अग्नि आलोक
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पुरानी और नई कुछ मौजूं रचनाएं 

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मुनेश त्यागी

सांप्रदायिकता और जातिवाद का जहर
फैला दो और आदमी की मति हर लो।

तुम अच्छे थे मगर इतना ही काफी नहीं है,
अपने पीछे एक अच्छी दुनिया भी छोड़ते जाना।

आरक्षण को “छेड़ेंगे” भी नहीं
और इसे “छोड़ेंगे” भी नहीं।

“मोहब्बत की “बारिशों” से कहो जरा जोर से बरसें
नफरतों के “आईनों” पर बड़ी “धूल” जमी है।”

“वेदों में जिनका जिक्र
हाशिए पर भी नहीं,
वे बेचारे आस्था और
विश्वास लेकर क्या करेंगे।”

मजहब का अलग स्थान रहने दो
मैं इंसान हूं, मुझे इंसान रहने दो।

“बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं
मैं आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं।”

“काट कर गैरों की टांगे खुद लगा लेते हैं लोग
मेरे शहर में इस तरह कद बढ़ा लेते हैं लोग।”

कोई हिंदू है, कोई मुस्लिम, कोई इसाई है,
हमने भी इंसान न रहने की कसम खाई है।
संविधान हैं, कानून है और निजाम भी है,
हमने भी इंसान न बनने की कसम खाई है।

कोई भी भ्रष्टाचारी, बेईमान और लम्पट
देशद्रोही यानी एंटी नेशनल ही होता है।

मैं हिंदू, सिख, ईसाई
और मुसलमान हूं,
कोई माने या ना माने
मैं पूरा हिंदुस्तान हूं।

आओ हम सब हिंदुस्तानी बनकर
फिर से खाएं खायें, एक थाल में,
और ना फंसे, हिंदू मुस्लिम
हिंदू मुस्लिम, करने वालों के जाल में।

इस मारकाट के मौसम में
हम चंदा तारे दिनमान बनें,
यह मारकाट की नगरी है
हम होली और रमजान बनें।

कसम बेच देंगे, शपथ बेच देंगे
ये नेता हमारे, वतन बेच देंगे,
सुनो मेरे यारो, ये नेता हमारे
शहीदों के सपने, कफन बेच देंगे।

                  ,,,,,मुनेश त्यागी

Ramswaroop Mantri

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