जिनकी आवाज ही पहचान है…
मेरी आवाज ही पहचान है, गर याद रहे… … जी हां स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, जिनकी आवाज ही
उनके व्यक्तित्व को परिभाषित करती थी। उनकी व्यक्तिगत जिंदगी और उससे जुड़ी तमाम बातें
उनकी मीठी आवाज और चढ़ते-उतरते सुरों के आगे फीकी हो जाती थीं। कहते हैं कि उनके कंठ में
स्वयं सरस्वती का वास था। जितनी मीठी आवाज उनकी 14 वर्ष की आयु में थी, वही मिठास उनके
आखिरी गाने तक कायम रही। उनके जन्मदिन के मौके पर पूरा देश उन्हें दे रहा भावभीनी
श्रद्धांजलि…
लता मंगेशकर का जन्म एक कर्हाडा ब्राह्मण दादा और गोमंतक मराठा दादी के घर, मध्य प्रदेश के
इंदौर शहर में दीनानाथ मंगेशकर की सबसे बड़ी बेटी के रूप में हुआ। पंडित दीनानाथ मंगेशकर
मराठी संगीत नाट्य के लोकगायक और नाटककार थे। इसलिए घर का माहौल पूरी तरह संगीतमय
था। वे संगीत की स्वरलहरियों के बीच ही पलने लगीं, इसलिए संगीत उनके साथ पाठशाला की
कक्षाओं में भी चला आया। एक बार लता स्कूल में अपनी छोटी बहन ऊषा मंगेशकर को भी साथ
लेकर आईं। इस पर शिक्षक ने कहा कि एक बच्चे की फीस में दो बहनें नहीं पढ़ सकती। यह बात
इतनी बुरी लगी कि उन्होंने स्कूल से नाता तोड़ लिया। इसके बाद वे पूरी तरह संगीत से जुड़ गईं।
जिंदगी गम का सागर भी है…
1942 में लता मंगेशकर के पिता का निधन हो जाता है। सबसे बड़ी होने के नाते तीन छोटी बहनों-
मीना, आशा, ऊषा और सबसे छोटे भाई ह्दयनाथ सहित परिवार की जिम्मेदारी लता के कंधों पर आ
आ गई। परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्होंने अभिनय और गायन से ही आगे सफर तय
करने का निश्चय किया। पिता के मित्र थे, मास्टर विनायक दामोदर कर्नाटकी। वे नवयुग चित्रपट
कंपनी के मालिक थे। उन्होंने लता को इस हुनर से आजीविका कमाने का रास्ता दिखाया। लता
मंगेशकर ने कुछ मराठी, हिन्दी फिल्मों में छोटी-मोटी भूमिकाएं भी की। पर अभिनय रास नहीं आया
और उन्होंने अपना पूरा ध्यान संगीत पर लगाया। लता मंगेशकर ने यूं तो पहली बार एक मराठी
फिल्म में गाना गया और अभिनय भी किया। फिल्म का नाम था ‘पहिली मंगला गौर’ (1942)। वर्ष
1948 में मास्टर विनायक की मौत के बाद संगीतकार गुलाम हैदर ने लता के गायन करियर को एक
दिशा दी। सन 1948 की बात है, एक दिन गुलाम हैदर लता को लेकर निर्माता शशधर मुखर्जी के पास
गए। वे उन दिनों ‘शहीद’ फिल्म बना रहे थे। मुखर्जी ने लता की आवाज सुनी तो यह कहकर उसे
खारिज कर दिया कि इस लड़की की आवाज तो बहुत ही पतली है। गुलाम हैदर आगबबूला हो उठे,
कहा, आने वाले दिनों में निर्माता, निर्देशक लता के पैरों पर गिरेंगे और अपनी फिल्म में गाने के लिए
गुजारिश करते फिरेंगे। शुरू में उनकी आवाज पर उस समय की मशहूर और दिग्गज गायिका नूरजहां
की आवाज की छाप नजर आती थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी खुद की शैली बना ली।
जिंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है…
महान शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने एक साक्षात्कार में कहा था कि वे एक बार बड़े गुलाम अली
खां से मिलने अमृतसर गए, वे बातें ही कर रहे थे कि ट्रांजिस्टर पर लता का गाना ‘ये जिंदगी उसी
की है जो किसी का हो गया’ सुनाई पड़ा। खां साहब बात करते-करते एकदम से चुप हो गए और जब
गाना खत्म हुआ, तो बोले, “कमबख्त कभी बेसुरी होती ही नहीं।” इस टिप्पणी में पिता जैसा प्यार भी
था और एक कलाकार का रश्क भी।
फिल्म संगीत में उर्दू का बहुत वर्चस्व रहा है। कहा जाता है कि एक बार संगीतकार अनिल बिस्वास
ने लता मंगेशकर को उस समय के सबसे सफल अभिनेता दिलीप कुमार से मिलवाया। लता मंगेशकर
का परिचय कराते हुए अनिल बिस्वास बोले- दिलीप भाई ये लता मंगेशकर हैं, गाना गाती हैं और
मराठी हैं। इस पर दिलीप कुमार ने हंसते हुए जवाब दिया- ओह.. मराठी हो, मराठियों की हिंदी और
उर्दू ऐसे मिले हैं जैसे दाल-चावल। ये बात लता मंगेशकर के मन बैठ गई। इसके बाद उन्होंने एक
मौलवी से लगातार एक साल तक उर्दू सीखी।
मेरी आवाज ही पहचान है…
वर्ष 1958 में उन्हें फिल्म ‘मधुमति’ के गीत ‘आजा रे परदेसी’ के लिए पहली बार फिल्मफेयर का
सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का पुरस्कार मिला। इसका संगीत सलिल चौधरी ने तैयार किया था। उसके बाद
उनकी आवाज में निखार आता चला गया और नए संगीतकारों के साथ उनकी आवाज को नए आयाम
भी मिलने लगे। लता ने कुल चार बार फिल्मफेयर पुरस्कार जीता और फिर पुरस्कारों की होड़ से हट
गईं, ताकि आनेवाली नई प्रतिभाओं को पुरस्कार पाने का मौका मिले और यह बात है सन 1969 की।
सन 1975 में भी उन्हें फिल्म ‘कोरा कागज’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका था। यूं तो स्वर
साम्राज्ञी लता मंगेशकर को देश और दुनिया भर के कई पुरस्कार मिले हैं, लेकिन भारत सरकार ने
उन्हें 1969 में पद्मभूषण, 1989 में दादा साहेब फाल्के, 1999 में पद्मविभूषण और फिर 2001 अटल
बिहारी वाजपयी की सरकार में उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ देकर सम्मानित
किया। n
पीएम मोदी के साथ रहा लता दीदी का खास रिश्ता…
लता मंगेशकर प्रधानमंत्री मोदी को ‘नरेंद्र भाई’ कहकर बुलाती थीं तो पीएम मोदी उन्हें हमेशा ‘लता
दीदी’ कहकर संबोधित करते थे। लताजी के निधन पर पीएम मोदी ने आलेख के जरिए लता दीदी के
अपने खास रिश्ते को साझा किया था। 2014 के आम चुनाव के पहले लताजी ने कहा था, “मैं भगवान
से प्रार्थना करती हूं कि हम नरेंद्र भाई को प्रधानमंत्री के रूप में देखें।”
…………………………………….

