सुसंस्कृति परिहार
सुख्यात व्यंग्य लेखक हरिशंकर परसाई एक ऐसा नाम है जिन्होंने देश की आज़ादी के दीवानों को अपनी आंखों से देखा।उनको देखने की तमन्ना लिए वे जुलूसों में भी शरीक हुए जिनमें लोगों को यातनाएं दी गईं।अपनी निजी ज़िन्दगी में घरु परेशानियों के बीच समय निकालकर वे आज़ादी के स्वप्न देखते हुए एक दिन भारत को आज़ाद होते देखते हैं।
उनकी वय उस वक्त लगभग 22-23 बीच रही होगी।एक युवा जिसने ज़ुल्म भोगते क्रांतिकारियों को देखा सुना।
आज़ाद भारत होते ही उन्होंने सबसे पहले संभवतः नवंबर 1947 में यानि कि आज़ादी के ठीक तीन माह बाद जो व्यंग्य लिखा वह उनके अंदर उपजी करुणा का दिग्दर्शन कराते हैं जिसकी कल्पना उन्होंने आज़ाद भारत में
कतई नहीं की थी।हुआ यह था नगर के एक स्वनामधन्य सेठ जी की
एक नयी चमचमाती कार पर दो बहुत गरीब बच्चों को हाथ फेरते और ड्राइवर द्वारा उन दोनों को तमाचे मारते देखा था। उन्होंने लिखा‘‘मैं खड़ा-खड़ा यह दृश्य देख रहा था। उसने मुझे झकझोर दिया और मेरी वर्ग-चेतना को भी जगाया। मैंने इस घटना को अपनी कल्पनाशीलता और भाषा की सामर्थ्य के साथ लिख दिया। लेखक की जगह अपना नाम न देकर उपनाम ‘उदार’ लिखा.’’ ‘दूसरों की चमक-दमक’ शीर्षक से लिखी गयी यह कहानी ‘प्रहरी’में प्रकाशित हुई। उसके बाद ‘अघोर भैरव’ के छद्म नाम से ‘प्रहरी’ 29 अगस्त 1948 में परसाई ने लिखा था–‘यदि कोई पूछे कि स्वराज्य किसका? तो हम सब कहेंगे- किसान का, मजदूर का, ग्रामीण का. परन्तु क्या वास्तव में वह जानता है कि उसे राज्य मिल गया है, वह राजा हो गया है? उसकी राजनीति, साहित्य, संस्कृति, कला-पेट के बाहर कहीं भी नहीं है.’’
इसी दौर में परसाई ने ‘मेरे समकालीन, जाने-पहचाने लोग’ में लिखा-
‘‘1947 में जब मैंने लिखना शुरू किया, भारत स्वाधीन हुआ ही था। चारों तरफ स्वाधीनता-संग्राम में जेल गए हुए ‘सुनाम धन्य’, ‘प्रातः-स्मरणीय’, ‘तपोपूत’ आदि बिखरे थे। किसी गली में बैठते हुए डर लगता था कि कोई प्रातः स्मरणीय न निकल पड़े। यह भावुकता, श्रद्धा, पूजा का दौर था… हिन्दी वीणापाणि के बूढ़े पुजारी भी उन दिनों श्रद्धास्पद थे। कम-ज्यादा वीणापाणि के चाचा, फूफा और बहनोई भी थे। इनके चित्र देखता था। मंचों पर इनके नाटकीय करतब देखता था। इनका सहज कुछ भी नहीं होता था। शब्द बनावटी, उन्हें बोलते वक्त होठों के मोड़ बनावटी, स्वर बनावटी, आँखों का भाव बनावटी, मुस्कान बनावटी। छायावादी भावुकता के उस दौर में ये ‘माँ भारती के सपूत’ आदि कहलाते थे। उन्होंने बिना डरे बेझिझक जिस तरह उनके हाव भाव और शैतानी को मार्क कर लिया था।आज उनके कुनबाई बड़ी तादाद में विस्तार कर लिए हैं। मां भारती के ये कथित सपूत आज भी समादृत हैं ।
विदित हो’’परसाई जबलपुर के मॉडल स्कूल में जब अध्यापक थे। आजादी के अवसर पर जबलपुर के तिलक भूमि तलैया के आयोजन में मंच से ‘प्रहरी’ नामक साप्ताहिक पत्र के प्रकाशन की घोषणा की गयी थी।”स्वाधीनता का प्रहरी, जनतंत्र का प्रहरी। समाज, सत्य और उजाले का पहरेदार.’’ मंच से सम्पादकों की भी घोषणा की गयी- भवानी प्रसाद तिवारी और रामेश्वर प्रसाद गुरु। मूल्य डेढ़ आना ‘सालाना चन्दा है छह रुपया.’’ परसाई ने ‘प्रहरी’ पत्रिका खरीदी। उनकी इच्छा भवानी प्रसाद तिवारी से मिलने की हुई। ‘प्रहरी’ का प्रकाशन 15 अगस्त 1947 से ही आरंभ हुआ था। भवानी प्रसाद तिवारी सम्पादक थे और कामता प्रसाद गुरु (सुप्रसिद्ध व्याकरणाचार्य) के पुत्र रामेश्वर प्रसाद गुरु संयुक्त सम्पादक थे- क्राइस्ट चर्च स्कूल में शिक्षक, पत्रकार और ‘अमृत बाजार पत्रिका’ के प्रतिनिधि। जबलपुर में उस समय मिस्त्री होटल बौद्धिकों का अड्डा था ।परसाई भी वहां जाने लगे और उस बिरादरी में शामिल हुए।
