28 मार्च 1942 को ओडिशा के कटक जिले में जन्मी पार्वती बचपन से ही काफी एक्टिव थीं. स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ वह सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं. कहा जाता है कि स्कूल में कविता पाठ के लिए उन्हें 5 रुपये का इनाम मिला था. वही उनका पहला अवॉर्ड था. उनके टीचर उनके टैलेंट से इतने खुश थे कि बाद में डायमंड जुबली समारोह में उन्हें चीफ गेस्ट के तौर पर बुलाया गया.
छोटी उम्र से ही उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो और कई सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था. साल 1949 में उन्हें फिल्म श्री जगन्नाथ में चाइल्ड आर्टिस्ट का रोल मिला. यहीं से उनके फिल्मी सफर की शुरुआत हुई.
यूं मिलने लगे थे लीड रोल
साल 1953 में फिल्म अमारी गान झुआ में उन्हें लीड रोल मिला और लोगों ने उनके अभिनय को खूब पसंद किया. 1956 में आई फिल्म भाई भाई ने उन्हें इंडस्ट्री के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक हलकों में भी पहचान दिलाई. 1959 में फिल्म मां में लीड रोल करने के बाद उन्होंने गौर घोष से शादी की और पार्वती घोष बन गईं.
करियर में दी कई अवॉर्ड वीनिंग फिल्में
शादी के बाद भी उन्होंने अपने सपनों को नहीं छोड़ा. बंगाली भाषा सीखी, साहित्य पढ़ा और पति के साथ मिलकर कई सफल और अवॉर्ड जीतने वाली फिल्में बनाईं. फिल्म संसार के बाद दोनों ने फकीर मोहन सेनापति के मशहूर उपन्यास छा माना अथा गुंथा पर फिल्म बनाने की ठानी. कुछ वजहों से देरी हुई, लेकिन 1986 में पार्वती ने खुद इस फिल्म को प्रोड्यूस और डायरेक्ट किया. इस काम के लिए उन्हें खूब सराहना मिली.
बता दें कि कुछ साल बाद उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली, लेकिन सामाजिक कामों में हमेशा सक्रिय रहीं. उन्हें कई लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. 12 फरवरी 2018 को उन्होंने अंतिम सांस ली, लेकिन ओडिया सिनेमा में उनकी छाप आज भी जिंदा है.






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