भाजपा शासित राज्यों की सरकारें खसरा-खतौनी-घरौनी के डिजिटलीकरण और 16 अंकों की आईडी के माध्यम से जनता में चारा फेंक चुकी हैं
बर्तोल्त ब्रेख्त ने आज से कोई नब्बे साल पहले चार लाइनें लिखी थीं, ‘नेता जब शान्ति की बात करते हैं/ आम आदमी जानता है कि युद्ध सन्निकट है/ नेता जब युद्ध को कोसते हैं/ मोर्चे पर जाने का आदेश हो चुका होता है।’ हो सकता है 1930 के दशक का आदमी जानता रहा हो कि नेताओं और सरकारों के बोलने का असल आशय क्या होता है। आज 2021 का आदमी नहीं जानता। ऐसा नहीं है कि लोगों का मानसिक विकास उलटा हुआ है। दरअसल, नेता और जनता के बीच एक दलाल घुस आया है। उस दलाल को अपने यहां हिंदी का अखबार कहते हैं।
पिछले कोई एक-डेढ़ महीने से हिंदी के अखबारों के स्थानीय संस्करणों में जमीन जायदाद से जुड़ी सकारात्मक खबरें धड़ल्ले से छप रही हैं। ज़मीनों के डिजिटलीकरण के सरकारी विज्ञापनों से अखबारों के पन्ने पटे हुए हैं। कोई मुख्यमंत्री जमीन और मकान की डिजिटल आईडी बांट रहा है, कोई पट्टे। अखबारों में तकरीबन उत्सव की मुद्रा में ऐसी खबरें छापी जा रही हैं, गोया रामराज्य आ गया हो और अब कोई किसी की ज़मीन पर कब्जा नहीं कर पाएगा। बात को खोलने से पहले आइए इधर बीच के कुछ शीर्षक देखें :
– जमीन के रिकॉर्ड डिजिटल बनाने में मध्य प्रदेश सबसे आगे, ये राज्य भी तेजी से बन रहे एडवांस्ड (भाषा/नवभारत टाइम्स)
– जमीन के एक ही नंबर की कई लोगों के नाम फर्जी रजिस्ट्री पर लगेगी अंकुश, जानें- केंद्र सरकार का प्लान (दैनिक जागरण)
– पूरे हरियाणा की जमीन का डिजिटल रिकॉर्ड बनेगा, छुड़ाए जाएंगे अवैध कब्जे (हरिभूमि)
– शीघ्र ही जमीन का खसरा भी डिजिटल मिलेगा, सभी तरह के प्रपत्र मेघदूत में होगा संरक्षित (दैनिक जागरण)
– योगी आदित्यनाथ सरकार का बड़ा कदम, 16 अंक की यूनिक आईडी से रुकेगी जमीन की धोखाधड़ी (दैनिक जागरण)
– वाराणसी में खतौनी के बाद अब वरासत भी होगा डिजिटल, राजस्व परिषद की ओर से जारी किया गया पत्र (दैनिक जागरण)
– खुशखबर! यूपी में बढ़ गयी है विशेष वरासत अभियान की तारीख। आपका भी हो कोई मामला तो आज ही करें संपर्क (पत्रिका)
– संपत्ति कार्ड बनाने में जुटे लेखपाल, लोग हो रहे परेशान (अमर उजाला)
– यूपी में खेती की जमीन का दस्तावेज ‘खसरा’ अब ऑनलाइन, सरकार को योजनाएं बनाने में मिलेगी मदद (दैनिक जागरण)
– एमपी की जनता को अब भटकना नहीं पड़ेगा, व्हाट्सएप पर मिलेगी खसरा, खतौनी और नक्शे की प्रतिलिपि (दैनिक भास्कर)
– बिहार में जमीन के नक्शे के लिए नहीं लगाने होंगे दफ्तरों के चक्कर, नीतीश सरकार ने की ये पहल (प्रभात खबर)