उनकी पहली प्रकाशित रचना ‘दूसरों की चमक-दमक’ है, जो ‘प्रहरी’ में 23 नवम्बर 1947 को प्रकाशित हुई थी। इसी समय से परसाई के लेखन का शुभारम्भ हुआ माना जाता है इस रचना में तब किसी ने ‘साम्यवाद’ देखा, तो किसी ने इसमें ‘वर्ग-संघर्ष का सही चित्रण’ पाया. ‘उदार’ उपनाम से ‘प्रहरी’ में परसाई की कई कहानियाँ प्रकाशित हुईं। किसी को पता नहीं था कि यह ‘उदार’ है कौन? खोज की जाने लगी और अंत में पता लगा कि हरिशंकर परसाई ही ‘उदार’ हैं। नौकरी में थे इसलिए और लोगों की प्रतिक्रिया जानने वे छद्म नाम से लिखते थे।बाद में नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने लेखन को ही जीवनाधार बना लिया और जी खोलकर लिखा। बाद में अन्य स्थानों से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं तथा इलाहाबाद से प्रकाशित ‘संगम’ में उनकी कई रचनाएँ छपीं। वे जबलपुर से बाहर पचास के दशक में राष्ट्रीय क्षितिज पर छा रहे थे ‘लोकल’ से ‘नैशनल’ हो रहे थे। उनके पास रचनाएँ काफी थीं, जिनमें से छाँट कर उन्होंने अपनी पहली किताब बनाई ‘हँसते हैं रोते हैं’। कथा-रचनाओं की पाण्डुलिपि तैयार कर सेठ गोविन्द दास के जयहिन्द प्रेस के मैनेजर गुलाब प्रसन्न शाखाल को दी। ‘मेरी एक बात और’ शीर्षक से भूमिका लिखी-‘‘आदमी को मैंने जैसे हँसते और रोते देखा है, वैसा ही उतारा है इन कहानियों में। आदमी की वास्तविक जिन्दगी को कहीं छोड़ा नहीं है… शैली के मामले में मैं किसी की नकल करने से साफ बच गया हूँ… भाषा जैसी बोलता हूँ, वैसी ही लिखी है।’उनका स्तंभ-लेखन ‘प्रहरी’ में 1947 से ‘अघोर भैरव’और ‘उदार’ छद्म नाम से आरंभ हुआ.बाद में ‘प्रहरी’ में इस स्तंभ का नाम ‘नर्मदा के तट से’ हो गया था। लगभग एक दर्जन पत्र-पत्रिकाओं में उनका स्तंभ-लेखन जारी रहा है- 1947 से 1994 तक। जबलपुर से ही प्रकाशित ‘परिवर्तन साप्ताहिक’ में उनका स्तंभ था- ‘अरस्तू की चिट्ठी’।जबलपुर की नई ‘दुनिया’ में ‘कबीर’ उपनाम से उनका स्तंभ था।इसमे ‘सुनो भाई साधो’ ‘आदम’ नाम से भी लिखा। उन्होंने दिल्ली के ‘जनयुग’ (1965) में ‘ये माजरा क्या है’ शीर्षक स्तंभ में अपने व्यंग्य लिखे। उन्होंने कई शैलियों में स्तंभ-लेखन किया। ‘सारिका’ का उनका स्तम्भ ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ (1974-76) साक्षात्कार शैली में है और ‘देशबंधु’ अखबार का स्तंभ ‘पूछिए परसाई से’ (1983-1994) प्रश्नोत्तर शैली में है।इन तमाम स्तंभों में स्वतंत्र भारत की वास्तविक पहचान मिलती है। परसाई का साहित्य. कला, साहित्य, शिक्षा, संस्कृति, राजनीति, घर, परिवार, समुदाय, अर्थ-व्यवस्था, शासन प्रणाली, न्याय-व्यवस्था, विधि-व्यवस्था, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, चुनाव, संसद, विधानसभा, राजनीतिक दल, कवि, लेखक, बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी, धर्म, गृह-नीति, विदेश नीति, संवेदना, विचार दर्शन, सिद्धान्त, नेता, अभिनेता, बाजार, विज्ञापन, प्रेम,विवाह, हिंसा, नैतिकता, बाह्याचार, प्रदर्शन, सरकारी दफ्तर, अधिकारी, पदाधिकारी, स्वार्थ बेशर्मी, ढोंग, ईमानदारी, बेईमानी, सामंत, पूंजीवाद, फासीवाद, अमेरिका, रूस, लोकतंत्र, गणतंत्र, संविधान’,-सब पर परसाई की पैनी नजर रही है।
