समोसे में आलू अब भी है, पर बिहार में लालू नही है। वो झारखंड की जेल में सजा काट रहे हैं।
~~~भारत के इतिहास में पहली बार कोई मुख्यमंत्री फर्जी बिल बनाने और उसे पेमेन्ट करने के लिए जेल गया है। मजे की बात, मुख्यमंत्री न बिल बनाता है, न चेक साइन करता है, न कोषागार जाकर आहरण करता है।
तो जरूर, फ़्रॉड करने वाले अफसरों ने सारे पैसे लालू को सौपे होंगे??

जी नही, ऐसा भी नही है। मामला क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी का है। मुख्यमंत्री ने आपराधिक षड्यंत्र किया, ऐसा गवाहों के बयानों में आया है। ~~~गवाहो के बयानों में उस मुख्यमंत्री की कॉन्सपिरेसी भी आई थी, जिसने अपने गुंडों को तीन दिन तक, अपनी राजधानी में मौत का नंगा नाच करने की छूट दी थी।
जिसने सेंट्रल फोर्सज को दो दिन एयरपोर्ट से बाहर आने की परमिशन न दी थी। गवाह उसकी बैठकों, उसके निर्देशो के भी थे, लेकिन वो मुख्यमंत्री जेल में नही है।
दरअसल गवाह ही जेल में है। वो आईपीएस उम्र कैद भुगत रहा है। लेकिन वो किस्सा अलग है, आदमी अलग है, तो न्याय का आचरण भी अलग है। ~~~~मजे की बात कि जिस षड्यंत्र को रचने का आरोप लालू पर साबित हुआ है, वह उनके 20 साल पहले से चल रहा था। याने 1978 से पशुपालन विभाग, अपनी आवंटन राशि से अधिक की निकासी कर रहा था।
न AG ने पकड़ा, न सीएजी ने.. सब सोए पड़े थे। तो पकड़ा किसने?? लालू ने..
जांच बिठाई। FiR की, एक नही , दो नही, पूरी 64 Fir, छापे मरवाये, अफसरों को सस्पेंड किया। जांच कमीशन बिठाया, कि इस बीच PIL दाखिल हो गयी।
क्योकि भावी उपमुख्यमंत्री, सुशील कुमार मोदी को यकीन नही था कि लालू सरकार निष्पक्ष जांच करेगी। सो हाईकोर्ट से रिक्वेस्ट की, कि मामला सीबीआई को दे दिया जाये।
अब सीबीआई ने सभी दर्ज 64 केस हैंडओवर ले लिए। खुद भी नई FIR दर्ज की। इनमे लालू को ही नामजद कर दिया गया। ~~~वैसे तो शुरुआती जांच में नीतीश कुमार का भी नाम सीबीआई के दस्तावेजों में है। लेकिन वे समता पार्टी बनाकर बीजेपी से मिल चुके थे।
लेकिन लालू ने बीजेपी से हाथ न मिलाया। न 1996 में, न 2016 या 2021 में। इसलिए 22000 करोड़ के सृजन घोटाले में नीतीश सुरक्षित हैं। वो तीसरी बार अबाधित राज कर रहे हैं।
लालू तीसरे मामले में जेल जा चुके हैं। उनके केस में न कोई गवाह पलटता है, न बयान बदलता है। सबको बीस साल पहले का सब घटनाक्रम, एकदम साफ साफ याद है। ~~~~लालू से नफरत की जा सकती है। कारण जेनुइन है।
उनका दौर, बिहार में “ऊंची जात” के परंपरागत आतंक को पलटकर “नीची जात” के आतंक को स्थापित करने का रहा है। इस क्रम में कानून व्यवस्था का भट्ठा बैठा, और बिहार अराजकता के गर्त में डूब गया।
यह अवश्य उनका अपराध है, इसकी सजा जनता की अदालत ने बार बार दी है। आगे भी सात पीढ़ियों तक दे सकती है
लेकिन सेंट्रल एजेंसीज, विरोधी सरकार और उसके वेतन प्रमोशन पर जी रहे अफसरों की गवाही के आधार पर लालू की ज्यूडिशियल किलिंग पर मेरी असहमति है। ~~~इसलिए कि यह भारत की राजनीति में अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने की एक नई परिपाटी बिठाएगी।
आने वाले दौर में सत्ता में बैठे लोग, अपने से पहले सत्ता में रहे लोगो के साथ वह सदाशयता न बरतेंगे, जो 70 साल की रवायत रही है।
याद रहे, लालू का मुकदमा, बदले की राजनीति के लिए, ज्यूडिशियल प्रोसेस को मैनिपुलेट करने, और सरकारी अफसरों से नेताओ को फंसवाने के कोर्स की प्रशिक्षण पुस्तिका बनेगी। तो आज जश्न मनाने वाले सुन लें।
लालू की राजनैतिक हत्या, अब एक नजीर बनने वाली है।





