान में इस ओन लाइन सेवा का प्रारंभ ‘टाका नोबू निशिमोटो’ ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर किया है. मिस्टर टाका नोबू निशिमोटो की उम्र लगभग पचास वर्ष की है और वे फैशन कोओरडीनेटर रह चुके हैं. उनके साथ कार्यरत सभी साथियों की भी उम्र ४५ से ५० वर्ष के बीच है. इन्हें ओसान कहा जाता है. ये सभी कार्यकर्त्ता लगभग १०००येन (६००रुप्ये ) प्रति घंटे के हिसाब से उपलब्ध हैं.
ओसान संस्था के सभी सदस्य समझदार और पढ़े लिखे होते हैं. इनका काम है उन बुजुर्गों की व्यथा सुनना जो अपनी व्यथा किसी से (अपनों से) नहीं कह पाते. मिस्टर निशिमोटो अकेले ही प्रति माह लगभग ३० -४० व्यक्तियों को सुनते हैं.
क्या इस बात पर सहज विश्वास किया जा सकता है कि सुनने वालों में ७० प्रतिशत महिलायें होती हैं. वास्तविकता यह है कि लोग इन ओसान को सिर्फ इसलिए लेते हैं क्योंकि उनके मन की व्यथा/दुःख /दर्द वे किससे कहें? कोई सुनने वाला ही नहीं है.
हमारे भारत मे वृद्ध-आश्रम हैं, ज्यादातर कमर्शियल. जिन बूढ़ो के लिए संतान से पैसे आते हैं, या जिनकी पेंशन आती है : उनके लिए. बाकी वृद्ध जहाँ तहां तन्हा पड़े रहते हैं.
आखिर इस तरह की संस्था की आवश्यकता ही क्यों पड़ी? मूल रूप से इस तरह की सेवाओं के पीछे एकल परिवार और बढ़ते हुए सोशल मीडिया और संचार से उपजे विषाद जिम्मेदार हैं.
ओसान के सदस्य “ओन लाइन” मांग के अनुसार वे एक निश्चित जगह पर न केवल जाते हैं बल्कि सामने वाले की पीड़ा ,अकेलेपन के दर्द की व्यथा या उनके अनुभवों को गंभीरता से सुनते भी हैं. ये ओसान उनकी भावनाओं के सहभागी भी होते हैं. भले ही इस व्यवस्था को अकेलेपन के स्थाई समाधान से संबोधित न किया जा सके परन्तु “मेरी कोई सुनता नहीं “या “मैं अपनी पीड़ा किससे कहू” की छटपटाहट का यह एक अस्थायी समाधान अवश्य है.
किससे कहूं? यह एक ऐसी व्यथा है जो इसे झेल रहा है वही इसकी वेदना/पीड़ा को जानता है.
“जाकी न फटी बिमायी ..वो क्या जाने पीर पराई.”
केवल वृद्धावस्था में ही नहीं युवावस्था में भी अवसाद या Depression में जाने का एक कारण अकेलापन है. इस तरह का आइसोलेशन या एकाकीपन सामाजिक होने पर भी सामाजिक नहीं है,यह मानसिक है.
सामान्यतया गिनती करने के लिए अनेक रिश्ते होते ह , मित्र होते है फिर भी एक भी रिश्ता या मित्र ऐसा दिखाई नहीं देता जिससे मन की व्यथा कही जा सके. जो मन की पीड़ा सुनकर, पीड़ा सुनाने वाले को उपहास का पात्र न बनाये.
मन में एक ऐसा दर्द समाया रहता है कि पीड़ा या वेदना जो अपनों से मिली है कहीं श्रोता के माध्यम से उन्हीं तक न पहुच जाय. इसी तरह के भय/डर ही मानसिक अकेलेपन के जनक होते हैं. इसी अकेलेपन के साझीदार होते हैं ओसान जैसे संस्थान.
हम सभी लोग कभी कभी अपनी दुखद समस्याओं से इतने दुखी हो जाते हैं या अपनी खुशी से इतने आह्लादित हो जाते हैं कि मन करता है कि कोई तो हो जिससे अपने मन की व्यथा या अपने मन की खुशी शेयर की जाय जिससे मन हल्का हो सके.