उनकी दृष्टि से कुछ भी अछूता नहीं रह। इसे स्वाधीन भारत पर की गयी टिप्पणियों के रूप में ही देखना समझना गलत है। उनका समस्त लेखन परिवर्तनकामी और प्रगतिशील है। परसाई के लिए लेखन संघर्ष का हथियार है। वस्तुत:जो प्रगतिकामी नहीं है।वह लेखक नहीं है। प्रसिद्ध समालोचक रवि भूषण उन्हें इसके अलावा शब्द-सचेत लेखक मानते हैं। वे लिखते हैं कि “इलाहाबाद उनके लिए ‘साहित्य की राजधानी’ नहीं, ‘कला धानी’ था। ‘राजधानी’ में ‘राज’ शब्द उनकी दृष्टि में सामंतवाद का प्रतीक है। जहाँ राज होगा, वहाँ लोकतंत्र नहीं होगा। शब्दों के प्रति, शब्द-प्रयोगों के प्रति वे अधिक सावधान थे। पुराने आचारों-विचारों और भाषाई संस्कारों से मुक्ति पर उन्होंने सदैव बल दिया। ‘राजधानी’ के लिए उन्होंने ‘लोकधानी’ शब्द का प्रयोग किया है वे भाषा के समाजशास्त्र से ही नहीं, उसके मनोविज्ञान से भी भलीभाँति अवगत थे।”
कुल मिलाकर परसाई जी का आज़ादी के बाद का विपुल लेखन इस बात का एक दस्तावेज़ है कि आज़ादी के बाद भारत में जो बुनियादी परिवर्तन आने चाहिए थे, वे नहीं आए। सरकारी योजनाओं पर अमल नहीं हुआ।देश विकास और त्याग की भावना समाप्त होने की बात उन्होंने खुलकर की है। सन् 1995 में उनकी जब मृत्यु हुई तब तक फासिस्टवादी ताकतों को पनपते और दंगा कराते उन्होंने देख लिया था। इसके ख़िलाफ़ ख़ूब लिखा।यदि उसी समय देश का विकास चाहने वाले इन रंगे सियारों को पहचान लेते तो देश आज मुसीबतों के दौर से बच गया होता।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि परसाई जैसे स्पष्ट वादी लेखक को पुरानी सरकारें बराबर पढ़ती तो रहीं, उन्हें सम्मान देती रही लेकिन उनकी व्यंग्य में कही बातों पर अमल नहीं कर पाईं। परिणाम सामने है कि आज परसाई जैसे सुचिंतित लेखक सरकार विरोधी लेखक माने जाने के कारण अछूत है।कतिपय प्रगतिशील ताकतें ही उनका वजूद बनाए हुए हैं। लेकिन ये सच है कि देश की प्रौढ़ और वृद्ध होती पीढ़ी उनको सच्चा लेखक और राजनीतिज्ञों के लिए पथ-प्रदर्शक मानते हैं।
22अगस्त उनका जन्म दिवस है।कम से कम आज जो चंद ईमानदार लेखक हैं वे उनका शिद्दत से स्मरण करते हुए नई पीढ़ी को उनके अवदान और लेखन के स्वरूप से अवगत कराएं। ताकि वे भी सामाजिक और राजनैतिक चेतना के लिए अपने लेखन और विचारों में परसाई जैसी साफगोई ला सकें।आज जब चारण और भाट की प्राचीन परंपरा के उन्माद में लेखक डूब गए है तब परसाई का पुनर्पाठ और स्मरण मायने रखता है।वह एक सच्चे लेखक का कर्तव्य भी बनता है।उन्होंने अपने व्यंग्यपूर्ण लेखन के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर प्रकाश डाला, विशेष रूप से लोकतंत्र में व्याप्त विसंगतियों और भ्रष्टाचार पर। उनके लेखन में, आम आदमी की समस्याओं, राजनीतिक पाखंड और सामाजिक असमानता पर तीखी टिप्पणियां समाज और राजनीति के कर्णधारों का मार्गदर्शन करने में समर्थ हैं।