क्या आपको शक़ नहीं हो रहा कि हरियाणा से लेकर यूपी, बिहार, एमपी तक हर राज्य में ज़मीन-जायदाद से जुड़े एक जैसे काम हो रहे हैं और एक जैसी ही खबरें छप रही हैं, चाहे अखबार कोई भी हो? इन खबरों को देखकर ऐसा लग रहा है कि सरकारें चाहती ही नहीं कि लोग रजिस्ट्री ऑफिस या तहसीलदार के दफ्तर का चक्कर काटें। घर बैठे ही जमीन से जुड़े सबके सारे काम ऑनलाइन हो जाएं। वाकई, यह सरकार बहादुर की दरियादिली लगती है। लेकिन ऐसी ही दरियादिली तो केंद्र सरकार ने कृषि कानूनों के मामले में भी दिखायी थी, बिना मांगे, और किसान समझ गए कि मुफ्त की दाल में कुछ काला है।
दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसानों नें समय रहते बिन मांगे मिले तीन कानूनों की मंशा को भांप लिया था। किसान तो अपनी लड़ाई लड़ ही रहे हैं, दुर्भाग्य उनका है, जिन्हें अभी तक यह भनक नहीं लगी है कि उनकी ज़मीन पर सरकार की कुटिल निगाह है। ज़मीन के खातों के हर राज्य में हो रहे एक समान रूप से डिजिटलीकरण के आगे और पीछे की कहानी इतनी भयावह है कि आप सुन लें तो सीधे दौड़ते हुए गांव भागेंगे। ये कहानी आपको हिंदी के अखबार कभी नहीं बताएंगे, जैसे आज तक इन अखबारों ने कृषि कानूनों की असली कहानी नहीं बतायी।
वन नेशन, वन रजिस्ट्री
हम सभी जानते हैं कि अपने देश के कानून के तहत ज़मीन की पट्टेदारी यानी लैंड टाइटिल का इंतज़ाम अंतिम नहीं होता। कोई चाहे तो ताजिंदगी दीवानी अदालतों में पट्टेदारी के दावे ठोंक के जमीनों को उलझाये रख सकता है। इसके फायदे भी हैं और नुकसान भी। जिसका वास्तव में अधिकार है जमीन पर, वो अपना दावा कभी भी अदालत में ठोंक सकता है, क्योंकि पट्टा जिसके नाम पर चढ़ा है वो अंतिम नहीं होता, कानूनन अनुमान-सिद्ध होता है। केंद्र सरकार इस व्यवस्था को खत्म करने के लिए एक कानून ला रही है। हिंदी अखबारों के स्थानीय संस्करणों में छप रही डिजिटलीकरण की ‘खुशखबरें’ दरअसल इसी कानून की ज़मीन तैयार करने और पाठकों को मनोवैज्ञानिक रूप से अनुकूलित करने के लिए छापी जा रही हैं।
हिंदी के कुछ अखबारों में इस कानून का जिक्र आपको पिछले दिनों की खबरों के उत्साही शीर्षकों में मिल सकता है :
– आधार कार्ड से लिंक होगी आपकी प्रॉपर्टी, फर्जीवाड़ा रोकने के लिए मोदी सरकार ने बनाया मास्टर प्लान (पंजाब केसरी)
– झारखंड की हर जमीन का होगा यूनिक आईडी नंबर, केंद्र ने राज्य सरकार को भेजा प्रस्ताव (हिंदुस्तान)
नये पट्टेदारी कानून पर आने से पहले इसकी पृष्ठभूमि समझ लेते हैं। नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद योजना आयोग को भंग करके 1 जनवरी, 2015 को नीति आयोग बनाया था। इस नीति आयोग के शुरुआती कामों में एक कमेटी का गठन शामिल था। कृषि लागत और मूल्य आयोग के पूर्व प्रमुख टी. हक़ की अध्यक्षता में बनी इस कमेटी का काम जमीन के पट्टों को ‘कंक्लूसिव’ यानी अंतिम रूप से दिए जाने का एक प्रस्ताव तैयार करना था। इसी कमेटी की रिपोर्ट पर नवंबर 2019 में नीति आयोग के एक कार्यसमूह ने मॉडल कंक्लूसिव लैंड टाइटलिंग कानून का एक मसौदा बनाया।

