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महल की राजनीति नहीं चल पा रही है सिंधिया की, भाजपाई विरोध में उतरे

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भोपाल। महल की राजनीति में हमेशा दो ध्रुव रहे हैं, लेकिन अब हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं। इसके बाद भी राजमाता विजयाराजे सिंधिया के अनुयायी श्रीमंत को अंगीकार नहीं कर पा रहे हैं। एक समय था जब राजमाता के इशारे पर जो नेता कुछ भी करने को तैयार रहते थे, वहीं नेता अब उनकी तीसरी पीढ़ी की सुनने व समझने को तैयार नही हैं। दरअसल कांग्रेस से अपने दलबल के साथ भाजपाई बने सिंधिया इन दिनों भाजपा के प्रभावशाली नेताओं से तालमेल बनाने के प्रयासों में बेहद सक्रिय बने हुए हैं। वे जब भी प्रदेश में होते हैं, किसी न किसी नेता के घर मेल मुलाकात के लिए जरुर जाते हैं। खास बात यह है कि भाजपा में अपनी दादी के बाद दो बुआओं के सक्रिय और प्रभावशाली होने के बाद भी सिंधिया को अपनी स्वीकार्यता के लिए इस तरह के तमाम प्रयास करने पड़ रहे हैं। हालत यह है कि उन्हें अपने ही इलाके में महल की राजनीति चलाने के लिए भाजपा के पुराने नेताओं से दो चार होना पड़ रहा है।

अब भी भाजपाई नेता और कार्यकर्ता न केवल उनके विरोधी बने हुए हैं, बल्कि उन्हें चुनौती देते भी नजर आ रहे हैं। सिंधिया के लिए यह मुश्किल उनके अपने ही गढ़ ग्वालियर चंबल इलाके की राजनीति में खड़ी हुई है। दरअसल यह वे नेता है, जो स्थानीय स्तर पर पूरी तरह से श्रीमंत के कांग्रेस में रहते उनके धुर विरोधी माने जाते रहे हैं। उनके निशाने पर हमेशा से महल की राजनीति रही है। इनमें जयभान सिंह पवैया हों या फिर विवेक शेजवलकर।  यह वो इलाका है जहां से भाजपा के कई बड़े नामदार आते हैं। सिंधिया के भाजपा में आने के बाद अब इस अंचल की राजनीति के सिरमौर बनने की जद्दोजहद चल रही है। इसमें एक ओर दिग्गज भाजपा नेता और केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर का भी नाम शामिल है। तोमर अब तक इस अंचल में भाजपा के सबसे बड़े नेता होने की वजह से पार्टी में सिरमौर माने जाते रहे हैं। सिंधिया के भाजपाई होने के बाद उन्हें अब तोमर का प्रतिद्वंदी माना जा रहा है। दरअसल यह दोनों ही नेता नहीं चाहेंगे कि उनकी सर्वस्वीकारता में कोई आड़े आए।सिंधियाके भाजपा में आने के बाद भी इस अंचल में प्रशासनिक हो या फिर राजनैतिक दोनों ही में अब भी तोमर की पसंद ना पसंद को ध्यान में रखने की झलक दिखती है, लेकिन अब श्रीमंत इन सभी फैसलों में अपनी झलक दिखाना चाहते हैं। कांग्रेस में रहते पार्टी से लेकर सरकार में उनकी ही चलती रही है। श्रीमंत का मुरैना इलाके में हस्तक्षेप व सक्रियता तोमर को रास नहीं आ रही है। लगभग यही हाल गुना इलाके में भी है। यह वो इलाका है जिसे श्रीमंत अपनी कर्मभूमि बनाए हुए थे, लेकिन बीते चुनाव में उनके ही एक पूर्व सेवादार केपी यादव ने भाजपा के झंडे तले चुनावी समर में श्रीमंत के इस गढ़ को ढहाकर उनकी लोकसभा जाने की राह समाप्त कर दी थी।  इस हार को सिंधिया अब तक नहीं भूल पाए हैं। दरअसल श्रीमंत और केपी यादव के मधुर संबंध सार्वजनिक रुप से किए गए अपमान के बाद तल्खी में बदले तो यादव ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया था। इस दौरान भाजपा के रणनीतिकारों ने कांटे से कांटा निकालने की रणनीति पर काम करते हुए श्रीमंत को उनके ही समर्थक से मात दिलाकर उन्हें हतप्रभ होने पर मजबूर कर दिया था। राजनीति में आने के बाद श्रीमंत इस मिली पहली हार के कड़वे घूंट को अब तक नहीं भूल सके हैं। अब इलाके में हो रहे तमाम विकास के कामों का श्रेय लेने की होड़ इन दोनों ही नेताओं के बीच पूर्व से चली आ रही तलखी को बढ़ाने का काम कर रहे हैं। दरअसल इन कामों का श्रेय सिंधिया लेना चाहते हैं, वे और उनके समर्थक इन कामों को इसी तरह से प्रचारित भी कर रहे हैं। इसके पीछे जो तर्क दिया जा रहा है वो है कि उनके भाजपा में शामिल होने के बाद यह काम उनके प्रयासों से शुरू हुए है, जबकि स्थानीय सांसद यादव इसका श्रेय खुद लेने के प्रयासों में लगे हुए हैं। लगभग यही हाल ग्वालियर इलाके में भी बने हुए हैं। यहां से भाजपा सांसद संघ पृष्ठभूमि के विवेक शेजवलकर हैं। इन दोनों नेताओं के बीच कुछ अहम मामलों को लेकर मतभेद हैं। अब ग्वालियर में एयरपोर्ट पर बन रहे नए टर्मिनल का मामला हो या फिर चंबल का पानी लाना। इन सभी मुद्दों को लेकर इन दोनों नेताओं में भी श्रेय लेने की होड़ लगी हुई है। यही वजह है कि सिंधिया द्वारा अपने विरोधी पुराने भाजपा नेताओं से मेल मुलाकात कर उनकी नाराजगी दूर कर संबंध सुधारने के किए जा रहे प्रयासों के बाद भी दूरी कम होने और कटुता कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में श्रीमंत ग्वालियर दौरे के समय महल के घोर विरोधी हिन्दुवादी पूर्व मंत्री जयभान पवैया से मिलने उनके घर भी जा चुके हैं। इस मुलाकात के बाद पवैया ने मीडिया के सवालों पर  बेहद सधी हुई प्रतिक्रिया दी थी।
समर्थकों में भी जारी है कटुता
खास बात यह है कि इन नेताओं के बीच अब तक सामंजस्य बनता नहीं दिख रहा है। इनमें सिंधिया और पुराने भाजपा नेताओं के समर्थकों के बीच अब भी आमने-सामने की स्थिति साफ दिखती है। हालात यह है कि दोनों पक्षों के समर्थक कार्यकर्ता जब भी मौका मिलता है सोशल मीडिया पर अपने-अपने नेताओं के समर्थन में मोर्चा खोल देते हैं। बात फिर विकास कार्यों की हो या फिर कोई प्रशासनिक बैठक की।  यह बात अलग है कि कोरोना जैसी महामारी के बाद भी सिंधिया अपने इस प्रभाव वाले इलाके में नाम के लिए सक्रिय रहे, जिसकी वजह से वे अपने विरोधियों के निशाने पर भी बीते दिनों रह चुके हैं।  

Ramswaroop Mantri

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