मन करता है कोई तो सुने ,समझे. बिना पूर्वाग्रह के या आलोचना के सुन भर ले. परन्तु आज के व्यस्त जीवन में ऐसा एक भी रिश्तेदार , मित्र /दोस्त दिखाई नहीं देता. मन में कितने तरह के विचार पनपते है. कहीं बात बिगड़ न जाय ,रिश्ते टूट न जाए ,उपहास का पात्र न बना दिया जाऊं आदि आदि.
आज सोशल मीडिया पर फेस बुक ,व्हाट्स एप्प ,टेलीग्राम ,इन्स्टा ग्राम जैसे अप्लिकेसंस के बढ़ते प्रयोग का कारण यही है कि आज की तिथि में प्रत्येक व्यक्ति कहीं न कहीं अकेलेपन का शिकार हो रहा है.
फेसबुक पर भले ही 5000 मित्र हों फिर भी मन एकाकी. क्यों ?
मन करता है कि कोई होता, जिसको हम अपना कह लेते यारो. पास नहीं तो दूर ही होता लेकिन कोई होता.
पहले लगता था केवल युवा पीढी ही स्मार्ट फोन का प्रयोग करती है परन्तु आज देखने में आता है कि ४५ -से ५० की उम्र के लोग भी अपने अकेलेपन से निजात पाने केलिए स्मार्टफोन का उपयोग पूरी तल्लीनता से करते हैं.
रुसी साहित्यकार अंतोन चेखव की एक बहुचर्चित कहानी है जिसमें एक पात्र इतना व्यथित था कि उसने अपने मन की पीड़ा अपने स्वजनों ,मित्रों ,से कहने का प्रयास किया परन्तु जब वह चारों ओर से निराश हो गया तब रात्री में वह अपने घोड़े के समीप गया और अपनी व्यथा घोड़े को सुना डाली और मन हल्का कर लिया.
अपने घरों में भी बुज़ुर्ग दादा , दादी भी अपने मन की व्यथा किससे कहें ? न बच्चों के पास समय है ,न अब कोई ऐसा मित्र है. इस उम्र में आते आते चलने फिरने की समस्याए भी मन को खोखला कर देती हैं.
पुराने समय में जब संयुक्त परिवार होते थे तो दादा /दादी अपने नाती /पोतों को खिलाते खिलाते अपने मन को हल्का कर लेते थे. एक चूल्हे पर पूरे परिवार का खाना बनता था.तीज ,त्योहारों ,रीति रोवाज़ों ने एकाकीपन को भले ही बचा रखा हो परन्तु अब वो सब कहाँ ?
कभी चिट्ठियों की प्रतीक्षा ,बच्चों के आने की प्रतीक्षा ,रिश्तेदारों की आवभगत ,में पता ही नहीं चलता था कि दिन कैसे गुज़र गए. आज कंप्यूटर के जमाने में बच्चे माँ बाप से हजारों मील दूर रहते हैं. न कोई चिट्ठी ,न कोई आत्मीयता और यहाँ तक कि नाती पोतों से भी अलगाव क्या बुजुर्गों को सालता नहीं है ?अवश्य सालता है पर क्या करें .किससे कहें ? है कोई सुनने वाला ?
समय की मांग है कि बच्चे अपनों को थोडा समय दें ,उनकी बातें सुनें ,उपहास न करें ,आलोचना न करें.
बस एक गंभीर श्रोता बन कर सुन भर लें. इतना ही तो चाहिए है माँ बाप को. कुछ तो विचार कीजिये ,कुछ तो मनन कीजिये. यह भी सोचिये कि आपको भी एक दिन इन्हीं रास्तों से गुज़रना पड़ेगा जिन से आपके माँ बाप /बुज़ुर्ग गुजर रहे हैं.
सभी बच्चों को “आज भी मौजूद कुछ अच्छे बच्चों” से सबक लेना चाहिए. अवश्य लेना चाहिए ताकि “किससे कहूं” जैसी समस्या से निजात मिल सके. परेंट्स को अकेलापन, खालीपन नहीं, बच्चों जैसा वात्सल्य और सम्मान मिल सके.