यह मसौदा सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को अनुमोदन के लिए भेजा गया। हां या ना करने की अंतिम तारीख रखी गयी सितंबर 2020, जिसमें राज्यों को लिखा गया कि यदि वे अपनी राय नहीं देते हैं तो इसे उनकी स्वीकृति मान लिया जाएगा।

भारतीय जनता पार्टी को ‘एक’ से बहुत लगाव है। एक राष्ट्र, एक टैक्स, एक श्मशान, एक कुआं, एक नेता, एक चुनाव जैसे जुमले हम नीतियों में परिवर्तित होते देखते आ रहे हैं सात साल से। यह नया लैंड टाइटलिंग कानून का मसौदा भी एक राष्ट्र, एक रजिस्ट्री के नारे के अंतर्गत लाया गया। जाहिर है, यह नारा अभी जनता के बीच नहीं फेंका गया है, लेकिन भाजपा शासित राज्यों की सरकारें खसरा-खतौनी-घरौनी के डिजिटलीकरण और 16 अंकों की आईडी के माध्यम से चारा फेंक चुकी हैं। जनता के पास इसे खाने के अलावा कोई चारा नहीं है। और बुरी खबर यह है कि जमीन-जायदाद का मसला राज्य सूची का होते हुए भी केंद्र द्वारा तय किया जा रहा है और जल्द ही नया कानून आने वाला है। नए कानून में बस राज्य का नाम खानापूर्ति के लिए भरा जाना है। भरोसा न हो तो राज्यों को भेजे गए ड्राफ्ट का पहला पन्ना देखिए :

यह नया कानून क्या है, इसे आप गूगल पर खोजकर भी बहुत कुछ नहीं समझ सकते। सिवाय टेलिग्राफ की एक खबर के, जिसमें 2015 में इसके लिए बनायी गयी कमेटी के प्रमुख हक साहब ने खुद संदेह जताते हुए एक बयान दिया है, ‘एक कंक्लूसिव टाइटिल यानी निर्णायक पट्टा ही अंतिम होगा। इसको चुनौती नहीं दी जा सकती।’ न तो तहसीलदार की अदालत में न दीवानी अदालत में आप जमीन पर अपना अधिकार जता सकते हैं, अगर एक बार किसी ने पट्टा अपने नाम लिखवा लिया। इसके अलावा, आप अपनी ज़मीन पर ईंटा-बालू गिराकर निर्माण भी नहीं कर पाएंगे, क्योंकि उसके लिए आपको किसी बिल्डर/ डेवलपर से एक डेवलपर कॉन्ट्रैक्ट करना होगा।
इस कानून से रजिस्ट्री कार्यालयों की नौकरियों पर क्या गाज गिरने वाली है, उसे समझना हो तो तो दैनिक जागरण चंदौली की पिछले साल 26 सितंबर, 2020 की यह खबर देखें जो संभवत: नए कानून के संदर्भ में ही छापी गयी है। जमीन का ऑनलाइन दाखिल खारिज, पेपर लेस होगा दफ्तर। इसके अलावा, दीवानी मामलों के वकीलों की रोजी-रोटी भी बुरी तरह छिनने वाली है इस कानून से। बाकी आपकी जमीन की तो अब सरकार ही मालिक है।
पूरा मामला तफ़सील से समझने के लिए सुनें रांची के वरिष्ठ अधिवक्ता रश्मि कात्यान को, जिनका इंटरव्यू स्थानीय पत्रकार प्रवीण ने कुछ दिनों पहले लिया है।





